Love is eternal, death is eternal - prologue in Hindi Fiction Stories by Vartika reena books and stories PDF | प्रेम शाश्वतं, मृत्यु शाश्वतः - प्रलोग

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प्रेम शाश्वतं, मृत्यु शाश्वतः - प्रलोग

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"प्रेम यदि पुर्ण हो तो भुला दिया जाता है। उसकु अधूरे स्वरूप को ही पूजा जाता । प्रेम मे विरह वेदना नही...उस प्रेम की परिक्षा जो हर श्वास मे केवल प्रियतम के मान की रक्षा चाहता है। 

 

मै भी यही चाहती हूं ! इसलिए अपनी इस देह को आज समाप्त कर रही हूं । "

 

कहकर वो अग्निकुंड मे प्रवेश कर गई।  उसकी देह से आग की लपटे उठने लगी। वो जलने लगी किसी जिवंत चिता की भांती। 

 

वो महादेव के मंदिर का प्रांगन था। मंदिर चार स्तंभ पर खडा था । हर स्तंभ हर युग का चिन्ह था। और हर युग मे अनंत और सर्वज्ञ देव आदी देव महादेव मंदिर के गर्भ गृह मे विराजमान थे।

 

मंदिर के प्रांगन मे एक अग्निकुंड बना था जिसमे जल रही थी वो । उसने चारो तरफ देखा और चीख पडी । कहना कठिन दा की चीख जलने के कारण थी या अपने प्रेमी की विरह की वेदना थी। 

 

 

उसने चारो तरफ देखा। आज उसे इस पडाव पर उसे अपनो ने ही.लाकर खडा कर दिया था।

प्रांगन मे ऋषि मुनि एक ओर खडे थे। एक जगह पर आसान लगे थे जिन पर कोई नही.बैठा था। हर नेत्र मे आंसू थे , पर कोई भी आगे आकर इस विध्वंस के आंरभ को.रोकने का प्रयास नही कर रहा था।

 

तभी.वो.आग मे.जलती स्त्री चीखी और बोली ,." मैरे अंत से आरंभ होगा इस कनखल का विध्वंस । आप सब ने आज मेरे पति का अपमान मौन रह कर सहा है।.एक स्त्री की मर्यादा पर प्रश्न चिन्ह उठते देखा है। जिस जिस ने आज हुए अन्याय को मौन रहकर होने दिया उन सबको उनके मौन का दंड मिलेगा। और दंड मिलेगा उसे जिसने मुझे इस पडाव पर लाकर खडा किया । " 

 

" मै..कैलाश्यनाथ पत्नी आज इस संपूर्ण कनखल को श्राप देती हुं की..." वो अभी आगे बोल ही रही थी की एक स्त्री आगे आई  और बोली, " नही पुत्री !" 

 

वो.थम गई।  उसके शरीर से उठती ज्वाला हर हृदय मे कंपन उत्पन्न कर रही थी। उसने सिर घुमाकर उस स्त्री की तरफ देखा और उसकी क्रोध से जलती आंखे दर्द से बह चली । 

 

वो पीडा से चीख पडी । धीरे धीरे अग्नी ने उसे अपनी कोख मे समा लिया और शांत हो गई उस प्रांगन मे जलती वो.जिवांत चीता।

 

 

तभी वो.स्त्री जिसने उसे श्राप देने से रोका था वो रो पडी । 

 

" रूद्रामुखी मेरी बच्ची ! " स्त्री ने जलती चिता को देखा । जो कोई और नही ब्लकि उसकी अपनी बेटी , कनखल की राजकुमारी रूद्रामुखी थी। 

 

तभी एक पुरूष गुस्से मे बोला , " मर गई उस अनाथ   उस बिहडो मे.निवास करने वाले की पत्नी। कोई शोक नही.मनाएगा। " 

 

तभी वो रोती स्त्री गुस्से मे चीखी , " दक्ष..बस करो ! तुम्हारी बेटी थी वो। " 

 

दक्ष गुस्से से कांप रहा था । " वो.बेटी जिसे अपने पिता के सम्मान की कोई परवाह.नही । मुझे कोई शोक नही वीरीनी ।.मै.पहले.ही.इसका श्राद्ध कर चुका.हूं। " 

 

 

 

वीरिणी खडी हो गई।  " तुम्हे क्या लगता है कैलाश्यराज चुप बैठेगा। तुमने उसकी पत्नी को आत्मदाह करने पर विवश.किया है। वो.तुम्हारे मृत्यु बन कर आएगा। और साथ ही नाश.होगा कनखल.का। " 

 

दक्ष ने गर्जना करी , " मुझे कोई नही.मार सकता । मै दक्ष हूं, दक्ष! " 

 

" अपने कर्मो से भय खाओ प्रजापति । " वीरिणी अपने.आंसूओ को पोंछते हुए बोली। 

 

" मुझे साकेत का रक्षण प्राप्त है। स्वंय साकेतनाथ मेरी रक्षा का वचन दे चुके है। " दक्ष दंभ भरकर बोला। फिर वो प्रांगन की दाई ओर लगे आसन की तरफ मुड गया जहा एक अत्यधिक तेजस्वी पुरूष खडा था। 

 

" महाराज सत्यव्रत आपने मेरे रक्षण का वचन लिया है। आप अपने वचन से पीछे नही.हट सकते। " , दक्ष सत्यव्रत से बोला। 

 

" मै वचन अनुसार आपका रत्ना अवश्य करूंगा.।.किंतु ध्यान रहे रानी रूद्रामुखी केवल आपकी पुत्री नही.थी। वो कैलाश्यनाथ की अर्धांगिनी भी थी। और अर्थीगमया अपनी पत्नी की मृत्यु का प्रतिशोध अवश्य लेगा। और मै केवल.एक बार आपकी रक्षा कर सकता हूं। इस से.अधिक आप स्वंय की सहायता स्वंय करे। " 

 

 

रूद्रामुखी की देह अब भी यज्ञकुंड मे जल रही थी । सब लोग जा चुके थे। केवल रानी विरिणी अब भी उस जलती चिता को देख रही थी। उनकी आंखे के आंसू सुनने लगे थे। तभी उन्हे केख सुझा और उन्होने एक दासी को बुलाया।.

 

 

" दासी जाओ..और कैलाश्य मे.ये सुचना पहुचा दो की.यहां कनखल मे रूद्रामुखी के साथ क्या हुआ था।. एक.पत्र और कलम लाओ। " विरिणी ने कहा तो दासी चली गई। 

कुछ समय बाद वो पत्र और आलम लेकर आई।.विरिणी ने पत्र मे कनखल.की सभा मे.जो जो.हुआ वो.सब लिख.दिया।

 

विरिणी ने पत्र दासी के हाथ मे.थमाया और उसे कैलाश्य के लिए रवाना कर दिया।.

 

उनकी आंखे रूद्रामुखी की चिता पर ठिठक गई।  

" मेरी.बच्ची..तेरे साथ हुए अन्याय का प्रतिशोध लिया जाएगा। चाहे उसके लिए मुझे विधवा भी.क्यो.ना होना पडे।"  

 

 

क्रमशः