अधूरी सुरक्षा
कलेक्ट्रेट परिसर की दोपहर हमेशा की तरह शोर और भागदौड़ से भरी हुई थी। धूल से अटे रास्तों पर इधर-उधर भागते लोग, फाइलों का बोझ उठाए बाबू, और पसीने से तरबतर फरियादी—सब मिलकर एक ऐसा दृश्य रच रहे थे, जहाँ उम्मीद और निराशा साथ-साथ चलती दिखती थी।
जतिन, करीब 32 वर्ष का, सादा खादी का कुर्ता-पायजामा पहने, कंधे पर झोला डाले, ट्रेजरी ऑफिस से बाहर निकल रहा था। उसके चेहरे पर काम निपटाने की हल्की संतुष्टि थी, लेकिन आँखों में हमेशा की तरह समाज की उलझनों को समझने की बेचैनी भी थी। जैसे ही उसने दहलीज पार की, अचानक उसके कानों में किसी के सिसकने की आवाज़ पड़ी।
वह ठिठक गया।
सामने बरगद के पेड़ के नीचे, एक बेहद वृद्ध महिला बैठी थी। उम्र लगभग 90 साल। झुर्रियों से भरा चेहरा, सूखी त्वचा, आँखों के नीचे गहरे काले घेरे। उसके सफेद बाल उलझे हुए थे, जैसे कई दिनों से ठीक से कंघी न की हो। उसने एक फीकी, जगह-जगह से घिसी हुई नीली साड़ी पहन रखी थी, जिसके किनारे उधड़ चुके थे। उसके पैर नंगे थे, एड़ियाँ फटी हुईं और धूल से सनी हुईं।
वह धीरे-धीरे सिसक रही थी, लेकिन उस सिसकी में एक गहरा दर्द था—जैसे वर्षों की पीड़ा एक साथ बाहर आ रही हो।
जतिन उसके पास गया और झुककर बोला,
“माँ जी… क्या हुआ? आप क्यों रो रही हैं?”
महिला ने पहले तो कोई जवाब नहीं दिया। फिर अचानक उसने दोनों हाथों से अपना चेहरा ढक लिया और जोर-जोर से रोने लगी। उसके कांपते कंधे उसकी बेबसी की कहानी कह रहे थे।
जतिन थोड़ा घबरा गया, लेकिन उसने नरम आवाज़ में फिर पूछा,
“बताइए माँ जी… शायद मैं आपकी मदद कर सकूँ।”
महिला ने धीरे-धीरे अपने आँसू पोंछे। उसकी आँखें लाल हो चुकी थीं। काँपती आवाज़ में उसने कहना शुरू किया,
“बेटा… मुझे हर महीने 600 रुपये की पेंशन मिलती थी… उसी से मेरा पेट चलता था… मेरा कोई नहीं है… न बेटा, न बेटी…”
उसने एक लंबी साँस ली, जैसे हर शब्द उसके लिए भारी हो।
“लेकिन… पिछले 6 महीने से पेंशन नहीं मिली… मैं इन दफ्तरों के चक्कर काटते-काटते थक गई हूँ…”
जतिन ने ध्यान से उसकी बात सुनी, फिर थोड़ा झुककर पूछा,
“कैसा चक्कर माँ जी?”
