इस बीती का पूर्वापर संबंध हम बहन- भाई के बचपन से है।
बीती को टप्पा दिया कुंदन ने।
वह हमारी आया, मालती, का बेटा था।
इकलौता। बल्कि विधवा हो जाने पर ससुराल व मायके से एक साथ विस्थापित हुई मालती के पास परिवार के नाम पर यही कुंदन ही बचा था।
इन दोनों को हमारे पिता के एक मित्र उनके पास लाए थे, ‘मालती इन बहन- भाई की देखभाल करेगी और यह लड़का किसी दुकान पर कोई छोटी- मोटी नौकरी पकड़ लेगा और रहेंगे आप के सर्वेंट क्वार्टर में।’
मालती से न ही मां को कभी कोई शिकायत रही थी और न ही आठ माह पूर्व हुई मां की मृत्यु के बाद हम बहन- भाई ही को।
किंतु हाल ही में नई ब्याही आई हमारी सौतेली मां ने हमारी मां की लगभग सभी वस्तुएं एंव व्यवस्थाओं पर अपने हस्तारोपण अंकित करने का अभियान शुरू कर रखा था जिस के अंतर्गत मालती को दो दिन के अंदर अपना क्वार्टर खाली करने का आदेश जारी हुआ था, ‘अब ये बहन- भाई बच्चे नहीं रहे। लड़की तेरह की होने जा रही है और लड़के को ग्यारहवां साल लग चुका है। अब दोनों अपनी देखभाल खुद कर सकते हैं। खुद करेंगे।’
अनिवार्यतः मालती को अपना सामान बांधना पड़ा।
“‘चार साल यहां अच्छे कट गए थे,” कुंदन के साथ मालती हम से विदा लेने हमारे कमरे में आई तो रो पड़ी, “आज फिर से सिर की छत खोने जा रहे हैं।”
“ऐसी भी क्या बात है,अम्मा,” कुंदन ने मां की हिम्मत बांधी, “तब मैं बारह का था। अब मैं सोलह का हूं। तुम्हें छत मैं दिलाऊंगा….”
इन चार वर्षों में कुंदन ने एक के बाद एक कई नौकरियां पकड़ीं थी और हर बार उस की नई नौकरी उस की पिछली नौकरी से बेहतर रही थी। फलस्वरूप उस से हम बहन- भाई जब भी मिले थे, वह सदैव प्रसन्न व संतुष्ट दिखाई देता रहा था।
“आप दोनों को हम भाई- बहन हमेशा याद रखेंगे,” बहन ने उस का उत्साह बढ़ाना चाहा।
“हां,” मैं ने बहन की हां में हां मिलायी।
“हम भी तो कहां भूलेंगे?” मालती ने कहा, “आप जैसे अब हमें मिलेंगे कहां? जो जी को जी समझते हैं। अमीरी- गरीबी का कोई भेद नहीं जानते….”
“भेद कैसा?” बहन ने कहा, “हम सब समान ही तो हैं। वही दो आंखें, दो कान,दो पैर, एक नाक,एक दिल….”
“समान कैसे हैं?” कुंदन के चेहरे पर एक टेढ़ी मुस्कान चली आई, “आप लोग बैठे-ठाले दूसरों की मेहनत की खाते हो और हम लोग अपने खून- पसीने की खाते हैं और वह भी आपकी तरह चिकनी- चुपड़ी नहीं। रूखी- सूखीद….”
“यह लड़का मूर्ख है,” मालती खिसिया गई, “इस की बात पर ध्यान न दो। मेरी बात सुनो।मुझे अपने कुंदन की बहू के वास्ते कोई चीज़ चाहिए। उस की शादी करूंगी तो आप के नाम से उस की बहू को वह मुंह- दिखाई में दूंगी….”
कुंदन को लेकर बहन के मनोभाव मैं कभी सुनिश्चित तो नहीं कर पाया किंतु यह अनिश्चित नहीं कि उस के गुण-दोष विवेचन में बहन उसका मूल्य बढ़ा देती थी।
“क्या दूं?” बहन मेरी ओर देखने लगी, “अपनी कंघियों का यह नया सेट दे दूं या फिर अपने रिबन के वे नए रोल?”
“मुझे हंसाओ नहीं,बेबी। कुंदन की बहू के लिए मांग रही हूं तो कोई कीमती चीज़ ही तो दोगी। जैसे अपने गले की यह चेन या फिर अपने कानों की बालियां….” बहन के हाथ अपने गले पर जा पहुंचे।
प्रयत्न के बावजूद बहन जब अपनी चेन खोल नहीं पाई तो मालती की ओर देखने लगी, “मैं इसे खोल नहीं पा रही।तुम खोल दोगी?”
