आधा रास्ता लाज भरी खामोशी में तय हो चुका था। सन्नाटा इतना गहरा था कि हमारे पैरों की आहट भी सुनाई दे रही थी। मेरे बोलने के तमाम प्रयास विफल हो चुके थे। शब्द होठों तक आते और ठहर जाते।
मैं पल्लवी से दो कदम आगे था; वह मेरे बराबर आई और बोली, "प्रसाद ले लीजिए।"
बातचीत की शुरुआत औपचारिकता से होती है और प्रेम की आकर्षण से; और यह औपचारिकता ही आकर्षण को प्रेम बनाती है। पल्लवी ने खामोशी तोड़ दी थी।
"हाँ, लाओ।" मैंने कहा और उसने प्रसाद मुझे दे दिया। "क्या मन्नत थी जो आज पूरी हो गई?" मैंने कुछ मुस्कुराते हुए पूछा।
वह झेंप गई! बोली, "नहीं मन्नत तो कुछ भी नहीं थी; बस ऐसे ही चढ़ा दिया।"
"हूँ!" मैंने कहा। वह बोली, "इस बार कौन सी कक्षा का इम्तहान दिया है?"
"ग्यारहवीं की परीक्षा दी है। और तुमने?" मैंने कहा।
"दसवीं की।" उसने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
"ओ…! तो यह प्रसाद घूस थी, भगवान को भी रिश्वत दे दी।" मैंने हँसते हुए कहा। वह भी हँस दी!
"नहीं, नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है। आज मैं बहुत खुश थी तो सोचा भगवान को प्रसाद चढ़ा दूँ, इसलिए ले आई।" पल्लवी ने कहा।
"खुश क्यों, ऐसा क्या मिल गया आज?" मैंने पूछा लेकिन उसने उत्तर में कुछ नहीं कहा, मैंने भी दबाव देकर नहीं पूछा।
"आप जब खुश होते हैं तो क्या करते हैं?" पल्लवी ने पूछा।
मैं मुस्कुराया और बोला! "कोई प्रसाद देता है तो मैं ले लेता हूँ।"
वह मुस्कुरा दी! उसके होठों की वह मुस्कान स्वच्छंद थी, अब उसमें लाज और पराएपन का मिश्रण नहीं था। उसके मुलायम और मृदुल संवाद साधारण होकर भी न जाने क्यों मुझे विशेष लग रहे थे। खैर! दीनदयाल जी का घर आ गया था। "अच्छा! मैं चलता हूँ।" मैंने कहा।
"हूँ।" उसने सिर हिलाकर अनुमति दी। मैं वहाँ से चला आया।
आज की फ़िज़ा में आनंद था, रोमांच था। हवा के मिज़ाज में जादू था, उसके जादुई स्पर्श में एक नटखटपन और कोमलता थी। आकाश में सितारे झिलमिला रहे थे। सब कुछ शांत था, स्थिर था। फ़िज़ा के प्रवाह में सुकून बह रहा था। मैं वर्तमान से दूर न जाने किस अनागत समय की सुनहरी बेला में पहुँच गया था, जहाँ मौसमी फूलों की तरह कल्पनाएँ मन में खिल रही थीं। अब सारी झिझक, झेंप मिट गई; बात करने के सारे मार्ग खुल गए थे।
प्रेम के प्रस्फुटन की पहली रात शायद ज्यादा लंबी नहीं होती या उसकी असल अवधि के सत्य से हम वाकिफ़ नहीं होते; और फिर कौन कमबख्त होता है जो सुनहले ख्वाबों को छोड़कर वक्त देखे।
सुबह की ताज़ी, कुंवारी किरणें अछूते नए फूलों पर बिखरी थीं जो क्षण-भर पहले खिले थे और चंचल हवा उन फूलों को अपने नन्हें झोंकों से छेड़ रही थी। फूलों ने अपने मक्खन -से मुलायम आँचल में बूंदों को दुबका रखा था लेकिन पुरवाई के शरारती झोंके उन्हें ज़मीन पर गिरा दे रहे थे। जैसे ही वह ज़मीन पर गिरते वैसे ही एक सौंधी खुशबू मिट्टी से उठती और फ़िज़ा में बिखर जाती।
मैं उनींदा-सा छत पर चहलकदमी कर रहा था, आँखें नींद से भरी हुई थीं लेकिन उनमें वही सुनहले स्वप्न तैर रहे थे। जब मन की व्याकुलता बढ़ने लगी तो मैं विनय के घर आ गया। विनय अभी तक लेटा था; कांता रसोई में थी।
"अरे! प्रेम तुम कब आए?" उसने तकल्लुफ़ से पूछा। उसका यह लहजा सच में डराने वाला था और वह इसलिए कि कांता का मानना था कि विनय जितना बिगड़ा है और पढ़ाई के प्रति जैसी उसकी निपट सोच है उसका जिम्मेदार मैं ही था, उसका सारा श्रेय वह मुझे ही देती थी।
"अभी आया।" मैंने नरमाई से कहा। और उसने कुर्सी मेरी ओर सरका दी। और बोली, "तुम बैठो, मैं चाय बना लाती हूँ।"
"यह जो आवभगत हो रही है, इसके पीछे क्या राज है?" मैंने पूछा। वह मुस्कुरा दी! बोली, "तुम तो फ़िज़ूल की बातें करते हो। घर आए को चाय का भी न कहूँ?" और वह चली गयी। मैंने भी विनय को एक चपत जड़ दी। वह उठकर बैठ गया और बोला, "क्या है?"