वृद्धा ने अपने सूखे हाथों को देखते हुए कहा,
“पहले ट्रेजरी गई थी… वहाँ बाबू ने कहा—समाज कल्याण विभाग जाओ… वहाँ गई तो बोले—हमने पैसे भेज दिए… फिर ट्रेजरी आई तो बोले—बैंक जाओ…”
उसके चेहरे पर एक थकी हुई हँसी आई, जो तुरंत आँसू में बदल गई।
“बैंक गई तो बोले—आधार नहीं जुड़ा… जाओ, उंगलियों की छाप लगवाकर आओ…”
वह अपनी उंगलियों को देखते हुए बोली,
“मैं फिर समाज कल्याण विभाग गई… वहाँ एक कंप्यूटर वाला बैठा था… उसने मेरी उंगलियाँ 25 बार मशीन पर रखवाईं… हर बार साफ करके… लेकिन…”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“लेकिन मेरी उंगलियों में अब कोई निशान ही नहीं बचा बेटा…”
जतिन चौंक गया। उसने ध्यान से वृद्धा के हाथों को देखा। सचमुच, उनकी उंगलियाँ इतनी घिस चुकी थीं कि रेखाएँ लगभग गायब थीं। जैसे जीवनभर की मेहनत ने उनके अस्तित्व को ही मिटा दिया हो।
वृद्धा बोली,
“बर्तन मांजते-मांजते… और उम्र के कारण… सब मिट गया… अब वे कहते हैं—जब तक निशान नहीं आएँगे, तब तक तुम ‘जिंदा’ नहीं मानी जाओगी…”
यह सुनकर जतिन के भीतर कुछ टूट गया।
“जिंदा नहीं मानी जाओगी…”—ये शब्द उसके दिमाग में गूंजने लगे।
वृद्धा ने आगे कहा,
“आज फिर ट्रेजरी गई थी… सोचा शायद दया आ जाए… लेकिन उन्होंने डांटकर भगा दिया…”
वह फिर रोने लगी। इस बार उसकी आवाज़ में गुस्सा नहीं, सिर्फ हार थी।
जतिन कुछ क्षण चुप रहा। उसके चेहरे पर गहरी सोच उभर आई। वह समझ नहीं पा रहा था कि इस स्थिति का समाधान क्या है। उसने बहुत लोगों की मदद की थी, लेकिन यह मामला अलग था—यह सिर्फ गरीबी नहीं थी, यह व्यवस्था की जटिलता थी।
उसने धीरे से पूछा,
“आपका नाम क्या है माँ जी?”
“गंगाबाई…” उसने धीमे से कहा।
जतिन ने उसका हाथ पकड़ लिया।
“माँ जी, आप चिंता मत कीजिए। मैं कोशिश करूँगा…”
लेकिन यह कहते हुए उसे खुद अपने शब्द खोखले लग रहे थे।
वह सोचने लगा—एक ऐसी व्यवस्था, जो ‘सामाजिक सुरक्षा’ के नाम पर बनी है, अगर एक 90 साल की महिला को ‘जिंदा’ साबित करने में असमर्थ है, तो वह सुरक्षा कैसी?
उसके मन में सवालों का तूफान उठने लगा—
क्या तकनीक इंसान से बड़ी हो गई है?
क्या एक मशीन तय करेगी कि कोई जीवित है या नहीं?
और अगर किसी की उंगलियों के निशान मिट जाएँ, तो क्या उसका अस्तित्व भी खत्म हो जाएगा?
गंगाबाई अब चुप हो गई थी। उसकी आँखें कहीं दूर देख रही थीं—जैसे वह इस दुनिया से उम्मीद छोड़ चुकी हो।
जतिन ने अपने झोले से पानी की बोतल निकाली और उसे दी।
“थोड़ा पानी पी लीजिए…”
गंगाबाई ने काँपते हाथों से बोतल ली और धीरे-धीरे पानी पीने लगी।
जतिन के मन में अब एक दृढ़ता आ रही थी। उसने सोचा—यह सिर्फ एक महिला की समस्या नहीं है, यह पूरे सिस्टम की खामी है। अगर आज गंगाबाई है, तो कल न जाने कितने लोग होंगे।
उसने निश्चय किया कि वह इस मामले को अपने एनजीओ के माध्यम से उठाएगा। अधिकारियों से बात करेगा, मीडिया तक ले जाएगा, और अगर जरूरत पड़ी तो कानूनी लड़ाई भी लड़ेगा।
लेकिन फिर भी… उसके मन के एक कोने में एक कड़वा सच था—
“क्या तब तक गंगाबाई जिंदा रह पाएगी?”
उसने गंगाबाई की ओर देखा। वह अब भी वहीं बैठी थी—थकी हुई, टूटी हुई, लेकिन फिर भी जीवित।
जतिन के मन में एक वाक्य गूंजा—
“यह कैसी सामाजिक सुरक्षा है… जो सबसे कमजोर को ही असुरक्षित छोड़ दे?”
उसने धीरे से कहा,
“माँ जी… यह सुरक्षा नहीं है… यह तो अधूरी सुरक्षा है…”
और बरगद के पेड़ के नीचे, उस भीड़-भाड़ वाले कलेक्ट्रेट में, एक बूढ़ी महिला और एक युवा सामाजिक कार्यकर्ता—दोनों एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसे थे, जहाँ से बाहर निकलने का रास्ता साफ नहीं दिखता था।
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