“मैं खोल दूं?” बहन की हर चाहना मैं पूरी देखना चाहता।
“तू खोल लेगा?” बहन ने हैरानी जतलाई।
“क्यों नहीं? मां के नेकलेस की डोरी मैंने कई बार बांधी तो है और खोली भी….”
यह सच था। मां मुझ पर बहुत भरोसा रखतीं थीं। अपने चुनाव के कई मामले मुझ पर छोड़ दिया करतीं। अपने लिए बाज़ार से नई साड़ी खरीदने से ले कर विशेष आयोजनों पर पहनी जाने वाली साड़ी मुझे ही चुनने को बोलीं, ‘मेरा लाडला जानता है मुझ पर कौन सा रंग ज़्यादा खिलेगा। कैसा किनारा-पल्लू ज़्यादा फबेगा….’
“हां,” बहन की आंखें डबडबा गईं, “मुझे याद है। सब याद है….”
“तुम दोनों अभी तक अपनी मां की बात करते थकते नहीं,” मालती ने सहानुभूति छलकाई, “बेचारी मरी भी तो कैसी अभागी मौत!”
बहन की गालों पर आंसुओं के तार बंधने लगे।
“हम तो पूरा किस्सा जानती हैं,” मालती ने अपना स्वर धीमा कर लिया।
“कौन किस्सा?” बहन की चेन का हुक खोल रहे मेरे हाथ उसी के साथ चिपक गए।
“वह किस्सा तुम मुझ से सुन लेना,” अपने आंसू रोक कर बहन ने मुझ से कहा, “अभी तू यह हुक खोल….”
“नहीं खोलेंगे,” मैं अड़ गया, “जब तक वह किस्सा मुझे मालूम नहीं हो जाएगा….”
“हम आप को बताते हैं, भैय्या जी,” कुंदन ने अपने हाथ को एक घुमावदार चक्कर खिला कर अपने होंठ बिचकाए, “वह पुरानी ठकुराइन अपनी बहन के साथ कहीं घूमने निकल ली थी। ठाकुर की बड़ी मोटर में। ठाकुर से पूछे बिना। लौटी तो ठाकुर ताव खा गया और भय उसे खा गया….”
“भय खा गया?” मैं समझा नहीं।
“डरपोक थी,” कुंदन ने कहा, “मुकाबला करने का हौसला नहीं रखती थी। ठाकुर की बंदूक तनी देखी तो वह अपनी ही फांसी से अपना गला घोंट ली….”
बहन रोने लगी।
मैं तप गया। स्पष्ट था बहन जानती रही थी जब कि मैं ही मां की मृत्यु के निमित्त कारण से अनभिज्ञ रहा था। बहन ने अभी तक मुझे बताया क्यों नहीं था? मुझे उस पीड़ा से बचाने की खातिर जो उस के अंदर घर कर चुकी थी?
“मां मुकाबला कैसे करती?” मैं ने पूछा। पिता के सामने हम बहन- भाई ने मां को हमेशा दबते हुए ही देखा था। यही नहीं, हम दोनों भी मां के सदृश पिता से दबा करते।
“अपनी मोर्चाबंदी ठाकुर के हवाले नहीं करतीं,” कुंदन बोला, “अपने हाथ में रखतीं।”
“मोर्चाबंदी?”बहन रोना भूल गई।
“अपनी रक्षा के लिए अपनी सेना तैयार रखतीं और यदि सेना नहीं थी तो दंड सहतीं। अपने को फांसी नहीं लगातीं।”
“फांसी नहीं लगाती तो ठाकुर की गोली न खाती?” मालती झल्लाई, “तब नहीं मरती?”
“शायद न भी मरती और अगर मरती भी तो ठाकुर के नाम परचा कटवा कर मरती….”
“परचा कौन काटता? यह पुलिस तो ठाकुर की जेब में रही…”
“पुलिस से बड़ी आत्मा नाम की भी कोई चीज़ होती है या नहीं? ठाकुर उसे मारता तो उस की मौत का बोझ अपनी आत्मा पर तो ढोता….”
“चल चुप कर,” मालती की झल्लाहट बढ़ गई, “मर्द और औरत के रिश्ते की बात तू क्या जाने? और बात तो इधर बेबी की चेन की हो रही है और तू उधर अपनी मुरली बजा रहा है….”
