villain in Hindi Short Stories by Ramesh Desai books and stories PDF | खलनायक

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खलनायक

             

              खलनायक ??  रंजन कुमार देसाई

                        

         कल उस ने दोबारा ख़ुदकुशी करने का प्रयास किया था. उस वजह से भरत समेत कोई रात को सो नहीं पाया था. जगराते की वजह से उस की आंखे छह घंटे की नींद के बावजूद खुल नहीं रही थी.

         फिर भी नियमानुसार वह अस्पताल पहुंचा तब विपुल का बिस्तर खाली था! यह देखकर उस के दिमाग़ में तरह तरह की  आशंका जाग उठी थी. पलभर में उस ने ना जाने क्या क्या सोच डाला था!! बावरी सी हालत में उस ने सिस्टर को सवाल किया था. 

      " सिस्टर! 21 नंबर का पेशन्ट कहाँ गया? "

        विपुल ने अगली रात टेरेस पर से कूदकर ख़ुदकुशी करने का प्रयास किया था. यह बात स्मृत होते ही उस के दिलों दिमाग़ में भय की एक लहर सी दौड़ गई.

       " डोक्टर की अनुमति लेकर उस के डेड़ी उसे फिल्म देखने ले गये हैं. "

        सिस्टर से जानकारी मिलने पर भरत के दिमाग़ की तंग हुई नसे ढीली हो गई थी.

        विपुल को फिल्मे देखने का बड़ा शौक था. हप्ते में दो तीन फिल्मे देखना उस के लिये आम बात थी. देखी हुई फिल्मे बारबार देखना उसे अच्छा लगता था.

        भरत के साथ वह 'जय जवान जय किसान' पर बनी ' उपकार ' फिल्म देखने गया था. मलंग चाचा की भूमिका सदैव खल नायक की भूमिका करने वाले अभिनेता ने बड़ी बखूबी निभाया था.

       एक दृश्य में टेक्सी ड्राइवर मीटर डाउन करता हैं. उस वक़्त दो युवान एक लड़की को टेक्सी में बिठाते हैं.. दृश्य बिल्कुल चीलाचालू था. लेकिन उसे टेक्सी के मीटर के साथ कुछ कनेक्शन था. विपुल को यह दृश्य उमदा लगा था. थियेटर से बाहर निकलते हुए उस ने तारीफ करते हुए अपने दोस्त को कहां था :

       " देखा भरत! इस का मतलब समझ आया? लड़कीने भाडा लेकर अपने आप को समर्पित कर दिया! "

        फिल्म देखने से उस की मानसिक स्थिति में बदलाव आ सकता हैं. यह सोचकर डोक्टर ने सारे क़ानून का अनादर कर के विपुल को फ़िल्म देखने की रजामंदी दी थी.

       वह काफ़ी लागणी प्रधान और संवेदनशील युवान था. बहुत ही कम आयु में उस ने अपनी मा को खो दिया था. नई मा का घर में आगमन हुआ था. पिता का नकारात्मक स्वभाव उसे वारसे में मिला था. मा का प्रेम उस के नसीब में नहीं था. बहन भी काफ़ी समय नानी मा के पास गांव में रही थी. इस लिये दोनो के बीच कोई प्यार स्थापित नहीं हो पाया था.

        स्नेह, प्यार के लिये विपुल काफ़ी तड़पा था, तरसा था. उस समय पड़ोश में रहने वाली अरुणा उस की जिंदगी में दाखिल हुई थी. नवरात्रि के उत्सव के दौरान डांडिया रास खेला जाता था.

       उन दोनो उस की मुलाक़ात अरुणा से हुई थी. धीरे धीरे मुलाकाते बढ़ने लगी थी. दोनो सक्रिय तरीके से डांडिया खेलते थे. उस के लिये दोनो को भागीदारीमें इनाम भी मिले थे. अरुणा के सानिध्य में विपुल अपनापन महसूस कर रहा था.

       कल्पित श्रुष्टि में अरुणा दोहरी भूमिका निभा रही थी. विपुल  बहन और माशूका की दोहरी लागणी का शिकार हो गया था. उस के संसर्ग में वह अनिद्रा का भोग बन गया था.

        देर रात उस की आंखे बंद होती थी. तो सपने में उसे अरुणा प्रेमिका के रूप में नजर आती थी.

       दोनो डबल सवारी साइकिल पर घूम रहे हैं. विपुल ने अपना सर अरुणा के कंधो पर रख दिया हैं. उस पर वह शरमा रही हैं. मानो आँखों आँखों में कह रही हो.

       " दुनिया हमें देख रही हैं. कुछ तो शर्म करो. "

       लेकिन विपुल अपनी धुन में मस्त उस को फ़िल्म के गीत के जरिये जवाब देता हैं!!

      " हम तुम युग युग से गीत मिलन के गाते रहे  हैं. "

       और अरुणा की कमर पर हाथ ऱख दिया था.

      इस हरकत से वह चिढ़ गई थी. उस की परवाह न करते हुए उस के गालों को बिंदास्त  चुम लिया था.

       सजाग अवस्था में उस की कल्पना अलग रंग अख्तयार करती थी. अरुणा हाथ में राखी लेकर उसे बांधने को आ रही हैं. और विपुल को उस में अपनी बिछडी हुई बहन का दर्शन होता हैं.

       स्नेहावेग में विपुल अरुणा को अपनी बाहों में थाम लेता था. तो कभी उस के गुलाबी गालों को सहला लेता था. बहुधा दोनो साथ ही स्कूल जाने को निकलते थे. कभी वह उस की उंगली पकडकर भी चलता था. इस लिये उस ने कोई नाराजगी जाहिर नहीं की थी.

        दोनो साथ ही वांचन करने को बैठते थे. अरुणा सुबह जल्दी उठ नहीं सकती थी. उस के कहने पर विपुल रोज उसे उठाने उस के घर जाता था.

        एक बार सोती अरुणा को उठाने के प्रयास में उस ने अरुणा के स्तन युग्म पर हाथ टेक दिया था. उसे हाथ उठाने का मन नहीं हुआ था. लेकिन उस की मा को आती देखकर अपना हाथ उठा लिया था.

        और आवाज देकर उसे जगाया था.

        फिर तो अरुणा को जल्दी उठने की आदत लग गई थी. वह पांच बजे उठ जाती थी और विपुल को उठाती थी. ज्यादातर तो उस की आंखे खुल जाती थी, फिर भी अरुणा का स्पर्श पाने की लालच में गाढ़ निद्रा का नाटक करता था. वह उसे गुदगुदी कर के उठाती थी.

        उस की आँखों के सामने अरुणा उदय के साथ प्यार की नैया हांक रही थी. उन के व्यवहार को देखकर विपुल को रिश्ते के बारे में गलत सबक सिखने को मिला था. दोनो प्यार के रास्ते पर बेधड़क आगे निकल गये थे. दोनो एक दूसरे का स्पर्श करते थे. अरुणा उस की गोद में सो जाती थी, उदय उसे चूमता था, दबोचता था, जिस ने विपुल को रिश्ते की गलत परिभाषा सिखाई थी.

        एक भाई अपनी बहन के साथ ऐसा कर सकता हैं. उसे भी उदय का अनुकरण करने को जी करता था. लेकिन उस का शर्मीला स्वभाव उस की आड़े आ जाता था.

        दोनो की सगाई हों गई थी. यह सुनकर विपुल चौंक उठा था. क्या एक बार किसी को बहन मानकर उस से शादी हों सकती हैं? विपुल के दिल में यह सवाल उठा था. लेकिन उस का कोई जवाब वह तलब नहीं कर पाया था.

       अरुणा के साथ के रिश्ते को लेकर रोज विपुल तंगदिली का एहसास कर रहा था. वह अरुणा को छोड़ भी नहीं सकता था. उस के लिये वह क्या थी? खुद उसे पता नहीं था. वह द्विरंगी प्यार का शिकार हों गया था. उस ने कभी सजाग अवस्था में उसे प्रेमिका के रूप में देखा नहीं था. उस की अनुपस्थिति में वह काफ़ी बेचैनी महसूस करता था.

       एक दिन वह अपने मामा के बेटे के सगाई समारोह को लेकर पूरा दिन बाहर रही थी.

       शाम को वह वापस लौटी थी. पहने हुए कपड़े में वह विपुल के घर आटा मांगने को आई थी. उसे देखकर विपुल की आँखों में चमक आ गई थी. उस ने अरुणा की चोटी पकडकर भावुक मुद्रा में सवाल किया था :

       " कहाँ थी दिनभर? "

       उस की साड़ी का पल्लू छाती से नीचे सरक गया था.

