मंजू आज सुबह से ही बहुत थकी हुई महसूस कर रही थी। वैसे तो उसे नींद बहुत कम आती थी, पर आज तो आंखें खोलने का भी मन नहीं हो रहा था।
पति और बच्चों को स्कूल-ऑफिस भेजकर वह बिस्तर पर जा गिरी और गिरते ही उसे नींद आ गई। बेड के ठीक सामने दीवार पर घड़ी टंगी थी।
हर दस मिनट में उसकी आंख खुलती। घड़ी देखती और मन में चिंता शुरू - "अभी तो कपड़े धोने हैं, दोपहर का खाना बनाना है, बच्चों को स्कूल से लाने जाना है। मैं ऐसे कैसे सो सकती हूँ।" बस घड़ी देखती और फिर सो जाती। ऐसा पाँच-छह बार हुआ।
नींद में भी उसका दिमाग शांत नहीं था। वह खुद से ही कह रही थी, "आज मुझे क्या हो गया है? इतनी नींद क्यों आ रही है? कहीं मुझे कोई बीमारी तो नहीं हो गई? इतना सारा काम पड़ा है।"
अचानक उसकी आंख खुली। वह हड़बड़ाकर रसोई में काम करने गई ही थी कि पेट में एक तेज दर्द उठा। वह फिर से बेड पर आकर लेट गई। उसने धीरे से पेट को छूकर देखा कि दर्द कहाँ हो रहा है, तो उसे पेट में बाईं ओर कुछ ठोस सा महसूस हुआ।
बस, यहीं से उसके अति-चिंतन की असली उड़ान शुरू हो गई। उसे डर लगने लगा। मन में बुरे-बुरे विचार आने लगे -
"कहीं मुझे कैंसर तो नहीं हो गया? कहीं पथरी तो नहीं है? हे भगवान, मुझे तो सर्जरी से बहुत डर लगता है। कहीं मैं मर तो नहीं जाऊँगी? मैं मर गई तो मेरे बच्चों का ध्यान कौन रखेगा? मेरा तो कोई ध्यान ही नहीं रखता। मेरे मरने के बाद कोई मुझे याद भी नहीं करेगा।"
"अभी तो मेरे सपने भी पूरे नहीं हुए। मेरा अपना घर भी नहीं बना, मुझे तो एक बार पूरे देश का भ्रमण भी करना था। नहीं-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता।"
वह इसी डर में शाम को डॉक्टर के पास जाने का और कल सुबह खाली पेट सारे ब्लड टेस्ट करवाने का सोचने लगी। सोचते-सोचते उसे फिर नींद आ गई।
फिर आंख खुली तो ठीक दो बजे थे। बच्चों की स्कूल की छुट्टी का समय हो गया था। वह हड़बड़ाकर उठी, जल्दबाजी में खुद को संभाला और ऑटो के लिए घर से निकली। रास्ते में भी उसे नींद आ रही थी, आंखें भारी हो रही थीं। घर आकर उसने बच्चों को खाना दिया और फिर से सो गई।
शाम को जब उसके पति घर आए तो मंजू की ऐसी हालत देखकर वह घबरा गए। दिन भर में वह कई बार सो चुकी थी, चेहरा उतरा हुआ था और पेट दर्द की बात कह रही थी। पति तुरंत उसे डॉक्टर के पास ले गए।
डॉक्टर ने ध्यान से उसकी बात सुनी, जांच की, बुखार देखा और मुस्कुराकर कहा, "मंजू जी, घबराने की कोई बात नहीं है। यह बस एक वायरल संक्रमण है। इस मौसम में थकान, सिर दर्द, आंखों में भारीपन और बदन दर्द आम है। तीन-चार दिन में आप खुद ठीक हो जाएंगी। पेट में जो आपको ठोस लग रहा था, वह गैस और तनाव के कारण मांसपेशियों में खिंचाव है।"
डॉक्टर ने आगे कहा, "आप बीमार शरीर से ज्यादा अपने विचारों से थक गई हैं। इसे ही अति-चिंतन कहते हैं। एक छोटी सी थकान को आपका मन बड़ी बीमारी बना देता है। इतना मत सोचिए।"
यह सुनकर मंजू को बहुत अच्छा लगा, जैसे सिर से बहुत बड़ा बोझ उतर गया हो। उसे समझ आया कि कोई गंभीर बीमारी नहीं है।
उस रात पति ने बच्चों को संभाला, उसे गर्म सूप दिया और कहा - तुमने सबका ध्यान रखा, अब अपना भी रखो।
मंजू ने उसी दिन तय किया। अब वह हर बात को लेकर घंटों नहीं सोचेगी। जब डरावना विचार आएगा तो उसे लिख देगी, गहरी सांस लेगी और खुद से पूछेगी - "क्या यह सच है या मेरा डर है?" उसने समय पर सोना, पानी पीना और थोड़ा टहलना शुरू किया।
अति-चिंतन मन की वह आदत है जो थकान को बीमारी और दर्द को डर बना देती है। और इससे बाहर निकलने का पहला कदम है - अपने मन को समझना और समय रहते किसी अपने से या डॉक्टर से बात करना।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली