Mamta - 2 in Hindi Women Focused by kalpita books and stories PDF | ममता ...एक अनुभूति... - 2

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ममता ...एक अनुभूति... - 2

जैसे ही वे लोग मुड़ने लगे, तभी बच्चे की हल्की-सी रोने की आवाज़ डिब्बे में गूँज गई।
लड़की घबराकर तुरंत बच्चे को अपने सीने से और कसकर चिपकाने लगी, उसकी साँसें तेज़ हो गईं।

एक आदमी आगे बढ़ा।
उसकी आँखों में शक चमक रहा था।
उसने लाठी उठाई और लड़की के चेहरे पर ढका कपड़ा हटाने के लिए हाथ बढ़ाया।

लेकिन इससे पहले कि उसका हाथ उसके चेहरे तक पहुँचता—
केशव ने झट से डंडा पकड़ लिया।
उसकी आँखों में गुस्से की ज्वाला थी।

“तेरी हिम्मत कैसे हुई? ये मेरी मेहरारू है… दिखता नहीं, बच्चे को दूध पिला रही है?”

डिब्बे में सन्नाटा छा गया।
वो आदमी एक पल को ठिठक गया, फिर धीरे-से पीछे हट गया।

उसने तस्वीर आगे बढ़ाई और रुखाई से बोला—
“इसे कहीं देखा है?”

केशव ने तस्वीर उठाई।
उसमें एक पढ़ी-लिखी, आधुनिक दिखने वाली लड़की की फोटो थी—बाल खुले, जींस-टॉप में, आत्मविश्वास से भरी मुस्कान के साथ।

केशव ने भौंहें चढ़ाईं।
ये तो बिल्कुल अलग है—उसके बगल में बैठी औरत से।
कपड़ों में लिपटी, सहमी हुई, और पीली पड़ी आँखों वाली इस लड़की से बिलकुल भी मेल नहीं खाती थी।

“नहीं… देखा तो नहीं। क्यों, क्या हुआ?”
केशव ने सहजता से पूछा, जैसे उसे कोई दिलचस्पी ही न हो।

लाठी वाले आदमी ने आँखें तरेरीं, फिर बाकी साथियों को इशारा किया—
“चलो… आगे देखते हैं।”

वे लोग अगले डिब्बे की ओर बढ़ गए।

लड़की अब भी काँप रही थी।
उसकी उंगलियाँ केशव की बाँह को कसकर पकड़े थीं, जैसे कह रही हो—
"आज अगर तुम न होते… तो मैं खत्म हो जाती।"
पाँच घंटे गुजर चुके थे।
डिब्बे का शोर अब धीमा पड़ गया था।
लड़की कुछ हल्की-सी चिंतामुक्त दिखने लगी थी, मगर अब तक उसने एक बूंद पानी तक अपने गले से नीचे नहीं उतारा था।
वो बस बच्चे को सीने से चिपकाए बैठी रही, जैसे सारी दुनिया से उसका नाता टूट गया हो।

स्टेशन पर ट्रेन रुकी तो केशव ने धीरे से कहा—
“आप कुछ लेंगी खाने-पीने को?”

लड़की ने सिर झुका कर हल्के से ना में हिला दिया।

केशव बिना कुछ और कहे उतर गया।
कुछ ही मिनटों में वो दो कप गरमा-गरम चाय और दो वड़ा-पाव लेकर लौट आया।

उसने कप और पाव उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा—
“थोड़ा-सा ले लो… अपने लिए न सही, इस बच्चे के लिए ही सही।”

लड़की ने पहले तो कुछ पल उसकी ओर देखा, फिर अचानक जैसे भूख ने उस पर काबू पा लिया।
उसने झपट्टा मारकर वड़ा-पाव उसके हाथ से ले लिया और जल्दी-जल्दी खाने लगी।

केशव चुपचाप उसे देखता रहा।
धीरे-धीरे उसका घूंघट ढीला हुआ, कपड़े ज़रा हटे… और केशव की आँखें फैल गईं।

ये वही लड़की थी…
जिसकी तस्वीर उन लाठीधारियों के हाथ में थी।

पर तस्वीर की आत्मविश्वास से भरी, आधुनिक लड़की और सामने बैठी यह थकी, टूटी हुई और ज़मीन पर गिर चुकी औरत—दोनों में ज़मीन-आसमान का फ़र्क था।

केशव के दिल में एक ही सवाल गूंज रहा था—
"आख़िर ये भाग क्यों रही है? और किससे…?"

