Remaining Relations in Hindi Fiction Stories by राज बोहरे books and stories PDF | शेष सम्बंध

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शेष सम्बंध

कहानी-शेष सबंध

 

बरसों बाद विशाखा मायके जाने के लिए अकेली ट्रेन का सफर कर रही थी। अपनी वर्थ खोल कर वह इत्मीनान से लेट गयी। कुछ ही देर हुई थी कि सहसा लगा किचन में कुछ खुला रह गया,शायद सिंक का नल बह रहा था।वह हड़बड़ी में उठी और वर्थ से नीचे उतरते तक भूली ही रही कि वह इस वक्त किचन में नहीं चलती ट्रेन में है। उसके मुँह पर मुस्कुराहट फैल गयी। उसने मन ही मन खुद से कहा-क्या जिन्दगी हो गयी है मेरी!

वाश रूम से लौट कर अपनी वर्थ पर फिर से लेटने तक वह मुस्कान में डूबी रही। अरसे बाद ऐसा हुआ था। शादी के पहले लगभग पन्द्रह साल पहले तो उंसकी सब सखियाँ यूँ ही मुस्कान के साथ चिमगोइयाँ क़रतीं रहती थीं। मानो मुंह मे चॉकलेट घुल रही हो। वे भी क्या दिन थे... सोचते हुए विशाखा को याद आया कि लता की बेटी की शादी में सब मिलेंगी- रमा, नीलू, पुष्पा , चित्रा और चंपा भी। लता तो ब्याह की व्यस्तता में फंसी होगी।

लता का ब्याह बी ए की डिग्री लेंने के पहले ही लोकल के एक परिवार में हो गया था ,इसी कारण आज उंसकी बेटी इतनी बड़ी हो गयी है कि उसका ब्याह हो रहा है।

लंबे अरसे बाद सब मिलेंगी तो बही खाता खुलेगा कि इस बीच किसने क्या क्या अर्जित किया। रमा यह  काउंट करेगी कि किसने नई नौकरी पकड़ी या पुरानी पकड़े रही। किसने कितने बच्चे पैदा किये। किसने नए मकान और फोर व्हीलर लिए। किसको पुराने दोस्त याद आये। कॉलेज जमाने का किसका क्रश उसे फिर से भेंटाया।

विशाखा के खाते में दस और बारह साल के सिर्फ दो बच्चे जुड़ेंगे, दो बेड रूम का फ्लैट औऱ क्रियेटा गाड़ी भी जुड़ेगी। नीलू की तरह वह पेन्टिंग कन्टीन्यू नही रख सकी तो चित्रा की तरह  गीत गाना कन्टीन्यू नहीं रहा,बल्कि सुनना तक कन्टीन्यू नही रहा।

 विवाह के पश्चात विशाखा ने अपने अस्तित्व को खोजने का प्रयास किया था लेकिन असफल रही।  विवाह के बाद वह केवल एक पत्नी और माँ बनकर रह गयी है,  उसके भीतर की रचनात्मकता, उसकी पहचान और उसकी अभिव्यक्ति मरती चली है।

 विशाखा को लगा कि  विवाह संस्था के भीतर हर स्त्री की मानसिक पीड़ा, आत्म-संघर्ष और पहचान की खोज इसी तरह असफल होती है। पति-पत्नी का संबंध भी  केवल दांपत्य जीवन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें प्रेम, अधिकार, असुरक्षा, मनोवैज्ञानिक उलझनें और सामाजिक दबावों का मिश्रण दिखाई देता है।

चित्रकार औऱ गायक विशाखा अपने शुद्ध व्यापारी पति की बेरुखी, आपसी संवाद की कमी और आत्मीयता के अभाव से पीड़ित होती है। वह संबंध को बचाना भी चाहती है, परंतु बार-बार टूटते संवाद उसे भावनात्मक रूप से थका देते हैं।

उसका  विवाह एक संस्था नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक युद्ध का क्षेत्र बन गया है, जिसमें दोनों पक्ष अपनी-अपनी भूमिका निभा रहे हैं, परंतु कोई समाधान नहीं निकल रहा ।

प्रोफेसर का जॉब काट रही नीलू  सखियों के  बीच बातचीत करते हुए अक्सर कहती है " पारिवारिक संबंध केवल नाम मात्र की उपस्थिति से जीवित नहीं रहते, उन्हें संवेदनशीलता, संवाद और समर्पण की आवश्यकता होती है।"

 चित्रा इस चर्चा में प्रायः विवाह को केवल एक सामाजिक प्रक्रिया नहीं मानती, बल्कि उसे व्यक्ति के जीवन में आने वाले परिवर्तन, संघर्ष और यथार्थ के रूप में प्रस्तुत करती है। उसके लिए विवाह एक ऐसा बिंदु है, जहाँ से जीवन के अनेक प्रश्न प्रारंभ होते हैं।