       अरुणा के दोनो हाथ व्यस्त थे. इस लिये विपुल ने उस की मदद करते हुए उस का पल्लू अपने हाथों पूर्ववत ऱख दिया था. ऐसा करने से उस की उंगली अरुणा की छाती को लग गई थी!!

       उस पर उस ने थोड़ी नाराजगी जाहिर की थी. उस ने विपुल के सवाल का कोई जवाब नहीं दिया था.

       कुछ देर बाद विपुल उस के घर गया था. उस वक़्त अरुणा ने स्मित के साथ उस का अभिवादन किया था. इतना ही किचन में ले जाकर मिठाई की डिश मेरे सामने ऱख दी थी. यह सौजन्य देखकर विपुल का चेहरा खिल उठा था.

        उदय के दुश्मन उस के पीछे पड़ गये थे. विघ्न संतोषी समुदाय इस प्रणय पंखी ओ को अलग करने की कोशिश में जुटे हुए थे. उन्होंने उदय को मारने की योजना बनाई थी. उस के लिये विपुल के दोस्तों को तैयार किया था और उस पर दोष जड़ने की गंदी साजिश की थी.

         विपुल बिल्कुल भोला और सरल था.. उसी ने ही अरुणा को जाकर जानकारी दी थी :

       " नुक्कड़ पर तीन लडके उदय को मार रहे हैं! "

        यहाँ तक तो बात ठीक थी. लेकिन उस सत्यवादी आत्मा ने वह भी बता दिया था. " वह तीनो मेरे क्लास के मित्र थे. "

       अब उस का क्या मतलब निकल सकता हैं?

       सुनकर अरुणा के भौए चढ़ गये थे. वह कुछ बोली नहीं थी. लेकिन मानो कह रही थी :

       " दुष्ट मुझे पाने के लिये गुंडागर्दी पर उतर आया?! "

        उस की यह नादानी उसे भारी पड़ गई थी. वह खलनायक नहीं था. फिर भी उस के दामन पर उस का सिक्का लग गया था." 

        वह अरुणा को छोड़ नहीं सकता था. काफ़ी परेशान था. इस स्थिति में उस ने अरुणा को एक चिट्ठी लिखी थी. और सब कुछ खतम हों गया था.

       चिट्ठी पढ़कर उस ने विपुल को उदय का हरीफ जाहिर किया था. यह सुनकर उसे बहुत बड़ा धक्का लगा था. ऊस ने कभी सोचा नहीं था. वह बात सामने आ गई थी.

       अरुणा ने उसे कहां था : " I am not your lover. "

       विपुल ने पाँव छूकर अरुणा की माफ़ी मांगी थी. उस को भगवान का दर्जा दिया था.

       " क्या बहन भगवान नहीं हों सकती हैं? "

         अरुणा के व्यवहार से भोले विपुल को कोई महा पाप करने का एहसास हुआ था. प्रायश्चित के तौर पर उसने अपना हाथ जला दिया था. यह देखकर उस की बहन रश्मि अरुणा को बुला लाई थी. उस ने विपुल के जले हाथों को बरनोल लगाया था. लेकिन उस के जले दिल का क्या? उस के लिये कोई उपचार नहीं था. अपनी द्विरंगी लागणी का इतिहास रचकर विपुल उस की जिंदगी से दूर हों गया था.

          कोलेज के प्रथम साल में जीवन साथी की कामना रंग लाई, थी,उसे पंख से लग गये थे उसे कई लड़कियों में अपनी जीवन साथी की झलक नजर आई.thi लेकिन उस की भीरू प्रकृति उस के आड़े आ गई थी.

        उन दिनों उस के दोस्त की बहन रेखा से उस का परिचय हुआ था.. उस का चेहरा एक फ़िल्म अभिनेत्री से मिलता था. वह नियमित तौर से उस के घर आता जाता था. वह भी साथ में पढ़ती थी. इस वजह से दोनो एक दूसरों के काफ़ी नजदीक आ गये थे. और विपुल के दिल में उस के प्रति प्रेम सरिता छलक उठी थी. वह अपनी लागणी को काबू में रखने में नाकाम साबित हुआ था.

