एपिसोड 2: सोने की खेती और शाही दावत
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सीन 1: गली का माहौल – चुगलियों का बाज़ार
बाहर गली में कर्फ्यू जैसा माहौल था…
लेकिन सन्नाटा नहीं।
हर घर की खिड़की से एक-एक गर्दन बाहर लटकी हुई थी।
मोहल्ले की “CCTV आंटी” (मिश्राइन) अपने छज्जे से नाली को ऐसे घूर रही थीं
जैसे वहाँ से मछली नहीं…
बल्कि खुद कुबेर भगवान प्रकट होने वाले हों।
फुसफुसाहट शुरू—
मिश्राइन (धीरे से):
“अरे शर्मा जी की बहू, देखा तुमने? सावित्री ने नाली में बोरी क्यों लगाई थी? कहीं सारा सोना तो नहीं समेट लिया?”
शर्मा की बहू:
“हाय राम! हम तो कचरा समझकर बैठे रहे और वो लॉटरी मार गई? कल देखना, नए झुमके पहनकर निकलेगी!”
तिवारी जी:
“भाई साहब, ये नाली का पानी आज इतना चमक क्यों रहा था? लगता है नगर निगम ने आज फिनायल की जगह कंगन घोल दिए हैं!”
अब नाली में सिर्फ गंदा पानी बह रहा था…
सोना गायब हो चुका था।
सावित्री ने मौका देखकर अपनी बोरी ऐसे खींची
जैसे कोई मछुआरा 50 किलो की शार्क पकड़ रहा हो।
वह जल्दी से घर में घुसी…
और दरवाज़ा ऐसे बंद किया
जैसे इनकम टैक्स की रेड पड़ने वाली हो।
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सीन 2: घर का आँगन – खजाने की पहचान
अंदर आँगन में बित्तो अभी-अभी टॉयलेट से निकली थी।
उसका चेहरा ऐसा लग रहा था जैसे उसने पूरी दुनिया का बोझ उठा लिया हो।
पीछे-पीछे गोलू कूदता हुआ आ रहा था।
सावित्री (हांफते हुए):
“बित्तो! दरवाज़ा बंद कर! कुंडी लगा! जल्दी!”
बित्तो ने लड़खड़ाते हुए कुंडी लगाई।
सावित्री ने आँगन के बीच बोरी रखी…
और धीरे से पल्लू हटाया…
अंदर से एक सुनहरा, चमकता हुआ ढेला बाहर निकला।
धूप में वह ऐसा चमक रहा था कि बित्तो की आँखें चौंधिया गईं।
सावित्री (आँखों में चमक):
“देख बित्तो… असली सोना है! इतना भारी है कि पूरा खानदान पल जाएगा!”
गोलू (ताली बजाते हुए):
“वाह मम्मी! अब तो मैं स्कूल में सबको थप्पड़ मारूँगा! और प्रिंसिपल से कहूँगा—स्कूल बेच दो, हम खरीदेंगे!”
बित्तो (हैरान):
“लेकिन ये आया कहाँ से?”
गोलू (हँसते हुए):
“दीदी… ये मुगल काल का नहीं… ये आपका ‘गोल्डन टाइम’ है! ये आपकी… गोल्डन पॉटी है!”
सन्नाटा…
बित्तो:
“मम्मी! ये बदतमीज़ हो गया है!”
गोलू:
“सच ही तो कह रहा हूँ!”
सावित्री (डाँटते हुए):
“चुप दोनों! ये जो भी है… अब हमारा है!”
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सीन 3: सावित्री का ‘मिशन सुनार’
सावित्री ने सोना जhole में छुपाया…
ऊपर से पुरानी साड़ियाँ डाल दीं।
बाहर निकलते ही—
चायवाला:
“अरे सावित्री बहन, आज बड़ी जल्दी में हैं?”
सावित्री (नकली मुस्कान):
“अरे नहीं… बिट्टो का पेट खराब है… चूरन लेने जा रही हूँ।”
(मन में)
“अगर ये सच में सोना निकला…
तो सबसे पहले इस चाय वाले की दुकान बंद करवाऊँगी!”
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सीन 4: घर के अंदर – बित्तो का ‘रॉयल एहसास’
इधर घर में…
बित्तो अब कुर्सी पर ऐसे बैठी थी
जैसे कोई महारानी हो।
बित्तो:
“गोलू… अब से तू मेरा नौकर है। जा ठंडा पानी ला… और उसमें शरबत भी डाल।”
गोलू:
“दिदी… अगर ये रोज़ हुआ… तो हम अंबानी से आगे निकल जाएँगे!”
बित्तो (मुस्कुराकर):
“टैलेंट तो बचपन से था… आज प्लेटफॉर्म मिला है!”
“मैं कहानी लिखूँगी—
‘मेरी सोने की पॉटी और करोड़ों का कारोबार’!”
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तभी…
धड़-धड़-धड़!
दरवाज़ा जोर से बजा।
मिश्राइन की आवाज़:
“सावित्री! दरवाज़ा खोलो! सुना है घर में कुछ ‘पीला चमकता’ आया है!”
बित्तो (घबराकर):
“गोलू! जल्दी बदबू फैला दे! कोई अंदर ना आए!”
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सीन 5: शाही दावत की तैयारी
शाम हो गई…
सावित्री अभी तक नहीं लौटी।
बित्तो का ध्यान अब खाने पर गया।
बित्तो:
“गोलू! वो नूडल्स निकाल जो मम्मी ने छुपाए थे! आज ‘गोल्डन नूडल्स’ बनेंगे!”
गोलू:
“मम्मी मारेंगी!”
बित्तो:
“अब हम अमीर हैं!”
दोनों ने मिलकर नूडल्स बनाए…
पापड़ तले…
और हर पापड़ को ऐसे देखा
जैसे वो सोने का सिक्का हो।
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सीन 6: सावित्री की वापसी – बड़ा खुलासा
रात 8 बजे…
सावित्री वापस आई।
चेहरा अजीब था—न पूरी खुशी, न पूरी चिंता।
बित्तो:
“मम्मी! क्या हुआ?”
सावित्री:
“सुनार ने कहा… ये सोना है…
लेकिन इसमें अजीब मिलावट है।”
“उसने पूछा—
क्या घर में कोई ऐसी चीज खाता है जो पचती नहीं?”
बित्तो:
“मतलब?”
सावित्री:
“मतलब… ये 24 कैरेट नहीं…
पर 100% चमत्कारी है!”
“और उसने इसके बदले…
50,000 रुपए तुरंत दे दिए!”
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खुशी का धमाका!
गोलू और बित्तो उछल पड़े।
बित्तो:
“अब रोज़ नूडल्स खाऊँगी! खजाना चलता रहना चाहिए!”
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सीन 7: चिट्ठी
सावित्री ने पति को चिट्ठी लिखी—
“जल्दी घर आ जाओ।
हमारी बिट्टो ने किस्मत बदल दी है।
अब नौकरी की ज़रूरत नहीं…
घर में सोने की खान मिल गई है।”
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एंड हुक – जासूसी की रात
रात गहरी हो चुकी थी…
सावित्री को नींद नहीं आ रही थी।
बाहर…
चमन लाल और उसके दो साथी दीवार पर चढ़ रहे थे।
चमन लाल (धीरे से):
“श्श्श… सीधे टॉयलेट में घुसना है…
वहीं है असली ‘सोने की खान’…”
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जारी रहेगा…
लेखिका: पूजा कुमारी ✍️