paper in Hindi Moral Stories by राज बोहरे books and stories PDF | कागज़

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कागज़

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सहाय मास्साब ने अपने पुराने, हल्के फट चुके भूरे बैग को धीरे से खोला। अंदर रखी नोटों की गड्डी को उँगलियों से दबाकर जैसे तसल्ली कर ली—पूरा दस हजार है। फिर बैग को ऐसे बंद किया मानो कोई राज़ छिपा रहे हों।

धोती का किनारा थोड़ा ऊपर खिसक गया था, उसे ठीक करते हुए उन्होंने चारों तरफ नजर दौड़ाई। पेंशन कार्यालय की दीवारों पर पान की पीक जमी थी, फाइलों के ढेर पर धूल की मोटी परत। पंखा चर्र-चर्र की आवाज़ करता हुआ घूम रहा था।

वे बेंच पर बैठे थे—सुबह से। घड़ी में तीन बज चुके थे।

“मास्साब, आज तो काम हो जाएगा न?” बगल में बैठे एक बुजुर्ग ने पूछा।

सहाय मास्साब हल्के से मुस्कराए—“भगवान जाने… बाबू की मर्जी पर है।”

लेकिन भीतर ही भीतर वे जानते थे—भगवान नहीं, दस हजार की गड्डी मर्जी बनाएगी।

उनकी आँखों के सामने अतीत का परदा खुल गया—स्कूल का बरामदा…याद आया

हलवाई बड़े भगोने में खिचड़ी चला रहा था, “मास्साब…” वह मुस्कराया, “एक बात कहूँ?”

“कहो…” सहाय मास्साब ने हाजिरी रजिस्टर में नाम टिक करते हुए कहा।

“आप तो पूरे एक सौ दस बच्चों की हाजिरी बना दिया करो… रोज सौ-सौ ही आते हैं… दस नाम और जोड़ दोगे तो क्या फर्क पड़ेगा?”

मास्साब ने चश्मा उतारकर उसकी तरफ देखा। चेहरे पर सख्ती आ गई-“ये क्या कह रहे हो तुम?”

हलवाई हँस पड़ा था—“अरे मास्साब, इतना सीरियस क्यों हो जाते हो? उन दस बच्चों का राशन हम बाँट लेंगे… आपका घर का रसोइ-खर्चा भी मैं देख लूंगा।”

“भले आदमी!” मास्साब की आवाज़ ऊँची हो गई, “ये चोरी है… पाप है!”

हलवाई ने कंधे उचकाए—“पाप-पुण्य छोड़ो मास्साब… ज़िंदगी देखो। आज थोड़ा बचाओगे तो कल बच्चों को अच्छे स्कूल में पढ़ा पाओगे। वरना सरकारी स्कूल में पढ़ाकर क्या बना लोगे?”

मास्साब ने उंगली ऊपर उठाई—“वो ऊपर वाला देख रहा है। गैर हाजिर बच्चों को हाजिर दिखाना… गरीबों के हक पर डाका डालना है।”

हलवाई ने ठहाका लगाया—“ऊपर वाला? ऊपर वाले को छोड़ो मास्साब… नीचे वाले सिस्टम को देखो। बाकी सब मास्टर यही कर रहे हैं।”

“मैं नहीं करूँगा!” मास्साब ने दृढ़ता से कहा।

हलवाई सिर हिलाते हुए बोला—“बहुत भोले हो आप… एक दिन पछताओगे।”

“मास्साब… मास्साब…” चपरासी की आवाज़ ने उन्हें वर्तमान में खींच लिया।

“जी…” वे चौंककर उठे।

“अभी नहीं… बाबू साहब चाय पीने गए हैं…” चपरासी बोला और आगे बढ़ गया।

सहाय मास्साब फिर बैठ गए। आँखों में थकान थी।

‘पछताओगे…’ हलवाई के शब्द फिर गूंजे।

उन्होंने सोचा—क्या सच में मैं गलत था?

उनके दोनों बेटे याद आए—सादा कपड़े, थके चेहरे।

बड़ा बेटा, विद्याकांत—एक प्राइवेट स्कूल में तीन हजार रुपये महीने पर पढ़ाता है।

छोटा—विष्णुकांत, किसी कोचिंग में पार्ट टाइम कोच ।

“बाबूजी…” एक दिन विद्याकांत ने कहा था, “अगर हमें अच्छे कॉलेज में पढ़ा देते तो शायद आज हमारे घर का हाल कुछ और होता…”

मास्साब चुप रह गए थे। उस दिन पहली बार उन्हें अपने फैसलों पर संदेह हुआ था।

“मास्साब!” फिर आवाज़ आई—इस बार तेज़।

वे घबराकर उठे। सामने पेंशन बाबू बैठा था। करीने से इस्त्री की हुई शर्ट, गले में सोने की चेन, होंठों पर गुटखे की लाली।

“आइए…” उसने कुर्सी पीछे सरकाते हुए कहा।

सहाय मास्साब धीरे से बैठे।

“तो… लाए हैं?” बाबू ने सीधे पूछा।

मास्साब का गला सूख गया—“हाँ…”

उन्होंने बैग खोला। हाथ काँप रहे थे।

“जल्दी करिए मास्साब…” बाबू ने ऊबते हुए कहा।

मास्साब ने नोटों की गड्डी निकाली… लेकिन हाथ वहीं रुक गया।

“क्या हुआ?” बाबू ने आँखें सिकोड़ लीं।

मास्साब की आँखों में द्वंद्व साफ दिख रहा था—“एक बात पूछूँ?”

