(रात का समय। होटल का अँधेरा कॉरिडोर। सिमरन बिस्तर पर बैठी है, डर और थकान में। करण सिमरन के बंद गेट के पास खड़ा है, लाल आँखों से गेट को देख रहा है।)
"सिमरन अब भी मासूम थी।
उसे नहीं पता कि सामने खड़ा आदमी... इंसान नहीं है।
और उसकी प्यास धीरे-धीरे बढ़ रही थी।
हर पल उसे रोकना कठिन हो रहा था।"
(सिमरन बिस्तर पर सिर दबाए बैठी है। अचानक कमरे का दरवाजा खिसकता है और करण अंदर आता है। उसकी लाल आँखें चमक रही हैं।)
Simran (घबराकर, फुसफुसाते हुए) बोली -
"S sir अ... आप यहाँ क्यों हो? मुझे डर लग रहा है..."
(करण धीरे-धीरे उसके पास आता है।)
Karan (धीमी, गहरी आवाज़ में) बोला -
"तुम्हें डर लग रहा है? अच्छा है...
लेकिन याद रखो, तुम्हारी सुरक्षा मेरी जिम्मेदारी है।
और तुम्हारी मासूमियत... मेरी प्यास को और तेज़ कर देती है।"
(सिमरन काँपती है। उसका चेहरा डर और उलझन में है।)
"करण अब और पास आ रहा था।
सिमरन डर रही थी, लेकिन साथ ही उसका दिल कुछ अलग महसूस कर रहा था।
डर और आकर्षण दोनों उसके भीतर उभर रहे थे।"
(करण सिमरन के पास खड़ा होकर धीरे-धीरे उसकी आँखों में देखता है। लाल आँखों की चमक में खतरे और आकर्षण दोनों हैं।)
Karan (धीमे स्वर में, नियंत्रित लेकिन खतरनाक) बोला -
"तुम अब मेरी पास हो... और खासकर तुम्हारा खून मेरा है।
और तुम्हारा मासूम दिल मुझे रोक नहीं सकता।
लेकिन फिलहाल, मैं खुद को रोक रहा हूँ।
एक दिन... तुम्हारा खून मेरा होगा।"
(सिमरन पीछे हटती है। आँखों में डर और दिल में उलझन।)
Simran (मन ही मन, डर और जिज्ञासा में) बोली -
"ये boss... इतने डरावने और खतनाक हैं।
फिर भी... मुझे अजीब सा एहसास होता है उनके पास रहते हुए..."
"नई जगह, नया खतरा, और सामने खड़ा खतरनाक शैतान।
सिमरन की मासूमियत और करण की प्यास अब और नज़दीक आने वाली थी।
और रात का खेल अब शुरू हो चुका था।".
(रात का समय। करण अपने कमरे में बैठा है। कमरे का अँधेरा और उसकी लाल आँखों की चमक माहौल को और खतरनाक बना रही है। उसके सामने उसके बिरादरी के लोग खड़े हैं ।)
"करण अब अकेला नहीं था।
उसके बिरादरी के लोग उसे लगातार भड़काते रहे थे।
सिमरन का खून पीना और मिशन पूरा करना... यही उनका मकसद था।"
(तीन लोग दिखाई देते हैं। उनका स्वर तेज और धमकाने वाला है।)
Biradari Member 1: बोली -
"करण! तुम्हें अब और इंतजार नहीं करना चाहिए।
सिमरन तुम्हारे सामने है।
अपना मिशन पूरा करो और उसका खून पी लो!"
Biradari Member 2: बोला -
"क्यों रुके हो? ये तुम्हारा मौका है।
उसका मासूमियत और डर दोनों तुम्हारे लिए आसान बना रहे हैं।"
(करण के हाथ हल्के कंपकंपा जाते हैं। उसकी आँखें लाल चमक रही हैं। वो खुद पर काबू रखने की कोशिश करता है।)
Karan (धीमे स्वर में, खुद से) बोला -
"ना... अभी नहीं।
मिशन अभी अधूरा है।
और मुझे उसे धीरे-धीरे तैयार करना होगा...
ताकि वह मेरे पास हमेशा रहे।"
(बिरादरी के लोग चिल्लाते हैं।)
Biradari Member 3: बोला -
"जल्दी करो! तुम्हारा समय कम है।
हम तुम्हारी प्यास नहीं रोक सकते!"