"समय क्या हुआ है?" मैंने कहा।
"क्यों? घर में घड़ी नहीं थी जो यहाँ आकर पूछ रहे हो।" और वह मुँह धोने लगा। इतने में बाहर से एक आवाज़ आई, "शर्म तो नहीं आती होगी तुम्हें!" यह विनय की माता जी की आवाज़ थी; वह बाहर से आँगन में आ रही थीं।
"यह लो चाय।" कांता ने चाय का प्याला मुझे थमा दिया और बोली, "विनय, चाय पीओगे या नहीं?"
"हाँ, दे दो।" विनय ने कहा।
मेरी हँसी अनायास ही बेकाबू हो गई; मैं हँस पड़ा! "यार, तुम्हारी तो बड़ी ख़ातिर होती है घर में।" विनय ने तीखी नज़रों से मुझे देखा और चुपचाप चाय पीने लगा। हम दोनों ने चाय खत्म की ही थी कि कांता आकर खड़ी हो गई। बोली, "जरा-सा काम है। हाथ बँटा दोगे?"
"तो इसलिए ख़ातिर हो रही थी?" मैंने कहा। वह मुस्कुराते हुए बोली, "नहीं, ऐसी बात नहीं है।"
"काम बताओ।" मैंने टोक कर कहा।
"कल नवरात्रि शुरू हो रही है तो पूजा घर साफ करवाना है। तुम दोनों कर दो।" कांता ने विनम्र होकर कहा।
"ठीक है! लेकिन इसके बाद हम कुछ नहीं करेंगे। मंजूर है?" मैंने कहा तो उसने सिर हिलाया और वह चली गयी। मैं और विनय पूजा घर साफ करने लगे। पन्द्रह मिनट के बाद हम दोनों छत पर आ गए।
"वो आई थी?" विनय ने पूछा।
"हूँ!" मैंने कुछ मुस्कुराते हुए कहा। वह भी मुस्कुरा दिया और कुछ उतावला-सा होकर बोला, "कुछ बातचीत हुई या निहारते ही रहे?"
"बात तो हुई थी।"
"क्या?" विनय ने कुछ अजीब स्वर में पूछा। मैं लजा गया!
"यूँ ही, बस थोड़ी बहुत हुई थी।"
"तो आज मैं भी आ जाऊँ?"
