सूरज ढलने को था और रसोई से उठते धुएँ के बीच सरला जी चुपचाप खड़ी थीं। उनकी नज़र सामने वाले कमरे में बैठी अपनी बेटी रिया पर पड़ी। रिया अपने पति और बच्चों के साथ हँस-हँसकर बातें कर रही थी। सरला जी ने झटपट उसके लिए उसकी पसंद की गरम-गरम पूरियाँ तलीं और थाली सजाकर मेज पर रख दी।
"रिया बेटा, पहले तू खा ले, फिर आराम कर लेना," सरला जी के चेहरे पर एक माँ की ममता झलक रही थी।
तभी बगल वाले कमरे से उनकी बहू नेहा बाहर आई। नेहा दिन भर के दफ़्तर के काम के बाद अभी-अभी लौटी थी और आते ही रसोई के कामों में हाथ बँटाने लगी थी। सुबह की थकावट नेहा की आँखों में साफ दिख रही थी।
नेहा ने धीरे से कहा, "मां जी, मैं भी थोड़ी मदद करवा दूँ?"
सरला जी का रुख अचानक बदल गया। उनके स्वर में ठंडक आ गई, "नहीं, रहने दो। तुम अपने कमरे में जाओ। रिया का पूरा दिन सफर में बीता है, उसे थोड़ा सुकून चाहिए। रसोई में तो मैं संभाल लूँगी।"
नेहा ने नीची नज़र किए चुपचाप अपना सिर हिलाया और मेज पर एक गिलास पानी रख दिया। जब नेहा रिया को खाना परोसने लगी, तो सरला जी ने टोका, "नेहा, रिया को थोड़ा ज़्यादा मक्खन देना, बेचारी थक गई है। और हाँ, शाम की चाय में चीनी थोड़ी कम थी, अगली बार ध्यान रखना।"
नेहा ने बिना कोई शिकवा किए सिर्फ इतना कहा, "जी माँ जी।"
उस रात जब सब सो गए, नेहा बालकनी में खड़ी होकर आसमान को देख रही थी। उसकी आँखों से चुपचाप आँसू बह रहे थे। वह सोच रही थी—'मैं भी तो किसी की बेटी हूँ। जब मैं काम से लौटती हूँ, तो मुझसे कोई क्यों नहीं पूछता कि मेरी थकावट कैसी है? जब रिया आती है तो वह मेहमान और बेटी बन जाती है, पर मैं हर दिन मेहनत करके भी पराई ही रहती हूँ?'
अचानक सरला जी को प्यास लगी। वे पानी लेने रसोई की तरफ बढ़ीं, तो बालकनी से नेहा के सिसकने की आवाज़ आई। वे रुक गईं और छुपकर देखने लगीं।
नेहा अपने फोन पर अपनी माँ से बात कर रही थी। फोन के उस पार से उसकी माँ की आवाज़ आ रही थी, "नेहा बेटा, तू ठीक तो है न? बहुत थकी हुई लग रही है।"
नेहा ने अपने आँसू पोंछे और अपनी आवाज़ को सामान्य बनाते हुए मुस्कुराकर बोली, "नहीं माँ, मैं बिल्कुल ठीक हूँ। बस थोड़ा काम का दबाव था। माँ जी मेरा बहुत ध्यान रखती हैं, तुम बिल्कुल चिंता मत करो।"
यह सुनते ही सरला जी का दिल जैसे किसी ने थाम लिया। जिस बहू को वे हर बात पर टोकती थीं, जिसके साथ वे अपनी बेटी जैसा व्यवहार नहीं करती थीं, वही बहू अपनी माँ के सामने उनका सम्मान बचा रही थी। सरला जी को याद आया कि सुबह से नेहा ने भी बिना कुछ खाए लगातार काम किया था, लेकिन उन्होंने कभी उसका हाल नहीं पूछा।
उन्हें अहसास हुआ कि एक बेटी अपने घर को रोशन करती है, लेकिन बहू दूसरों के घर को सजाने के लिए अपना सब कुछ छोड़ आती है। अगर बहू को प्यार और सम्मान न मिले, तो वह अंदर से टूट जाती है।
सरला जी धीरे-धीरे बालकनी की ओर बढ़ीं। नेहा ने हड़बड़ी में फोन काटा और आँसू पोछते हुए बोली, "माँ जी, आप? आपको पानी चाहिए था? मैं अभी लाती हूँ..."
इससे पहले कि नेहा आगे बढ़ती, सरला जी ने उसका हाथ पकड़ लिया। उन्होंने नेहा के चेहरे से लटें हटाईं और उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "नहीं नेहा, मुझे पानी नहीं, अपनी भूल सुधारनी है।"
सरला जी ने नेहा को अपने गले से लगा लिया। नेहा की आँखों से थकावट और शिकायत के सारे आँसू सरला जी के काँधे पर बह निकले।
"मुझे माफ़ कर दे बेटा," सरला जी की आवाज़ भारी हो गई। "मैं भूल गई थी कि मेरी बेटी रिया अगर किसी घर की खुशी है, तो तू भी किसी माँ का कलेजे का टुकड़ा है। आज से इस घर में दो बेटियाँ होंगी, कोई बहू नहीं।"
उस रात रसोई के चूल्हे की तपिश से परे, एक घर में भेदभाव का अँधेरा मिटा और एक नए रिश्ते का उजाला हुआ।