दिन बीतते गए और अंकिता व परी की बचपन की दोस्ती फिर से परवान चढ़ने लगी। अंकिता अक्सर परी के घर जाने लगी। परी की माँ अंकिता को अपनी बेटी की तरह मानती थीं। वे बहुत अमीर थे, लेकिन उनका दिल बहुत बड़ा था—उनकी सोच बहुत नेक थी, जो अंकिता के लिए एक सुकून की बात थी।
पूरा एक महीना बीत गया। इस बीच रणविजय उस घर में होने के बावजूद अंकिता की नजरों से दूर ही रहा। रणविजय को इस बात की भनक तक नहीं थी कि जिस लड़की की तलाश में उसने मुंबई शहर को खंगाल डाला था, वो उसके अपने ही घर के ड्राइंग रूम में बैठकर उसकी बहन के साथ चाय पी रही है।
तभी एक नई स्थिति बनी। अंकिता अब अच्छी-खासी कमाई करने लगी थी, इसलिए उसने फैसला किया कि वह अपने भाई का दाखिला किसी प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी में करवाएगी। अंकिता की मम्मी को भाई के एडमिशन के सिलसिले में शहर से बाहर जाना पड़ा। उस दिन अंकिता को ऑफिस में बहुत जरूरी काम था और आरोही के स्कूल में भी कुछ काम अटका हुआ था।
अंकिता के पास कोई और रास्ता नहीं था। उसने बड़े भरोसे के साथ अपनी बेटी आरोही को परी के घर छोड़ दिया। अंकिता को लगा कि परी के पास आरोही सुरक्षित रहेगी। पूरा दिन और पूरी रात आरोही परी के घर पर ही रही। अंकिता ने सोचा था कि वह काम खत्म करके रात में ही उसे लेने पहुँच जाएगी।
देर रात जब अंकिता अपनी बेटी को लेने परी के घर पहुँची, तो घर का माहौल कुछ बदला-बदला सा था। उसे क्या पता था कि जिस रणविजय से वह चार साल से बच रही है, उस रात वह उसी घर की दहलीज पर खड़ी थी, जहाँ वह शैतान भी मौजूद था।
उस रात घर में एक अजीब सी हलचल थी। अंकिता तो अपनी बेटी आरोही को लेने आई थी, लेकिन वह अभी घर के अंदर नहीं घुसी थी। अंदर का नज़ारा कुछ और ही था। रणविजय जब घर में दाखिल हुआ, तो उसे डाइनिंग एरिया से एक मासूम सी खिलखिलाहट सुनाई दी। उसे हैरानी हुई कि इतने शांत घर में यह कौन सी बच्ची है?
जैसे ही रणविजय ने धीरे-धीरे डाइनिंग टेबल की ओर कदम बढ़ाए, उसने देखा कि उसकी माँ और उसके पापा बड़ी लाड़-प्यार से एक छोटी सी बच्ची को खाना खिला रहे थे। परी भी वहीं बैठी थी। रणविजय को देखते ही सब कुछ ठहर सा गया। जब रणविजय की नज़र उस बच्ची के चेहरे पर पड़ी, तो वह सन्न रह गया। उस मासूम चेहरे के नैन-नक्श, वो चमकती हुई आँखें—वह हूबहू उसका अक्स (परछाईं) लग रही थी। रणविजय की माँ और पापा भी उसे देखते ही थोड़े चौंके थे, उन्हें भी रणविजय के बचपन की याद आ गई थी, लेकिन परी के यह कह देने पर कि "ये अंकिता की बेटी है", उन्होंने इसे महज़ एक इत्तेफाक समझा।
आरोही ने जैसे ही रणविजय को देखा, वह डर गई। उसे उसकी सख्त आँखें और भारी आवाज़ से कुछ अजीब सा महसूस हुआ, और वह तुरंत परी के पीछे दुबक गई।
परी ने हंसते हुए कहा, "अरे आरोही, डरो मत! ये मेरे भैया हैं, इनसे मिलो। हाय करो!"
परी के पीछे से आरोही ने अपना नन्हा सा चेहरा बाहर निकाला और अपनी तोतली, प्यारी सी आवाज़ में बोली, "हैलो अंकल... मेरा नाम आरोही है। मैं यहाँ खेलने आई हूँ, मैं बस खेल रही थी। प्लीज अंकल, आप मुझे डराना मत... सॉरी अंकल, मैं आपको परेशान नहीं करूँगी।"
आरोही की वह मासूमियत और उसका डर रणविजय के दिल पर किसी हथौड़े की तरह लगा। रणविजय, जो पत्थर दिल का इंसान था, उसे पहली बार अपनी ही परछाईं को देखकर एक अजीब सी बेचैनी हुई। वह उसे बस एकटक देखता रह गया। उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि एक अनजान लड़की की बेटी उसमें और उस बच्ची में इतनी समानता कैसे हो सकती है?