          लेकिन अफ़सोस रेखा की जीवन डोर किसी और से बंध चुकी थी. उस की सगाई हों चुकी थी. इस लिये आगे बढ़ने का कोई रास्ता नहीं था.

        उस के मन के अज्ञात कोने में गलत ख्याल आने लगे थे. एक दृश्य उसे लगातार परेशान करता था. मानो वह रेखा के मंगेतर के सीने में खंजर भोंक रहा हैं. अपने भीतर उठते विचारों को अनुमोदन देने के लिये उस ने रेखा को मिलने लाइब्रेरी में बुलाया था, लेकिन उस ने मिलने से इन्कार कर दिया था.

        बात दोस्त के कानो तक पहुंची थी. और विपुल ने निष्कपट अपने प्यार का इजहार कर लिया था. और  रेखा को बहन मानकर उस से राखी बंधवाकर उस की जिंदगी से बाहर निकल आया था.  वह हरगिज रेखा की सलामती के लिये ईश्वर से प्रार्थना करता था.

         लेकिन विधाता भी रूठ गई थी . उस का मंगेतर शेखर मोरबी गया था. वहां बाढ़ आयी थी . उस में वह बह गया था. यह जानकर रेखा के सिर पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा था. शोक समारोह में विपुल काफ़ी नर्वस हो गया था. उस के मौत के लिये वह अपने आप को, अपनी गलत सोच को जिम्मेदार ठहराता था.

        उस के दिमाग़ में एक बार शेखर की हत्या करने का ख्याल आया था. इसी वजह से ऐसा अंजाम आया था. उस की स्मृति से विपुल के दिल मे आंसू का महा सागर उमट पड़ा था. उस की हालत देखकर रेखा के भाई को उस की सच्चाई का एहसास हुआ था.

        और कुछ ही दिनों में रेखा की शादी हो गई थी.

        उस के बाद विपुल का दिल गरिमा पर आ गया था. अनुराग उस का दूसरा दोस्त था. जो उस के काफ़ी करीब था.

        एक बार फ्री पीरियड में केंटीन में दोनो अकेले थे. उस वक़्त मौका देखकर उस ने अनुराग को अपने दिल की इच्छा जाहिर की थी:

        " आई लव गरिमा! "

        " But she is engaged! "

        सुनकर विपुल को मानो बिजली सा झटका लगा था.  मानो उस ने जहर पी लिया हो ऐसा महसूस हुआ था.  उस ने अनुराग को उस के बारे में जाँच पड़ताल करने की गुजारिश की थी. 

        समाचार सही थे. गरिमा की सचमुच में सगाई हो गई थी और छुट्टी में उस की शादी भी तय हो गई थी.

        और फिर एक बार उसे प्रवेश बंध इलाके से ' U' टर्न लेना पड़ा था.

       भगवान क्यों हर बार उसे ' No entry' इलाके में ले जाता हैं. विपुल कुछ समझ नहीं पा रहा था.

       उस की हालत नाजुक थी. इस हालत में उस का हर किसी पर से विश्वास उठ गया था, जिस में खुद अनुराग भी शामिल था.

       विपुल की कुछ उस के ही दोस्त मजाक करते थे. एक स्कूली यार ने अनुराग और दूसरे दोस्तों के खिलाफ उस के कान भर दिये थे. उस के दिल में अनुराग प्रति शक की चिंगारी भड़क उठी थी. होरोस्कोप के आधे अधूरे ज्ञान ने उसे भटका दिया था. इस लिये वह गरिमा की सगाई की बात को मानने को तैयार नहीं था :

       उस के दिमाग़ पर एक ही भूत सवार था:

       " बस गरिमा को बुलाओ. "

        गरिमा के आगमन के पहले वह नकारात्मक तरीके से जिया था, लेकिन उस के आने के बाद मानो चमत्कार हो गया था. वह रातोरात सकारात्मक हो गया था.

          एक पराई लड़की को कैसे घर बुलाया जा सकता हैं? अरुणा खुद इस बात से परेशान थी. विपुल की हालत देखकर उस का दिल पसीज गया था.. अनुराग भी असमंजस में पड़ गया था. विपुल ने उस की दोस्ती को दाव पर लगा दिया था.

