14 नवंबर की सुबह थी।
घर में रौनक थी... चहल-पहल थी... और एक खास चमक — जैसे सच में लक्ष्मी जी इस घर में पधार चुकी हों।
महक आज कुछ अलग ही लग रही थी —
लाल रंग की चूड़ियाँ, माथे पर छोटी-सी बिंदी, लाल साड़ी और पैरों में पायल की रुनझुन।
वो घर की छोटी बहू होते हुए भी आज पूरे घर पर राज कर रही थी — हर एक जिम्मेदारी बखूबी संभाल रही थी।
खुद कम कर रही थी, लेकिन सबको लगन से काम में लगाए हुए थी।
सास मंदिर गई थीं,
पापा-बेटी दोनों पटाखे और मिठाई लेने बाजार जा चुके थे,
और ताई जी — जिनकी रसोई आमतौर पर अलग रहती थी — आज पूरे घर के लिए खाना बना रही थीं।
महक की स्पेशल रिक्वेस्ट जो थी!
दीवाली का दिन ही कुछ ऐसा होता है —
थोड़ा अपनापन, थोड़ी मिठास और थोड़ा-सा बदलाव।
सुबह से ही फोन पर शुभकामनाओं की बौछार हो रही थी।
ट्रिन-ट्रिन... ट्रिन-ट्रिन...
फोन फिर बजा।
महक ने हँसते हुए उठाया —
“हैलो, हैप्पी दिवाली!”
दूसरी ओर से एक नरम-सी आवाज़ आई —
“आपको भी दिवाली की बहुत-बहुत शुभकामनाएं। आप और आपका परिवार हमेशा खुश रहे।”
महक ठिठकी।
ये आवाज़ कुछ जानी-पहचानी सी लग रही थी...
पर ये तो वही रॉन्ग नंबर वाला इंसान था।
वो बोली —
“आज आपने फोन क्यों किया? वैसे मैं आपसे नाराज़ थी... लेकिन छोड़िए, आज दिवाली है। सभी से प्यार से बात करनी चाहिए।”
कॉल करने वाले ने हिचकिचाते हुए सिर्फ इतना कहा —
“जी...”
महक को लगा यह इंसान पैसों के लिए परेशान है, जो दिवाली वाले दिन भी फोन कर रहा है।
वो तुरंत नर्म लहजे में बोली —
“क्या आपको देवी प्रसाद नहीं मिले? क्या... सच में आपको पैसों की बहुत ज़रूरत है? मैं... कुछ मदद कर सकती हूँ, अगर आप चाहें तो।”
दूसरी तरफ का इंसान चौंक गया —
“नहीं... आपने इतना पूछा, यही बहुत है। आप सच में बहुत अच्छे दिल की इंसान हैं।”
महक ने बात आगे बढ़ाई —
“मेरे पति और ताया जी घर पर नहीं हैं, वरना मैं आपसे बात करवा देती। शायद कुछ मदद हो जाती। वैसे भी, दिवाली पर तो सभी को पैसों की ज़रूरत होती है।”
कॉलर ने धीरे से कहा —
“कोई बात नहीं... मैं फिर कॉल कर लूंगा। आप सच में बहुत अच्छी हैं। हैप्पी दिवाली।”
फोन कट गया...
लेकिन महक की मुस्कान अब थम नहीं रही थी।
कल तक जिस अजनबी इंसान के फोन से उसे गुस्सा आता था,
आज उसी की बातों ने उसके चेहरे पर मुस्कान ला दी।
उसे लगा जैसे वो ज़मीन पर नहीं, हवा में तैर रही हो।
उसे समझ नहीं आया कि वो कॉल सच में रॉन्ग नंबर था या कोई नियति का इशारा।
लेकिन उसने मन ही मन सोचा —
“अगर उसे सच में जरूरत है, तो मैं जरूर मदद करूंगी।
दिवाली का असली मतलब ही तो यही है — किसी और के जीवन में रोशनी भरना।”
वो लक्ष्मी माता से प्रार्थना करने लगी —
“माँ... जैसे आपने हमारे घर को रौशन किया है, वैसे ही उस अनजान इंसान के जीवन से भी अंधकार दूर करना।”
महक... सिर्फ नाम की नहीं थी।
उसकी सोच और संवेदनाओं से भी एक सुगंध निकलती थी — जो हर दिल को छू जाए।
वो सिर्फ अपने लिए नहीं,
हर किसी के लिए जीती थी...