मैं ने मालती को अपनी नज़र में उतारा। उस के आभूषण आंकने हेतु। गले की माला के नाम पर उस ने ताबीज़नुमा एक-डेढ़ इंचा लंबा तांबे का लाकेट पहन रखा था जिस की आकृति मटर जैसी थी। मटर ही के दाने जैसी उस के कान की बाली थी। हाथ की उस की सभी चूड़ियां कांच की थीं।
“चलो, भइया जी, आप बेबी की चेन खोल दीजिए,” मालती ने मुझ से कहा।
“हां,” मेरा अंतर्वेग मेरे स्वर में लहराया और मेरे हाथ चेन की हुक पर लौट लिए। कार्यरत हेतु।
उसी रात बहन मेरे बिस्तर की चादर समेट कर उस में मसहरी अभी बिठा ही रही थी कि हमारे पिता तथा नई मां वहां चले आए।
“बेबी के गले की चेन कहां गई?” हमारे पिता ने आते ही अपना प्रश्न हवा में उछाला। धमकी- भरे स्वर में।
“कहीं गिर गई है,” बहन की जगह उत्तर मैं ने दिया।
“स्कूल में तो गिरी न होगी,” नई मां बोलीं, “क्योंकि दोपहर के भोजन के समय तो यह उसे पहने रही थी….”
“किसी को दे तो नहीं दी?” हमारे पिता ने पूछा।
“मालती को दी है,” बहन उगल दी।
“देने से पहले तुझे अपनी नई मां से पूछना नहीं चाहिए था?” पिता ने बहन की गाल पर एक ज़ोरदार तमाचा जड़ दिया, “या मुझ से?”
“पूरे एक तोले की तो ज़रूर रही होगी। खालिस सोने की थी,” नई मां ने हमारे पिता की ओर देखा। उन्हें उकसाने की खातिर?
“क्यों नहीं पूछा किसी से?” हमारे पिता के गुस्से का वार- पार न रहा और वह बहन को घूंसे जमाने लगे। यहां- वहां। जहां- तहां।
“किस से पूछती?” दुस्साहसी स्वर में मैं ने पिता को ललकारा, “आप दोनों ही अपने कमरे में सिटकनी चढ़ा कर सो रहे थे।”
अपने प्रमोदकाल के उन दिनों में हमारे पिता अपनी दोपहरें भी नई मां के साथ बिताया करते।
“कैसा उद्दंड लड़का है!” नई मां ठुनक लीं, “पहले झूठ बोलता है, चेन कहीं गिर गई है। फिर ऐसे बड़े बोल बोलता है….सो रहे थे….कमरे की सिटकनी चढ़ाकर सो रहे थे….दोनों ही अपने कमरे में सो रहे थे….”
“तेरी यह हिम्मत!” बहन को छोड़ कर पिता के घूंसे मेरी ओर आन लक्षित हुए, “बड़ों का लिहाज़ भूल गया, मान- मर्यादा भूल गया….”
“भाई को माफ़ कर दीजिए,” पिता की मार- लताड़ के संवेग को बहन ने पुनः अपने ऊपर ले लेना चाहा, “और फिर बात तो सारी मेरी चेन की है और मालती को वह चेन मैं ने दी थी,भाई ने नहीं। और वह चेन भी मैं ने मालती को अकेले में दी थी। भाई के सामने नहीं।”
“चल हट!मक्कार!!” पिता के हाथ का वार बरबस रुक लिया। उन्हें अपने उस हाथ से अपनी जेब टटोलनी थी।
“हाय रे,” नाटकीय अंदाज़ से नई मां ने अपने कान ढंक लिए– उस का अंग संचालन नाटकीय ही रहा करता– “लड़की भी कैसी झूठ की पोट है!”
“जानती नहीं, कमबख्त उस मां- बेटे को अपने बंगले से भेजते समय हम दोनों ने उन का सामान खुलवाया था और उस में से चेन के बरामद होने पर वे दोनों पूरा सच उगल दिए थे। यह देख,” हमारे पिता हाथ में चेन लिए बहन की ओर बढ़े।
“मुझे माफ़ कर दीजिए,” बहन हाथ जोड़ने लगी। रोती और थरथराती हुई।
“अब बोल,” पिता ने उस की गर्दन पर ज़ोरदार एक घूंसा जमा दिया।
बहन नीचे गिर पड़ी।
“लड़की तो बेहोश हो गई है,” नई मां बहन पर झुकी।
“क्या हुआ?” मैं बहुत घबरा गया।
“इस की तो दोनों नासिकाएं भी बजने लगी हैं,” नई मां ने हमारे पिता की ओर देख कर अपना माथा पीटा।
“क्या…या…या?” ठिठक कर हमारे पिता भी बहन पर झुक लिए।
बहन मर रही थी।