“पूछिए…”

“तुम… मेरे स्कूल में पढ़े हो न?”

बाबू मुस्कराया—“जी मास्साब… मैं रमेश… आठवीं में आपसे गणित पढ़ा था।”

सहाय मास्साब के चेहरे पर जैसे किसी ने चाकू फेर दिया हो।

“तो तुम ही…?” वे बुदबुदाए।

“जी…” रमेश ने सहजता से कहा, “और आज आपकी फाइल मेरे पास है।”

“फाइल…” मास्साब हँसे—एक कड़वी हँसी।

“जानते हो रमेश…” वे धीमे बोले, “मेरी पेंशन क्यों रुकी है?”

“हाँ… एक हजार ज्यादा फिक्स हो गई थी… गलती से…” रमेश ने कहा।

“गलती…?” मास्साब की आवाज़ भर्रा गई, “उस गलती की सजा मुझे एक साल से मिल रही है… और अब उसे ठीक करने के लिए मुझे तुम्हें रिश्वत देनी पड़ रही है…”

रमेश चुप रहा।

“पच्चीस हजार माँगे थे तुमने…” मास्साब बोले।

“अब तो दस में मान गए…” रमेश ने हल्के से मुस्कराकर कहा।

“और ये दस हजार…” मास्साब ने गड्डी को देखा, “मैंने उसी हलवाई से उधार लिए हैं… जिसे मैं जीवन भर ईमानदारी का पाठ पढ़ाता रहा…”

कमरे में सन्नाटा छा गया।रमेश ने धीरे से कहा—“मास्साब… सिस्टम ऐसा ही है…”

“सिस्टम…?” मास्साब ने उसकी आँखों में देखा, “या हम जैसे लोग उसे ऐसा बना देते हैं?”

रमेश ने नजरें चुरा लीं। मास्साब का हाथ अब भी गड्डी पकड़े हुए था। पसीना उनकी कनपटी से बह रहा था।

“जानते हो…” वे बोले, “जब तुम पढ़ते थे… तब मैं बच्चों से कहता था—ईमानदारी सबसे बड़ी पूँजी है…”

“हाँ…” रमेश ने धीमे से कहा।

“और आज…” मास्साब की आवाज़ टूट गई, “आज मैं खुद उस पूँजी को बेच रहा हूँ…”

कुछ पल दोनों चुप रहे। फिर अचानक मास्साब ने गड्डी मेज पर रख दी।

“लो…” उन्होंने कहा, “निपटा दो काम…”

रमेश ने गड्डी उठाई, फाइल के नीचे सरका दी।

“ठीक है… अभी कर देता हूँ…”

उसने फाइल खोली, कुछ कागज पलटे, मुहर लगाई—ठप!

“हो गया…”

सहाय मास्साब ने अविश्वास से देखा—“इतनी जल्दी?”

“काम तो पाँच मिनट का ही था…” रमेश बोला।

मास्साब की आँखों में आँसू आ गए।

“पाँच मिनट…” वे बुदबुदाए, “और मैं एक साल से भटक रहा हूँ…”

वे धीरे से उठे, “चलता हूँ…”

रमेश ने औपचारिकता में कहा—“जी मास्साब!… और हाँ… कभी जरूरत हो तो बता देना…”

सहाय मास्साब ने उसकी ओर देखा—गहरी, चुभती नजर से“जरूरत…” वे मुस्कराए, “जरूरत तो मुझे आज खुद को माफ करने की है…”

वे मुड़े और बाहर निकल आए। सीढ़ियाँ उतरते हुए उनके कदम भारी थे।

बाहर धूप तेज़ थी। उन्होंने आसमान की ओर देखा।

“हे ईश्वर…” उनके होंठ काँपे, “मैं हार गया…”

फिर अचानक वे ठिठक गए। उनके मन में एक और आवाज़ उठी—क्या सच में हार गया… या अभी भी कुछ बचा है? उन्होंने बैग को कसकर पकड़ा।

घर पर बीमार पत्नी थी… बेटों की तंगी थी…

और जेब में था—एक ‘कागज़’… पेंशन का।

वे धीरे-धीरे आगे बढ़े। पीछे दफ्तर में फाइलें जस की तस पड़ी थीं—हर फाइल में एक कहानी…हर कहानी में एक मास्साब…और हर मास्साब के भीतर—एक अधूरा द्वंद्व… एक टूटा हुआ कागज़।

 

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