"कहने को तो विक्की समीर के बुआ का बेटा था, पर उनके बीच का रिश्ता खून की बंदिशों से कहीं ऊपर था... वो उसके सगे भाई से बढ़कर था।"
"भागते भागते समीर की नजर एक गुफा पर पड़ी"
गुफा का मुँह अंधेरे में डूबा हुआ था।
यह जगह प्रकृति के एक शापित कोने जैसी लग रही थी। गुफा का द्वार जो किसी राक्षस के खुले हुए मुँह जैसा भयानक लग रहा था। गुफा के ठीक मुँह पर एक विशाल, भारी और खुरदुरा पत्थर टिका हुआ था। वह पत्थर शायद सालों पहले पहाड़ी से टूटकर गिरा था और अब इस तरह ढलान पर अटका हुआ था कि उसे थोड़ा सा धकेलने पर वह आसानी से गुफा के द्वार को पूरी तरह बंद कर सकता था।
"अंदर जाओ! जल्दी!" समीर ने विक्की को गुफा के अंधेरे की तरफ धकेलते हुए कहा।
विक्की ने उस अंधेरी गुफा को देखा और पीछे हट गया, "नहीं समीर! यह बहुत अंधेरा है! मैं... मैं अंदर नहीं जा सकता!"
समीर ने विक्की के दोनों कंधे पकड़े और उसकी आँखों में देखते हुए चिल्लाया,ज्यादा मत सोच विक्की! अगर ऊपर रहा तो वह राक्षस तुझे टुकड़े-टुकड़े कर देगा! इस गुफा में कम से कम बचने की उम्मीद तो है! जा! मैं इस पत्थर को बाहर से बंद कर दूँगा!
विकी ने कहा -"पर भैया आप कहाँ छुपने जाएँगे "आप भी अंदर आ जाइए।" विक्की की आँखों में आँसू थे।
"बेवकूफ! अगर हम दोनों अंदर चले गए, तो बाहर से पत्थर कौन बंद करेगा?
यह कहते ही समीर ने अपनी पूरी ताकत लगाकर उस विशाल पत्थर को धकेला। उसमें जैसे दस हाथियों की ताकत आ गई थी। और गुफा के मुँह को पूरी तरह से बंद कर दिया।
गुफा के अंदर पूरी तरह से कालिख भरा अंधेरा छा गया। विक्की उस अंधेरे में पूरी तरह से अकेला और कैद हो गया था।
बाहर, समीर ने एक बार उस बंद गुफा की तरफ देखा, अपने आसू को पोंछा, और फिर जंगल के दूसरे कोने की तरफ बेतहाशा दौड़ पड़ा।
समीर अभी बाहर निकल ही रहा था कि अचानक उसे अपने पीछे किसी की मौजूदगी का अहसास हुआ। हवा बर्फीली ठंडी हो गई थी। उसने पीछे मुड़कर देखा, तो
वहाँ वह 'राक्षस' खड़ा था। उसकी आँखों में कोई रहम नहीं था।
समीर ने भागने की कोशिश की, लेकिन राक्षस की फुर्ती बिजली जैसी थी। उसने एक ही झटके में समीर की गर्दन दबोच ली और उसे ज़मीन से ऊपर उठा दिया। समीर के पैर हवा में छटपटाने लगे।
राक्षस ने समीर के कान के पास झुककर ठंडी आवाज़ में कहा, "तुमने अपने भाई को तो छुपा दिया... लेकिन खुद को कौन बचाएगा?"
अगले ही पल, समीर का बेजान शरीर ज़मीन पर गिर पड़ा।
गुफा के भीतर का सन्नाटा इतना गहरा था कि विक्की को अपनी ही पलकों के झपकने की आवाज़ साफ़ सुनाई दे रही थी। वह पत्थर से सटकर बैठा था, उसकी आँखें उस बारीक सी दरार पर टिकी थीं जहाँ से बाहर की थोड़ी सी धुंधली रोशनी अंदर आ रही थी।
तभी, जंगल की हवाओं को चीरती हुई एक आवाज़ उसके कानों से टकराई।
वह एक चीख थी। बहुत धीमी, जैसे बहुत दूर से आ रही हो, लेकिन उसमें जो दर्द था वह विक्की के कलेजे को चीर गया।
विक्की अचानक चौंक गया। उसके पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। "यह... यह क्या था?" उसने फुसफुसाते हुए खुद से पूछा। उसका दिमाग सुन्न होने लगा था। क्या वह सचमुच कोई चीख थी या सिर्फ उसके कानों का वहम? क्या वह राक्षस आसपास ही था और किसी और का शिकार कर रहा था?
पर अगले ही पल एक भयानक खयाल ने उसके होश उड़ा दिए। समीर! समीर अभी कुछ ही पल पहले तो बाहर गया था।
"नहीं... नहीं, यह समीर नहीं हो सकता," विक्की ने काँपते हुए अपने सिर को झकझोरा, लेकिन उसका दिल जोर-जोर से धड़कने लगा था। वह चीख फिर से सुनाई दी, इस बार थोड़ी साफ। वह समीर की ही आवाज़ थी!
विक्की के सब्र का बांध टूट गया। वह जो अब तक डर के मारे दुबका हुआ था, अचानक पागल सा हो गया। भाई वह रोते हुए चिल्लाया। उसे अब एक बार बाहर जाकर देखना था कि उसके भाई के साथ क्या हो रहा है।
विक्की ने अपने दोनों हाथ पत्थर पर टिका दिए और उसे धकेलने की पूरी कोशिश करने लगा।"विक्की के हाथ लाल हो चुके थे पर वो पत्थर टस से मस नहीं हुआ समीर ने उसे बाहर से जिस ढलान के सहारे टिकाया था, उसने गुफा के मुँह को एक अभेद्य दीवार की तरह बंद कर दिया था। विक्की जितना जोर लगाता, पत्थर उतना ही भारी महसूस होता।
विक्की हारकर पत्थर से लगकर ज़मीन पर बैठ गया।
बाहर जंगल में समीर की चीखें धीरे-धीरे शांत हो रही थीं और उनकी जगह उस भयानक राक्षस की डरावनी गुर्राहट ले रही थी। विक्की उस अंधेरी गुफा में कैद था—पूरी तरह ज़िंदा, लेकिन अंदर से मर चुका था।
जंगल के दूसरे छोर पर, जहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था,
कबीर एक घनी झाड़ी के पीछे दुबका हुआ था। उसे अपने पैर के पास कुछ चुभने जैसा महसूस हुआ। उसे लगा शायद कोई पत्थर होगा, लेकिन जब उसने नीचे झुककर देखा, तो उसके पैरों तले ज़मीन खिसक गई।