शोषण बना पीड़ा का कारण in Hindi Moral Stories by Gauri Katiyar books and stories PDF | शोषण बना पीड़ा का कारण

Featured Books
Categories
Share

शोषण बना पीड़ा का कारण

आज के समय में शोषण के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। हर दिन यह सुनने को मिलता है कि आज किसी के साथ अत्याचार हुआ, कल किसी और के साथ। ऐसे दरिंदों की वजह से लड़कियों की पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो जाती है। न जाने कितनी बच्चियाँ रोज़ इस उत्पीड़न का शिकार होती हैं और कितनी ही मासूम ज़िंदगियाँ हर दिन मौत का सामना करती हैं।

समाज में ऐसे दरिंदे भरे पड़े हैं जो लड़कियों का जीवन नष्ट कर देते हैं। जब किसी लड़की को सज़ा देने की बात आती है, तो या तो लड़की के परिवार को समाज के डर से चुप करा दिया जाता है या फिर केस को इतना लंबा खींचा जाता है कि अंततः उसे बंद कर दिया जाता है। इन सब में सबसे अधिक पीड़ा उस लड़की को ही सहनी पड़ती है।

मुझे यह समझ नहीं आता कि जब कोई दरिंदा किसी लड़की के साथ बलात्कार करता है, तो वह उसे मार क्यों देता है? क्या इसलिए कि कहीं वह लड़की उसके खिलाफ आवाज़ न उठा दे? जब वे यह घिनौना अपराध करते हैं, तब  यह क्यों नहीं सोचते कि उस लड़की पर क्या बीतेगी? अगर उनमें इतना साहस अपराध करने का है, तो सज़ा भुगतने का साहस क्यों नहीं?ये लोग छोटी-छोटी बच्चियों तक को नहीं छोड़ते। हमारे भारत में लाखों मामले सामने आते हैं, लेकिन न्याय केवल कुछ ही पीड़िताओं को मिल पाता है।समाज में लोग लड़कियों को हर बात पर रोकते हैं—यह मत करो, वहाँ मत जाओ, ऐसे मत रहो। लेकिन वही लोग लड़कों को क्यों नहीं समझाते कि वे लड़कियों का सम्मान करें? जब किसी घर में बेटी पैदा होती है, तो कहा जाता है कि वह लक्ष्मी का रूप है, देवी का स्वरूप है। लेकिन क्या लोग यह मानते हैं कि वही बेटी समय आने पर दुर्गा और महाकाली का रूप भी धारण कर सकती है?

लोग कहते हैं कि लड़का होना आसान नहीं है, लेकिन यदि मेरी मानें तो लड़की होना भी आसान नहीं है। हर दिन एक डर के साथ जीना पड़ता है कि कहीं कुछ गलत न हो जाए।हाल ही में कुछ ऐसे मामले सामने आए, जहाँ पत्नियों ने अपने पतियों की हत्या की। उन मामलों में स्त्री को सज़ा देने में ज़रा भी देर नहीं लगी। लेकिन जब किसी लड़की को न्याय दिलाने की बात आती है, तो समाज, बदनामी और न जाने कितनी बातें सामने आ जाती हैं।हमारे समाज में जब भी कोई ऐसी घटना होती है, तो दोष लड़की पर ही डाल दिया जाता है—उसके कपड़ों पर, उसके व्यवहार पर, उसके बाहर जाने पर। इन बेबुनियाद उसूलों के बीच पिसती केवल लड़कियाँ ही हैं। और जब कोई लड़की अपने लिए आवाज़ उठाती है, तो या तो उसे मार दिया जाता है या उसकी आवाज़ दबा दी जाती है। 

जब किसी स्त्री के साथ शोषण होता है, तो इसी समाज के लोग मोमबत्तियाँ लेकर सड़कों पर उतर आते हैं। लेकिन जब स्त्री की सुरक्षा और सम्मान की बात आती है, तो सबके मुँह बंद हो जाते हैं। जब किसी स्त्री को उसका सम्मान दिलाने या उसके अधिकारों के लिए लड़ने की बात होती है, तो लोग अपनी ज़ुबान पीछे खींच लेते हैं। वे सोचते हैं कि वह तो स्त्री है, उसे सम्मान और सुरक्षा की क्या आवश्यकता है।

एक छोटा सा उदाहरण लेते हैं—जब किसी अभिनेता, किसी नेता या किसी धनवान व्यक्ति को सुरक्षा देनी होती है या उनके साथ कुछ गलत होता है, तो सरकार उन्हें बिना किसी परेशानी के तुरंत सुरक्षा और न्याय देने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। कई बार बिना ठोस सबूत के भी उनका साथ दिया जाता है, और यदि कोई नेता गलत कार्य करता है, तो उसके अपराध को छिपाने की कोशिश की जाती है। लेकिन जब किसी लड़की के साथ कोई गलत घटना होती है, तो उसी पर सवाल उठाए जाते हैं। उस पर तरह-तरह की पाबंदियाँ लगा दी जाती हैं और उससे अनेक सबूत माँगे जाते हैं। उसे न्याय तो मिलता नहीं, और यदि मिलता भी है, तो उसके मामले को इतना लंबा खींच दिया जाता है कि या तो वह लड़की समाज के डर से आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाती है, या फिर उसकी आवाज़ हमेशा के लिए दबा दी जाती है। 

मैं यह सवाल उठाती हूँ—क्या उस समय इन लोगों को उस लड़की के दर्द का अहसास नहीं होता? क्या उस समय उन्हें वह पीड़ा और वे निशान नहीं दिखते, जो उन दरिंदों ने दिए होते हैं? क्या तब उसके दर्द भरे आँसू सबूत के तौर पर दिखाई नहीं देते? क्या उस समय उसके साथ हुआ अत्याचार दिखाई नहीं देता? क्या उस समय उस स्त्री के फटे हुए कपड़े भी नजर नहीं आते?अरे, अगर इतना कुछ देखने के बाद भी उस पीड़िता को न्याय नहीं मिलता, तो लालत है ऐसी सुरक्षा व्यवस्था पर, जो स्त्री की पीड़ा को समझ नहीं सकती। लालत है ऐसे कानून पर, जो स्त्रियों के साथ हो रहे अन्याय को रोक नहीं पाते और दरिंदों को सज़ा नहीं दिला पाते।

लोग कहते हैं कि रामायण और महाभारत स्त्री के कारण हुए, लेकिन सच्चाई यह है कि स्त्री का अपमान ही रामायण और महाभारत का कारण बना। जब तक इस समाज से ऐसे दरिंदों का अंत नहीं होगा, तब तक हमारा देश नहीं बदल सकता। और देश बदलना है तो सबसे पहले अपनी सोच बदलनी होगी।

"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, और बेटी को दुर्गा और काली बनाओ।"

जिस दिन ऐसे अत्याचार समाप्त हो जाएंगे, उस दिन किसी भी स्त्री को जौहर करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

आओ ये प्रण लेते हैं हम आज -:
"अब कोई स्त्री ना होगी कभी शोषण का शिकार,
खा लो आज से ये कसम कि फिर कोई स्त्री ना करे जौहर
और ना ही कोई स्त्री हो चीर हरण का शिकार"।