थोड़ी देर बाद लड़की बार-बार इधर-उधर देखने लगी।
उसके चेहरे पर अजीब-सी बेचैनी और असहजता झलक रही थी।
केशव ने गौर किया, फिर धीरे से बोला—

“अगर बाथरूम जाना है… तो बच्चा मुझे पकड़ा दो। डरिए मत, मैं संभाल लूँगा।”

"लड़की ने मना कर दिया और बच्चे को किसी अनजाने डर से छुपा लिया।"
"देखो..तुम्हारा डर बिल्कुल जायज है..पर माँ की बच्चे के प्रति जो भावना होती है उसे ही ममता कहते है , पर डरो मत ...मेरे अंदर जो इस मासूम को लेकर भावना है उसका कोई नाम नहीं है पर तुम ममता भी कह सकती हो।"

लड़की की आँखें चौड़ी हो गईं।
मानो उसे यकीन ही न हो कि कोई अजनबी ऐसा कह सकता है।
उसके होंठ थरथराए, वो कुछ पल हिचकिचाई… फिर बच्चे को अपनी गोद से उठाकर केशव की ओर बढ़ा दिया।

नन्हा-सा मासूम उसके हाथों में आ गया।
इतना हल्का, इतना नाज़ुक… केशव की साँसें तक सावधान हो गईं।
उसने बच्चे को अपनी छाती से लगा लिया, जैसे कहीं ये छोटा-सा जीवन उसके हाथों से फिसल न जाए।

लड़की ने उसकी ओर कृतज्ञता से देखा और धीमे क़दमों से बाथरूम की ओर चली गई।

डिब्बे की खिड़की से आती ठंडी हवा में बच्चा हल्के-हल्के कसमसा रहा था।
केशव उसे देखते हुए सोच में पड़ गया—

"ये मासूम तो बिल्कुल नया है इस दुनिया में…
पर इसकी माँ किस तूफ़ान से भागकर यहाँ पहुँची है?"

केशव ने अपने बैग से एक चादर निकालकर लड़की को दी।
“लो, बच्चे को ठीक से लपेट लो… ठंडी हवा लग जाएगी।”

लड़की ने कांपते हाथों से चादर ओढ़ी और कभी खुद को, कभी बच्चे को समेटने लगी।
फिर थकान के मारे उसके सिर ने धीरे-धीरे झुककर केशव के कंधे पर जगह बना ली।
कुछ ही देर में उसकी साँसें भारी होकर नींद में बदल गईं।

केशव ने लड़की की ओर देखा।
वो अब भी उसकी बाँह पर सिर टिकाए सो रही थी, जैसे वर्षों की थकान किसी सुरक्षित जगह को पाकर टूट गई हो।

केशव खामोश बैठा रहा।
उसे नहीं पता था कि ये लड़की किस स्टेशन पर उतरेगी।
बल्कि, उसके हावभाव देखकर तो यही लगता था कि शायद उसे खुद भी नहीं मालूम कि कहाँ जाना है।

इसी बीच टिकट चेकर डिब्बे में आ गया।
सबकी टिकटें चेक करता हुआ आखिरकार वह केशव के पास पहुँचा।

केशव झट से बोला—
“ये मेरी मेहरारू है… टिकट नहीं खरीद पाए। आप फाइन बना दो।”

टीटी ने भौंहें चढ़ाकर पूछा—
“कहाँ जाना है?”

केशव एक पल को ठिठका, फिर सहजता से जवाब दिया—
“बिहार… अपने गाँव।”

टीटी ने बिना ज्यादा सवाल किए फाइन काटा और आगे बढ़ गया।

केशव को अपने कंधे पर आँसुओ की गर्माहत महसूस हुई।

लेकिन केशव के भीतर सवाल गूंज रहा था—
"क्या ये सचमुच बिहार तक जाएगी?
या फिर इसे खुद भी नहीं पता, मंज़िल कहाँ है…"

............to be continued