(करण अपनी कुर्सी में झुकता है, हाथों से माथा पकड़ता है।)
"करण का दिल और दिमाग दो हिस्सों में बंट चुका था।
एक तरफ़ मिशन और प्यास का दबाव।
दूसरी तरफ़ सिमरन की मासूमियत और सुरक्षा।
और उसे खुद पर काबू रखना था।
लेकिन हर पल उसकी प्यास बढ़ रही थी।"
(सिमरन होटल के कमरे में सो रही है। unaware है कि उसके लिए खतरा कितना करीब है।)
"सिमरन को अब भी नहीं पता था कि खतरा उसके बिल्कुल पास बैठा है।
और करण का संघर्ष... अब हर पल उसकी नज़रों में दिखाई दे रहा था।
एक दिन सिमरन का खून पीना तय था,
लेकिन अभी करण खुद को रोक रहा था।"
रात का समय। होटल का कमरा अँधेरा। सिमरन बिस्तर पर सो रही है। करण कमरे में खड़ा है, लाल आँखों की चमक उसके चेहरे पर खतरनाक और गहरी है।)
"करण के दिल में दो आगें जल रही थीं।
एक तरफ़ प्यास और मिशन का दबाव।
दूसरी तरफ़ सिमरन की मासूमियत और सुरक्षा की जिम्मेदारी।
और अब उसे खुद को रोकना मुश्किल हो रहा था।"
(करण धीरे-धीरे सिमरन के पास जाता है। उसका चेहरा गंभीर, आँखें लाल और चमकती हुई।)
Karan (मन ही मन, धीमे स्वर में) बोला -
"बस थोड़ी देर और...
अभी नहीं... अभी उसे सुरक्षित रखना ज़रूरी है।
लेकिन उसका मासूम दिल मुझे रोक नहीं पा रहा।"
(वो सिमरन के पास खड़ा होकर उसे देखता है। सिमरन की साँसें धीमी और अनजान हैं।)
"सिमरन अब भी unaware थी कि सामने खड़ा आदमी... उसका सबसे बड़ा खतरा और सुरक्षा दोनों था।
और करण का खून प्यास से भरा दिल हर पल उसे अपनी ओर खींच रहा था।"
(करण धीरे-धीरे सिमरन के पास बैठ जाता है। उसकी लाल आँखें अब उसके हर हाव-भाव को पकड़ रही हैं।)
🌄
Simran (धीमे स्वर में, नींद से आधी जागती हुई) बोली -
" Sir आप... यहाँ क्यों हो? शायद मैं सपना देख रही हूं।"
Karan (धीमी, नियंत्रित आवाज़ में) बोला -
" सपना नहीं सच है।
तुम्हें खतरा था।
और मैं तुम्हें सुरक्षित रखने आया हूँ।
लेकिन याद रखना... मेरी प्यास हर पल बढ़ रही है।
एक दिन... तुम्हारा खून मेरा होगा।"
(सिमरन डर से काँपती है। करण उसकी मासूमियत और डर को महसूस करता है, लेकिन खुद को रोकता है।)
"अब रात में...
सिमरन का डर और करण का खतरनाक आकर्षण दोनों एक साथ थे।
और ये नज़दीकियाँ अब और गहरी होने वाली थीं।"
(दोपहर का समय। ऑफिस। सिमरन डेस्क पर बैठी है, लेकिन चेहरा चिंतित और भयभीत। उसके हाथ हल्के कांप रहे हैं।)
"सिमरन अब भी मासूम थी, लेकिन लगातार डर और तनाव के चलते उसका दिमाग धीरे-धीरे खेल रहा था।
करण ने उसे इतना डराया था कि अब वो अपनी नौकरी छोड़ भी नहीं सकती थी।
तनाव ने उसके दिमाग़ में भ्रम पैदा कर दिया था।"
( सिमरन अपने चारों तरफ देखती है। उसे हर जगह एक अजीब सा प्रतिबिंब दिखाई देता है।)
Simran (मन ही मन, डरते हुए) बोली -
"ये कौन है?
मेरा सामना कर रही है... या मैं ही कल्पना कर रही हूँ?"