चाहे वो कोई अजनबी ही क्यों न हो।
(10–12 दिन बाद)
दिवाली को गुज़रे अब दस-बारह दिन बीत चुके थे।
घर की रौनक थोड़ी कम हो गई थी, लेकिन सर्दी ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे।
सुबह की ठंडी हवा और शाम की गुनगुनी धूप अब महक को बहुत भाने लगी थी।
गौरव अभी-अभी ऑफिस से लौटे थे।
चेहरे पर थकान साफ झलक रही थी।
महक ने बिना कुछ कहे ही अंदाज़ा लगा लिया और चाय-पकोड़े बनाने किचन में चली गई।
तभी फोन की घंटी बजी —
“ट्रिन-ट्रिन... ट्रिन-ट्रिन...”
किचन से महक ने आवाज़ लगाई —
“गौरव, ज़रा फोन देख लेना...”
गौरव ने फोन उठाया और कुछ पल बाद आवाज़ दी —
“महक, ताया जी को बुला दो... उनके ऑफिस से बड़े बाबू का फोन है।”
महक तुरंत समझ गई।
ताया जी कनॉट प्लेस के पोस्ट ऑफिस में अकाउंट ऑफिसर थे।
रिटायरमेंट के करीब थे, लेकिन इज़्ज़त आज भी वैसी ही थी।
इन दिनों मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद घर पर आराम कर रहे थे।
ताया जी धीरे-धीरे आए और फोन लिया —
“हाँ बड़े बाबू, नमस्कार... जी, डॉक्टर ने आराम करने को कहा है...”
थोड़ी देर बाद महक चाय और पकोड़े लेकर आई।
सब बैठकर बातें करने लगे,
लेकिन महक की नज़र बार-बार फोन पर जा रही थी।
ताया जी ने गौर से देखा —
“क्या हुआ बेटा? फोन को यूँ क्यों देख रही हो?”
महक ने झिझकते हुए कहा —
“एक बात करनी थी आपसे...”
और उसने पूरी घटना बता दी।
गौरव थोड़ा गुस्से में आ गया —
“तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या, महक? किसी भी अजनबी से बात करने लगती हो? दुनिया इतनी सीधी नहीं है।”
महक ने शांत स्वर में कहा —
“मुझे लगा उसे सच में मदद की ज़रूरत थी...”
ताया जी ने गंभीर होकर पूछा —
“उसने कोई नंबर या पता दिया?”
“नहीं...” महक ने सिर झुका लिया।
गौरव बोला —
“हर आवाज़ के पीछे सच्चाई नहीं होती। ज़रूरत से ज़्यादा भला बनने की कोशिश मत करो।”
महक की आंखें भर आईं,
लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
“जी... आगे से ध्यान रखूंगी।”
और चुपचाप किचन में चली गई।
रात को बर्तन धोते हुए उसका मन बिल्कुल शांत नहीं था।
वो आवाज़... वो घबराहट... वो मदद की पुकार —
सब उसके अंदर गूंज रहे थे।
उसने खुद से पूछा —
“क्या वो सच में धोखेबाज़ था?
या कोई ऐसा इंसान जिसे सच में मदद की ज़रूरत थी?”
“क्या मैंने किसी की सच्ची पुकार को अनसुना कर दिया?”
टेलीफोन अब खामोश था...
लेकिन महक का मन शोर से भरा हुआ था।
अब महक क्या फैसला लेगी?
क्या वो रॉन्ग नंबर फिर आएगा?
या ये सिर्फ एक संयोग था... या किस्मत का इशारा?
To Be Continued…