उधर, अंकिता का घर के दरवाजे पर कदम रखने का वक्त हो चुका था। उसे खबर भी नहीं थी कि अंदर रणविजय खड़ा है और आरोही के सामने खड़ा होकर उसे गौर से देख रहा है।
रणविजय कमरे में गया ही था कि अंकिता अंदर आ गई। उसने सबको नमस्ते किया। आरोही को खींचते हुए बोली, "बहुत परेशान किया न इसने? सॉरी आंटी, ये बहुत बदमाश है।" अंकिता ने आरोही को जल्दी से उठाया और वहां से निकल गई।
अंदर कमरे में रणविजय के सीने में अजीब सी आग सी जल रही थी। उसका दिल धक-धक कर रहा था। उसे लगा जैसे कोई है, कोई अपना ही है जो घर के अंदर आकर अभी बाहर गया है। बेचैनी इतनी बढ़ गई कि वो झटके से बाहर निकला, लेकिन तब तक अंकिता घर के दरवाजे से बाहर निकल चुकी थ
रणविजय ऑफिस में अपनी कुर्सी पर बैठकर फाइल्स देख रहा था। उसे आज के फैशन कलेक्शन का रिव्यू करना था। उसने देखा कि डिज़ाइन्स बहुत ही शानदार थे, एकदम हटके। उसकी भौहें ऊपर चढ़ीं और उसने अपने असिस्टेंट को बुलाया।
"कौन है जिसने ये डिज़ाइन बनाए हैं? इतना परफेक्शन पहले कभी नहीं देखा था।"
असिस्टेंट ने फाइल के पन्ने पलटे और बोला, "सर, ये अंकिता नाम की लड़की ने डिज़ाइन किए हैं। एक महीना पहले ही उसने जॉइन किया है।"
नाम सुनते ही रणविजय का हाथ वहीं रुक गया। 'अंकिता'। ये नाम उसके कान में किसी बिजली की तरह गूंजा। उसका पारा चढ़ गया, दिमाग में वही चार साल पुरानी नफरत और गुस्सा दौड़ गया। उसी पल एक लड़की फाइल लेकर अंदर आई। रणविजय ने उसे देखा, उसे लगा वही होगी। गुस्से और अपनी धुन में उसने बिना कुछ सोचे कहा, "काम अच्छा है, तुम जा सकती हो।" और वो लड़की बाहर निकल गई।
रणविजय ने अपना माथा पकड़ा। उसका मन उसे बार-बार टोक रहा था—'नहीं, ये वो अंकिता नहीं हो सकती। वो अंकिता तो मेरी आँखों में आँखें डालकर ललकारती थी। ये तो कोई और है।' उसके अंदर का वो पुराना रणविजय जाग गया था, उसे उस असली अंकिता की तलाश थी जिसे वो किसी भी हाल में छोड़ने वाला नहीं था।
इधर, घर पर अंकिता की बिटिया आरोही फिर से मचल गई। "मुझे जाना है! मुझे परी मौसी के पास जाना है, दादा-दादी के पास जाना है!" अंकिता बेचारी क्या करती, बच्ची की जिद के आगे उसने हार मान ली और उसे वहां भेज दिया।
दोपहर का वक्त था। रणविजय घर आया तो देखा, ड्राइंग रूम में फिर से वही बच्ची। उसने पूरे ड्राइंग रूम में स्केचिंग कलर्स फैला रखे थे। सोफे पर, कालीन पर, हर जगह रंगों की लकीरें थी। रणविजय को गंदगी और अव्यवस्था से नफरत थी। उसका खून खौल गया, वो गुस्से में पैर पटकता हुआ उस बच्ची की तरफ बढ़ा।
"ये क्या बदतमीजी है? घर को कचरा बना रखा है!"
लेकिन जैसे ही वो बच्ची के पास पहुँचा और उसका चेहरा देखा, उसकी आवाज़ गले में ही अटक गई। आरोही ने अपनी बड़ी-बड़ी आँखों से रणविजय को देखा। वो जरा भी नहीं डरी। उसने एक स्केच दिखाया, जिसमें टेढ़ी-मेढ़ी लकीरें थीं।
"देखो अंकल! ये मम्मा है, और ये मैं हूँ।" उसने मासूमियत से कहा।
रणविजय का गुस्सा जैसे पानी बन गया। वो झुककर बैठ गया।
"ये क्या बनाया है तुमने? मम्मा का चेहरा ऐसा होता है?" रणविजय ने उसकी पेंसिल पकड़ी।
आरोही खिलखिलाकर हँसी, "आप बनाकर दिखाओ न!"
रणविजय, जो कभी अपनी कलम से किसी के मौत के फरमान लिखता था, उसने आज उस छोटी सी बच्ची के लिए स्केचिंग शुरू की।
"अंकल, आप मम्मा को जानते हो?" आरोही ने ड्राइंग करते हुए पूछा।
रणविजय ने एक पल के लिए अपनी आँखें बंद कीं। "तुम्हारी मम्मा... कैसी है वो?"
"मम्मा बहुत अच्छी है, पर वो हमेशा डरती है," आरोही ने मासूमियत से कहा। "वो कहती है कि दुनिया में बहुत गंदे लोग हैं। आप गंदे हो क्या अंकल?"
रणविजय को लगा जैसे किसी ने सीधे उसके सीने में वार किया हो। उसने बड़ी मुश्किल से कहा, "शायद... शायद मैं थोड़ा बुरा हूँ।"
आरोही ने उसकी उंगली थाम ली, "नहीं! आप अच्छे हो। देखो, आपने मुझे डांटा नहीं। जो मुझे नहीं डांटता, वो गंदा नहीं होता।"
रणविजय उसे देखता रह गया। एक अजनबी बच्ची, जो कल तक उसके लिए बस एक अनजान चेहरा थी, आज उसके दिल के सबसे नज़दीकी कोने में जगह बना रही थी। बाप और बेटी—दो अनजाने साये—एक-दूसरे की आँखों में वो सुकून ढूंढ रहे थे जो शायद पूरी दुनिया में कहीं नहीं था।
पप्पु, अब रणविजय का शक और गहरा हो रहा है और दिल भी पिघल रहा है। क्या अब रणविजय इस बात की तह तक जाएगा कि ये बच्ची आखिर किसकी है? आगे क्या करना है?