(सिमरन की आँखों के सामने उसकी “हमशक्ल” आती है – एक और सिमरन, लेकिन और सुंदर, और उसके चेहरे पर करण जैसी लाल आँखें चमक रही हैं। उसकी मुस्कान डरा देने वाली थीं।)
"हर जगह उसकी ही तरह की एक और सिमरन दिखाई दे रही थी।
लेकिन वह उस सिमरन से कहीं ज्यादा डरावनी और आकर्षक लग रही थी।
और उसकी लाल आँखें करण की तरह चमक रही थीं।"
( सिमरन अपने डेस्क से उठकर धीरे-धीरे पीछे हटती है।)
Simran (धीमे, फुसफुसाते हुए) बोली -
"नहीं... ये असली नहीं हो सकता...
ये कैसे मेरे सामने है?
क्यों ऐसा हो रहा है?"
(करण दूर से उसे देखता है। उसकी लाल आँखें गहरी और तेज़। उसे पता है कि सिमरन भ्रमित हो रही है।)
Karan (मन ही मन, धीमे स्वर में) बोला -
"शांत रहो, सिमरन।
अब तुम्हारा दिमाग तुम्हारे ही डर के जाल में फंसा है।
लेकिन मैं उसे खुद पर हावी नहीं होने दूँगा... अभी।"
(सिमरन अपने डेस्क पर बैठ जाती है। उसकी साँसें तेज़ और अनियमित हैं।)
"अब सिमरन का मासूम दिल और दिमाग दोनों डर और भ्रम में फंसे थे।
हर जगह उसे अपनी ही जैसी एक और सिमरन दिखाई देती थी।
और उसकी लाल आँखें उसे हर पल करण की याद दिला रही थीं।
कहानी का खेल अब और गहरा, डरावना और रहस्यमय हो गया था।"
(शाम का समय। होटल का कमरा। सिमरन बिस्तर पर बैठी है, डर और भ्रम के कारण हाथ कांप रहे हैं। उसके सामने कई प्रतिबिंब दिखाई दे रहे हैं, वही लाल आँखों वाली सिमरन।)
"सिमरन का दिमाग अब भ्रम और डर के जाल में फंस चुका था।
हर जगह उसे अपनी ही जैसी औरत दिखाई दे रही थी,
लेकिन लाल आँखों वाली और खतरनाक।
और अब उसे समझ नहीं आ रहा था कि असली कौन है।"
(करण कमरे में आता है। उसकी लाल आँखें चमक रही हैं, पर चेहरे पर गंभीर और शांत भाव।)
Simran (घबराकर, फुसफुसाते हुए) बोली -
"तुम... तुम असली हो?
या ये सब मेरा भ्रम है?"
(करण धीरे-धीरे उसके पास बैठता है।)
Karan (धीमे, नियंत्रित स्वर में) बोला -
"शांत रहो, सिमरन।
ये सब तुम्हारे डर का खेल है।
तुम भ्रमित हो रही हो, लेकिन मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचने दूँगा।
तुम अभी भी सुरक्षित हो।"
(सिमरन उसकी आँखों में देखती है। लाल आँखों की चमक डरावनी है, लेकिन साथ ही उसे सुरक्षा का एहसास भी मिलता है।)
Simran (धीमे स्वर में, डर और उलझन में) बोली -
"मैं... मैं समझ नहीं पा रही हूँ...
कौन असली है, कौन नकली?"
Karan (धीमे स्वर में, हाथ उसकी तरफ़ बढ़ाते हुए) बोला -
"सिमरन, मुझे पकड़ो।
जो डर तुम्हें घेर रहा है, उसे मैं दूर कर दूँगा।
तुम अभी भी मेरी नजरों के सामने सुरक्षित हो।
लेकिन याद रखो... मेरी प्यास अब और बढ़ रही है।"
(सिमरन करण के हाथ पकड़कर उसके पास आती है। उसका डर अभी भी स्पष्ट है, लेकिन वह धीरे-धीरे शांत होती है।)
"करण ने उसे संभाला।
सिमरन ने महसूस किया कि डर और सुरक्षा एक ही व्यक्ति में हो सकते हैं।
और इस रात... दोनों के बीच का खेल और गहरा, खतरनाक और रोमांचक हो गया था।"