       लोग क्या कहेंगे?  उस की परवाह ना करते हुए वह अपने दोस्तों को लेकर कोलेज क्लर्क से गरिमा का पता लेकर उस के घर पहुंच गया था. 

       उस का घर मेहमानों से भरा हुआ था.

       इस हालत में अनुराग असमंजस महसूस कर रहा था.

       क्या करुं?

       उस वक़्त गरिमा कुछ वजह से बाहर आई थी. उस वक़्त उस की नजर अनुराग पर पड़ी थी. उसे देखकर ताजुब हुआ था.

       आख़िरकार हिम्मत कर के उस ने सारी बात गरिमा को बता दी थी. 

       सब सुनकर विपुल की गलतफहमी मिटाने के लिये वह उस के घर आने को तैयार भी हो गई थी और विपुल से फोन पर बात करने का सौजन्य भी दिखाया था. 

       दूसरे दिन दोपहर को गरिमा ठीक दो बजे अपनी सहेली को लेकर ऊस ke बिल्डिंग में दाखिल हुई.थी उस वक़्त विविध भारती रेडियो पर उस के आगमन का मानो गीत के जरिये स्वागत हुआ था.

        ' बहारों फूल बरसाओ मेरा मेहबूब आया हैं, (2)         हवाओ रागनी गाओ मेरा मेहबूब आया हैं...

        यह सुनकर विपुल का विश्वास बढ गया था. उस से ऊस की उम्मीदें बुलंद हुई थी.

        उस ने विपुल को बताया था.

        " मेरी सगाई हो चुकी हैं!! "

        कुछ दिन  के बाद उस की शादी होने वाली थी.

        उस बात का विपुल ने स्वीकार किया था.

        लेकिन इस मौके पर ' मेरा मेहबूब आया हैं ' यह सुनकर उसे ईश्वर के बारे में संदेह हुआ था. क्यों उस ने उसे झूठा दिलासा दिया था?

        फिर भी उस ने बिना कोई दलील हकीकत का स्वीकार करते हुए, फ़िल्म अभिनेता राज कुमार की अदा में उस के सिर पर हाथ रखकर विपुल ने उसे आशीर्वाद दिया था.

      " आज से तुम मेरी बहन हो. मैं तुम्हे उस के अलावा अन्य कोई नजरों से देखूंगा नहीं, अगर ऐसा हुआ तो वह मेरी जिंदगी का आखिरी दिन होगा. "

       और उस के हाथों में 51 रूपये थमा दिये थे.

       वह राखी से विपुल की सोच बदलने के लिये उस के घर गई थी, लेकिन उस के नोबल व्यवहार ने उस की कोई जरूरत नहीं छोड़ी थी. और वह राखी बाहर कठघरे पर छोड़ गई थी.

       उस के जाने के बाद विपुल पुरी तरह टूट गया था. उस के विलाप से समग्र बिल्डिंग में आतंक सा मच गया था. उस का रुदन गरिमा के कानो से टकराया था. सुनकर पलभर वह विचलित सी हो गई थी.

       लेकिन उस की सहेली उसे बिल्डिंग से बाहर ले गई थी.

       विपुल की हालत देखकर उस के मात पिता और छोटी बहन रश्मि शोक की गर्ता में डूब गये थे.

       विपुल के परिताप ने सारी सीमा पार कर दी थी. फेमिली डोक्टर ने उसे मानस चिकित्सक को दिखाने की राय दी थी और उसे अस्पताल में भर्ती किया गया था. दवाईया की असर तले वह पूरा समय सोता रहता था. दवाई की असर खतम होने पर वह पागल की तरह चिल्लाने लगता था. वह एक ही बात करता था.

        " मुझे मर जाना हैं! "

        ख़ुदकुशी ने ख्याल ने उस को अपनी गिरह में कैद कर लिया था.

        24 घंटो उस की निगरानी करनी पड़ती थी.

        उस की हालत बिगड़ती जाती थी. इस स्थिति में उसे बिजली के झटके देने पड़ते थे. किसी को उसे मिलने पर प्रतिबन्ध था. अनुराग उसे मिले बिना ऱह नहीं पाता था. दोस्त की पीड़ा देखकर उस का दिल फट जाता था. रश्मि अपने भाई को मिलने तरसती थी, लेकिन उसे भाई से मिलने की मनाई थी. इस लिये वह हर पल रोती रहती थी.