कॉलेज में समाज शास्त्र के प्रोफेसर वर्मा कहते थे " यदि विवाह संस्था में संवाद, सम्मान और स्वतंत्रता न हो, तो वह संस्था केवल औपचारिकता बनकर रह जाती है। भारत वर्ष में  विवाह संस्था  में सब बुरा नही, सुधार की संभावनाएँ भी हैं। वे विवाह की केवल आलोचना नहीं करते थे, अपितु यह भी दर्शाते थे कि यदि पारदर्शिता, समानता और संवेदनशीलता हो, तो विवाह एक सुंदर अनुभव भी बन सकता है।"

 रमा से जब भी बात होती तो वह कहती थी "पति-पत्नी के बीच परस्पर सम्मान, विचारों का आदान-प्रदान और सहयोग की भावना विवाह को एक सकारात्मक दिशा में ले जाती है। "

सुबह जब वह अपने स्टेशन पर उतर रही थी तो यह देख कर हैरान थी कि उसको लेने के वास्ते सारी सखियाँ स्टेशन पर मौजूद थी।सब की सब एकदम आधुनिक ड्रेस में थी, लेकिन  विशाखा पूरी भारतीय स्त्री बनी हई थी-साड़ी ब्लाउज और बड़ी सी बिंदी के साथ।

टी शर्ट और जीन्स में एकदम फिट और यंगेस्ट दिखती नीलू ने कहा 'क्या यार, तू एकदम कल्चर्ड आंटी बनके आयी है।'

'बेटी की शादी में आई हूँ यार, कॉलेज की एलुमनाई में नहीं। इसलिए मुझे लगा कि यह ड्रेस एकदम लिटरेरी रहेगी।'

'हम सब कह देंगी कि हम दुल्हन की सहेली हैं,मौसी तो एक यही विशाखा आंटी है।' कहती चित्रा ने जोर का ठहाका लगाया।

भीतर की झिझक औऱ हर पल रहने वाली घरेलू चिंता को परे धकेलते हुए विशाखा ने गृहस्थिन का चोला उतार के कॉलेज के दिनों की तरह बिंदास हो कर कहा 'अच्छा तुम लोग यह बताओ कि कौन कौन का क्रश यहां आ रहा है। "

सब ने चौकते हुए विशाखा को देखा तो वह चौके पर छक्का जड़ती हुई बोली 'यार ऐसे क्या देख रही हो, हम लोग उन से गले थोड़ी न लग जायेंगे। ज्यादा से ज्यादा 'हेलो' 'हाय' करने के साथ एक दूसरे के फिगर की बात करेंगे। यही शेष सम्बंध बचा है हमारा विवाह पूर्व की दुनिया के साथ।'

 विशाखा सोच रही थी कि ऐसा बोलते उसके बच्चे देखते तो अचरज से भर जाते कि रात दिन मसालों की गंध में डूबी उनकी मम्मी कभी ऐसी बिंदास सम्वाद बोल सकती हैं भला!

उसने खुद को समझाया कि इन दो दिनों में उसे न पति की याद करना, न बच्चों की औऱ न ही दूर बैठे हुए ही विशाखा को रुलाने वाली सास की।

स्टेशन के बाहर की गुमटी पर खड़े होकर चाय पीती देंख कर कस्बे के कितने लोग बिसमय से उंन्हे देख रहे थे जबकि गुमटी वाले को पैसा देने के मुद्दे पर झगड़ती सखियों को देखती घरेलू औरत रह गयी विशाखा एक बार फिर हताशा में डूबने को थी कि नीलू ने उसे वापस उबार लिया 'कंजूसनी लड़की, तेरा ये अंदाज आज भी पुराना ही है कि बिल के वक्त हाथ पीछे करके खड़ी हो जाना। चल अब तू ही बिल दे।'

सचमुच ही चाय का बिल सौ रुपया देते हुए विशाखा के भीतर का आत्मविश्वास जाग उठा था और वह  खुद के भीतर सी चुकी कॉलेज जमाने की हाजिर जवाब विशाखा को अंगड़ाई लेकर जागती हुई अनुभव करने लगी थी।

जबकि सारी सखियाँ चित्रा के इस फिकरे पर कहकहे लगा रही थीं कि

'विशाखा आंटी की इस बात पर जरूर गौर करना सखियो, कि शेष सम्बंध के सारे संबंधी शादी में जरूरी तौर पर हाजिर रहें।'

विशाखा न तो झेंप रही थी, न गिल्टी फील कर रही थी बल्कि जवाब देने के लिए नया वाक्य गढ़ने  लगी थी।

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