लघु कथा जमीन
एक जमीन से न जाने कितने रिश्ते जुड़े होते हैं, और न जाने कितने स्वार्थ भी।
सुरेश के पिताजी पिछले आठ महीनों से बीमार थे। अब वो छोटे बेटे के साथ देहरादून में रहते थे। सुरेश के दो भाई और एक बहन थी। सुरेश मंझला था। छोटे भाई ने सभी को फोन करके बुलाया था क्योंकि वो जमीन के बंटवारे पर बात करना चाहता था।
तीनों भाई अपने-अपने परिवार के साथ छोटे भाई के घर पहुंचे। चाय-पानी के बाद बड़े भाई ने बात शुरू की।
"पिताजी आठ महीने से बीमार हैं। दवा से कोई फर्क नहीं पड़ रहा। हमें पिताजी से मिलकर जमीन का फैसला कर लेना चाहिए। गांव में चार बीघा जमीन है। जो बड़े भैया ने संभाल रखी है। बड़े भैया के दो बेटे हैं, दोनों की शादी करनी है। गांव वाला घर भी है, उसके तीन हिस्से कर देते हैं।"
बात पूरी भी नहीं हुई थी कि छोटी बहन बीच में बोली, "भैया, जमीन के चार हिस्से क्यों नहीं होंगे? मेरा भी तो हिस्सा है इस घर में।"
छोटे भाई की पत्नी भी तुरंत बोल पड़ी, "पिताजी के इलाज में हमारे बहुत पैसे खर्च हो गए हैं। इसलिए एक बीघा बेच देते हैं। बाकी बची जमीन चारों में बराबर बांट देते हैं।"
"और मेरी भी तो दो बेटियां हैं," वो आगे बोली, "महंगाई के जमाने में दो शादियां करनी हैं। हमें थोड़ा ज्यादा मिलना चाहिए।"
बहन भी पीछे नहीं रही, "मेरी भी दो लड़कियां हैं। उनके नाम एक बीघा कर दो। फिर हमें आने-जाने में भी दिक्कत नहीं होगी। सबका काम चल जाएगा।" तुम्हे भात देने में दिक्कत नहीं होगी।
पूरा कमरा जमीन के हिस्सों, फायदे-नुकसान और अपने-अपने बच्चों की फिक्र में उलझा था।
मंझला बेटा सुरेश अब तक चुपचाप सब सुन रहा था। उसके अंदर कुछ टूट रहा था। वो सोच रहा था - "पिताजी अभी जिंदा हैं। हम सब उनकी तबीयत देखने आए हैं या उनकी जमीन का बंटवारा करने?"
उसकी आंखें भर आईं। वो बिना कुछ बोले उठा और पिताजी के कमरे में चला गया। पिताजी पलंग पर लेटे हुए थे। शायद वो बाहर हो रही सारी बातें सुन रहे थे। सुरेश को देखते ही उनकी आंखों से आंसू बह निकले।
सुरेश उनके पास बैठ गया। उसने पिताजी का सिर सहलाया और चुप कराने लगा। पिताजी कुछ नहीं बोले। उन्होंने बस सुरेश का हाथ अपने हाथों में लिया और कसकर पकड़ लिया।
कुछ ही पलों में पिताजी का हाथ ढीला पड़ गया। सुरेश ने देखा तो पिताजी ने आखिरी सांस ले ली थी।
शायद उन्हें एहसास हो गया था कि अब उनके बच्चों को उनकी जरूरत नहीं रही। उन्हें अब सिर्फ जमीन चाहिए। इसलिए वो बिना कुछ कहे इस दुनिया से चले गए।
कमरे में सन्नाटा छा गया। बाहर बैठे तीनों भाई-बहन अभी भी हिसाब लगा रहे थे कि किसको कितना मिलेगा। और अंदर मंझला बेटा अपने पिता की अर्थी को देखकर रो रहा था।
उस दिन सबको समझ आया कि जमीन के टुकड़े तो बंट जाते हैं, पर रिश्तों के टुकड़े जुड़ते नहीं। जिस बाप ने सारी उम्र मेहनत करके जमीन जोड़ी थी, उसी की औलादें उसके जीते जी बंटवारे पर उतर आईं। और बाप ने तड़पकर प्राण त्याग दिए।
गांव में आज भी लोग कहते हैं - "जमीन की कीमत तो होती है, पर बाप की कीमत कोई नहीं लगा सकता।"
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डॉ वंदना शर्मा, नई दिल्ली