Love in Hindi Fiction Stories by Harish Kumar books and stories PDF | आशिकी

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आशिकी

छोटे शहर का बड़ा नाम


​धूप की तल्खी आज कुछ ज्यादा ही चुभ रही थी, जैसे वह भी रिषि की किस्मत का मज़ाक उड़ा रही हो। एक छोटे से शहर की तंग गलियों में धूल और शोर का एक अजीब सा संगम था। लोग अपनी-अपनी जद्दोजहद में मसरूफ थे—कोई रेहड़ी खींच रहा था, तो कोई पुरानी साइकिल की चेन चढ़ा रहा था। इसी भीड़ के बीच, एक लड़का अपने कंधे पर औजारों का भारी झोला लटकाए, पसीने में तर-बतर चला जा रहा था। नाम था—रिषि मल्होत्रा।
​नाम सुनते ही ज़हन में किसी आलीशान बंगले, चमचमाती गाड़ियों और महंगे सूट-बूट वाले रईसज़ादे की तस्वीर उभरती है। लोग सोचते—"वाह! मल्होत्रा! बड़ा खानदान होगा, बड़ा रसूख होगा।" लेकिन हकीकत इस धूल भरी सड़क पर बिखरी पड़ी थी। यहाँ इस नाम की कोई साख नहीं थी। रिषि के लिए यह नाम सिर्फ एक भारी बोझ था, जिसे वह हर रोज़ ढोता था। न कोई उसे रुक कर सलाम करता, न कोई उसकी बात सुनने में दिलचस्पी रखता। वह इस शहर की भीड़ में बस एक परछाईं बनकर रह गया था।
​तभी पीछे से एक कर्कश और कड़क आवाज़ आई, जिसने खयालों के सिलसिले को बेरहमी से तोड़ दिया।
​"ए लड़के! ज़रा जल्दी-जल्दी हाथ चला! मेरे पास और भी बहुत काम हैं, मैं यहाँ तेरे लिए पूरा दिन बैठ कर मक्खियाँ नहीं मारूँगा। नाम तो देखो—मल्होत्रा! और काम देखो तो दो कौड़ी का इलेक्ट्रिशियन!"
​रिषि ने एक पल के लिए अपनी मुट्ठियाँ भींचीं, स्वाभिमान ने अंदर कहीं सिर उठाया, लेकिन जेब की खालीपन ने उसे फौरन दबा दिया। उसने बिना नज़रें उठाए, बस हल्के से सिर झुकाकर जवाब दिया, "जी साहब, बस हो गया। अभी खत्म करता हूँ।"
​उसने उलझे हुए तारों को सुलझाया, जैसे अपनी उलझी हुई ज़िंदगी को सुलझाने की नाकाम कोशिश कर रहा हो। काम खत्म करके वह अपनी छोटी सी 'मल्होत्रा इलेक्ट्रिकल्स' की तरफ चल पड़ा। कहने को तो वह दुकान थी, लेकिन असल में वह एक टीन की छत वाला खोखा था, जहाँ दिन भर बिजली के झटकों और पेचकस के साथ जूझने के बाद उसकी हथेलियों में सिर्फ चार सौ रुपये की शिकन आती थी। इन्हीं चंद रुपयों में उसे अपना गुज़ारा करना था और अपनी गर्लफ्रेंड, प्राची की फरमाइशें भी पूरी करनी थीं।
​जैसे ही वह दुकान के करीब पहुँचा, उसका बचपन का दोस्त देवा हाफते हुए दौड़ता हुआ आया। देवा के चेहरे पर घबराहट साफ थी।
​"रिषि! भाई... वो... वो प्राची! तुझे याद कर रही है, पिछवाड़े वाली गली में खड़ी है!"
​देवा की बात सुनते ही रिषि का दिल एक ज़ोरदार झटके के साथ धक-धक करने लगा। उसके माथे पर ताज़ा पसीना चमकने लगा। यह डर अजीब था—वह प्राची से उतना ही डरता था जितना शायद अपनी माँ से। उसके लिए प्राची सिर्फ उसकी पसंद नहीं, उसका पूरा संसार थी, लेकिन वह संसार अक्सर गुस्से के बादलों से घिरा रहता था।
​रिषि ने अपने गंदे हाथों को अपनी पैंट से पोंछा और भारी कदमों से पीछे की गली की ओर बढ़ा। वहाँ प्राची पहले से मौजूद थी। उसकी आँखों में वो चमक नहीं थी जो कभी रिषि को सुकून देती थी, बल्कि वहाँ सिर्फ और सिर्फ नफरत और गुस्से की आग थी।
​वो आते ही रिषि के सामने खड़ी हो गई, उसकी आँखों में देखा और गुस्से में ज़ोर से बोली, "मैंने तुम्हें कहा था ना..."