"बिल्कुल नहीं।"
"वाह भई! प्यार मिला तो यार को ही भूल गए। वहाँ पल्लवी के सामने तो कितने तकल्लुफ़ से पेश आते हो और हम कुछ माँगें तो बिल्कुल नहीं।" उसने कुछ नाराजगी से कहा।
"जिद्दी मत बनो।"
वह मुँह बिगाड़ते हुए बोला, "वाह रे प्यार! अब मैं जिद्दी भी हो गया।" मुझे मालूम था कि अब यह आदमी आएगा, इसलिए मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा, "शाम को आ जाना।"
"अब तुम इतनी जिद्द कर ही रहे हो तो आ जाऊँगा।" मैं चपत मारता उससे पहले वह दूर भाग गया।
शाम के कोई छः बजे होंगे। मैं और विनय बगिया में आ गए। फ़िज़ा का मिज़ाज कुछ शान्त था। सूरज की ललाई क्षितिज पर बिखरी थी और उसकी डूबती छटा जैसे क्षितिज को प्रेमपाश में बांध रही थी। फूलों में सुबह की-सी तरुणाई थी; लेकिन हवा का मिज़ाज अब शांत था, उसमें अल्हड़पन नहीं था और ताज़गी की जगह उसमें मीठी सुस्ती भरी थी। शाम मन में उन्माद भर रही थी। हवा का एक झोंका आता और साँसें जैसे सुकून से भर जातीं और वह नशा बढ़ जाता।
मैं लंबी साँस खींचकर उबासी लेता हुआ बोला, "कितनी सुन्दर शाम है न? कितना आनन्द आता है यहाँ बैठने में, यहाँ का हर एक क्षण मनमोह लेता है। सारी ऊबन, थकान और दिन भर का बोझ चुरा लेता है।"
"कहीं हृदय न चुरा ले इस उपवन की अप्सरा। याद रखना बंधु, पीड़ा प्यार की छाया होती है और कल्पनाएँ उस छाया को और गहरा कर देती हैं।" विनय ने गंभीरता से कहा।
"कल्पनाएँ प्रेम को भी तो गहरा बनाती हैं।" मैंने कहा।
वह कुछ बोला नहीं, हवा के स्पर्श को महसूस करने लगा। मैं उठ कर टहलने लगा। अंधेरा होने लगा था, अंदर अंधेरे के साथ मेरी व्याकुलता भी बढ़ने लगी थी। मंदिर की आरती का समय भी हो आया था इसलिए हम दोनों उठकर मंदिर आ गए। सीढ़ियों पर दो छोटी लड़कियाँ कुछ गा रही थीं लेकिन हमें देखकर रुक गईं और हमारे मंदिर के अंदर जाने की प्रतीक्षा करने लगीं।
मैं हाथ जोड़े खड़ा था कि किसी ने मेरा कंधा छुआ। मैंने पीछे देखा तो पल्लवी थी। उसने सकुचाते हुए कहा, "मामी ने प्रसाद चढ़ाने को कहा था और मैं भूल गई। आप ला सकते हो?" स्त्री के विनम्रता भरे आग्रह को कौन मना कर सकता है और वह भी पसंदीदा स्त्री का आग्रह! मैंने कहा, "हाँ, ले आऊँगा।" तो उसने झट से पचास का नोट मेरे सामने किया और मैंने ले लिया।
विनय मुस्कुराते हुए बोला, "प्रेम, मैं घर जा रहा था, चलो साथ ही चलते हैं।" और वह भी मेरे साथ हो लिया, पूरे रास्ते में, मैं कुछ नहीं बोला। वह भी चुपचाप मेरे साथ चलता रहा। दुकान कुछ दूर थी लेकिन मुझे अधिक समय नहीं लगा। मैंने लौट कर प्रसाद दे दिया, पल्लवी ने प्रसाद पुजारी जी को दे दिया। कुछ देर बाद मैं बगिया में आ गया।
कुछ ही क्षणों में वहाँ श्याम महोदय भी आ गए और बोले, "पलो दीदी घर जा रही हैं इसलिए आपको बुलाया है।"
"क्यों? तुम घर नहीं जाओगे?" मैंने पूछा।
"जाऊँगा न।"
"क्या काम है?" मैंने पूछा।
"आप प्रसाद लाए थे न तो बोल रही हैं कि ले लो।" श्याम ने कहा।
मैं मुस्कुरा दिया। "चलो।" और हम दोनों उठकर मंदिर के पास आ गए। पल्लवी मंदिर पर ही थी। मैं पास आ गया हृदय कुछ तेज़ धड़कने लगा। उसने प्रसाद देते हुए कहा, "नाना ने कहा था कि सबको बाँट कर आना प्रसाद इसलिए मैंने आपको बुलाया था।"
पचास रुपये के कितने लड्डू आते हैं, बस दो लड्डू बचे थे बाकी का प्रसाद बँट गया था। पल्लवी ने दोनों लड्डू मुझे दे दिए। मैंने भी एक लड्डू श्याम को दे दिया और आधा खुद रखकर आधा पल्लवी को दे दिया। उसने भी झेंपते हुए ले लिया। उसके कपोलों पर लाज की रतनारी उमड़ आई!
नमस्कार
मेरी आपसे प्रार्थना है कि आप कहानी पढ़ने के बाद टिप्पणी कर के बताना कि कहानी कैसी लगी? आपकी एक टिप्पणी (comment) से मेरा उत्साह बढ़ेगा।
धन्यवाद