        फिर भी भाई को टिफिन देने के बहाने वह अंदर जाती थी.

        अनुराग सब कुछ समझता था. प्यार में मिली नाकामी ने विपुल को पुरी तरह तोड़ दिया था. रिश्तेदार और परिचित लोग उसे मेली विद्या का प्रताप मानते थे. प्यार में मिली नाकामी ने विपुल की संवेदना को कुचल दिया था.

       रिश्तेदारों तरह तरह की सलाह मशवरा देते थे.

       विपुल की एक बात अनुराग भूल नहीं पाता था.

       " इस बार नाकामी को झेलना मेरे लिये नामुमकिन होगा!"

        अस्पताल से डिस्चार्ज मिल गया था. उस के मात पिता उसे हवा बदली के लिये माथेरान ले गये थे.

         वहाँ इत्तेफाकन उस का सामना गरिमा और उस के पति से हो गया था. वह लोग हनीमून के लिये आये थे.

         उसे देखकर विपुल के घाव ताज़ा हो गये थे.

         उस ने पराई अमानत से शादी करने का ख्याल अपने मन में किया था यह बात याद आते ही वह गुनाह की आग में जकड गया था. वह ज्यादातर प्रताड़ित हो गया था.

       भगवान ने उस के नसीब में वैवाहिक सुख लिखा नहीं था. उस ख्याल ने उसे फिर से ख़ुदकुशी करने पर आमादा कर दिया था.

       मात पिता से नजर चुराकर उस ने खाई की ओर दौड़ लगाई थी.

       उस वक़्त शूटिंग के लिये आये फ़िल्मी जुथ ने उसे बचा लिया था.

        " फिर क्या हो गया?  "

        उस की हालत देखकर उस के मात पिता भयभीत से हो गये थे वह लोग अपने बेटे को मुंबई ले आये. पुन: अस्पताल में भर्ती किया था. फिर से बिजली के झटके देने की नौबत आन पड़ी थी

       अस्पताल की बेंच पर बैठा अनुराग अतीत में खो गया था.

       उसी वक़्त एक जानी पहचानी आवाज उस के कानो से टकराई थी

        ' आगे भी जाने ना तु, पीछे भी जाने ना तु,                           जो भी हैं बस यहीं एक पल हैं. '

         विपुल फ़िल्म के गीत को गुणगुनाते हुए वॉर्ड में दाखिल हुआ था. 

         उसे देखकर अनुराग ने उसे सवाल किया था.

         " क्या वक़्त देखकर आया? "

         लेकिन वह फ़िल्म के ताजे देखे हुए दृश्य को याद कर रहा था:

          " जिन के अपने घर शिशो को होते हैं, वह दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते चिनोय शेठ. "

        राज कुमार का यह संवाद विपुल के दिलों दिमाग़ में घर कर गया था.

        इस हालत में ना तो उस ने अपने दोस्त को देखा था, ना तो उस की बात सुनी थी!

       अनुराग ने दोबारा सवाल किया तो उस ने हकार में सिर हिलाया था.

       उस पर अनुराग ने सवाल किया था.

       " कितनी बार? "

       " छह बार! " उस ने जवाब दिया था.

        सुनकर अनुराग को ताजुब हुआ था.

        खुद अनुराग ने विपुल की जिद पर दो बार उस के साथ फ़िल्म देखी थी.

       भाई के सुख की खातिर अपने प्यार की बलि चढ़ाने वाले राज कुमार के अन्य संवाद को याद कर के विपुल की आंखे छलक उठती थी.

       " बस मीना! रवि को संसार के कोई भी सुख से वंचित मत रखना."

        राजा, राज कुमार मीना को बेहद प्यार करता था. जो एक तरफा था.

       एक कमजोर घड़ी में उसे पाने के लिये वह रवि की हत्या करने को तैयार हो जाता हैं. और उस के वह होटल में पहुंच जाता हैं, जहाँ रवि रहता था. उस वकत उसे पता चलता हैं. वह तो अपना बचपन में बिछड़ा भाई हैं. यह जानकर अपने भाई की खातिर सब कुछ कुर्बान करने तैयार हो जाता हैं.

        फ़िल्म का एक अंश उस के जीवन से मिलता जुलता था. इस लिये विपुल ने ' वक़्त ' फ़िल्म बार बार देखी थी.

       छोटी उम्र में एक ज्योतिष ने उस के दिमाग़ में ठसा दिया था.

        " तुम खल नायक बनोगे! "

        विपुल तो उस वक़्त खल नायक का मतलब भी नहीं जानता था. उस ने अपने पिताजी को सवाल किया था. उन्होंने बहुत ही सरल भाषा में जवाब दिया था.

       " दूसरों के सुख का अपने मतलब के लिये भोग लेने वाला शख्स खल नायक कहलाता हैं. "

        ना जाने क्यों लेकिन हर कोई अनर्थ के लिये अपने आप को जिम्मेदार मानने की  विपुल को आदत लग गई थी. उस का यहीं अभिगम पीड़ा देता था.

       सब कुछ ईश्वर की इच्छा के आधीन होता हैं. उस की मरजी के खिलाफ पत्ता भी नहीं हिलता. यही बात अनुराग अपने मित्र को समजाना चाहता था. लेकिन विपुल के भेजे में कोई बात उतरती नहीं थी.

       हर किसी के भीतर अच्छे बुरे गुण दुर्गुण होते हैं. लागणी की दौड़ में वह ट्रेसपासिंग कर गया था. जिस का उसे देर से एहसास हुआ था. फिर भी वह कभी खलनायक नहीं बना था.

        अरुणा के पैर पकडकर उस ने माफ़ी मांगी थी!

        रेखा के हाथो राखी बंधवाई थी!!

       और गरिमा के सिर पर हाथ रखकर शपथ लिये थे.

        हर बार उस ने उमदा व्यवहार किया था. फिर भी लागणी के सुसज्ज कपड़े  पहनकर घूमने वाले अपनों ने ही उसे जलील किया था.  उन्होंने तरह तरह की खबर फैलाई थी.

       इस वजह से कुछ लड़कियो ने उस का साथ छोड़ दिया था.

       विपुल की एक अलग इमेज बन गई थी. वह हर किसी लड़की के पीछे पड़ जाता हैं. यह बात सुनकर सब लड़कियां उस से दूर रहती थी.

       गरिमा की सहेली ने विपुल को खलनायक की उपाधि बक्षी थी.

         उस की तबियत अच्छी थी. दोनो दोस्त बात कर रहे थे. उसे खलनायक का जामा पहनाया गया था. यह बात विपुल को खटक रही थी. इस बात से वह उदास हो जाता था.

           उस वक़्त अनुराग उसे आश्वस्त करता था.

          " दूसरों के दर्दो गम में आंसू बहाने वाला कभी खलनायक नहीं हो सकता."           

           दोस्त की बात सुनकर विपुल का चेहरा खिल उठा था उस ने अस्पताल की बेंच पर बैठे पिताजी की गोद में सिर रखकर एलान किया था. 

          " पापा! मैं बिल्कुल ठीक हूं. और घर जाना चाहता हूं. "

          " मैं कल सुबह ही तुम्हारा डिस्चार्ज ले लूंगा. "         

          लेकिन?

          आगे भी जाने ना तु, पीछे भी जाने ना तु

         सात बजे रश्मि  अपने भाई के लिये टिफिन लेकर अस्पताल में दाखिल हुई थी और दोनो दोस्त बटाटा वड़ा पर टूट पडे थे. 

        उस वक़्त एक युवती को स्ट्रेचर पर ओपरेशन थियेटर ले जाने की खबर सारे अस्पताल में वाइरल हो गई थी.

        उसे ओपरेशन थियेटर से बाहर लाया गया था उसे वोर्ड में स्थानातरित की जा रही थी. उस वक़्त विपुल की नजर उस युवती पर पड़ी थी उस के साथ उस का पति भी मौजूद था.

        उस का चेहरा देखकर विपुल के सामने सारा विश्व घूमने लगा था.

         सब कुछ ईश्वर के आधीन होता हैं तो उस ने क्यों गरिमा को शादी के कुछ दिनों में अपाहिज बना दिया?

        उस की ईश्वर के प्रति की आस्था की मौत हो चुकी थी.

       समग्र विश्व दुश्मन होने का उसे आभास हुआ था.

       और वह पुन मानसिक संतुलन खो बैठा था.

       उस की हालत देखकर डोक्टर उस के पास दौड़े आये थे.

                       00000000000  ( सम्पूर्ण )

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