🔥♥️ हुक्म और हसरत 🔥♥️
#Arsia
एपिसोड 29 — पहला फैसला
सुबह की हल्की धूप राजमहल की खिड़कियों से होकर कमरे में आ रही थी।
सिया आईने के सामने खड़ी अपने बाल ठीक कर रही थी।
आज उसके चेहरे पर कल वाली झिझक नहीं थी।
कल उसने कई दिनों बाद काम की दुनिया में कदम रखा था।
और आज…
वह खुद को साबित करने के लिए तैयार थी।
तभी दरवाजा खुला।
कव्या हाथों में कुछ फाइलें लिए अंदर आई।
“राजकुमारी साहिबा…”
सिया ने पलटकर देखा।
“हाँ?”
कव्या ने फाइलें आगे बढ़ाईं।
“आज आपके लिए थोड़ा मुश्किल काम है।”
सिया ने फाइलों को देखा।
“कल भी आपने यही कहा था।”
“और कल आपने आधी रात तक काम किया था।”
“तो?”
कव्या मुस्कुराई।
“तो आज शायद रात तक भी करना पड़े।”
सिया ने उसकी तरफ तकिया उठाकर फेंकने की कोशिश की।
“बहुत बोलने लगी हो।”
कव्या हँसते हुए पीछे हट गई।
तभी दरवाजे पर अर्जुन दिखाई दिया।
सिया की नजर उस पर पड़ी।
“आप भी आ गए?”
“हाँ।”
“और आज मुझे काम से रोकेंगे नहीं?”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा,
“आज नहीं।”
सिया मुस्कुराई।
“बहुत अच्छे।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन अगर थकान लगे तो काम रोक देंगी।”
सिया ने तुरंत चेहरा बनाया।
“आपको हर बात में शर्त क्यों लगानी होती है?”
“क्योंकि आप हर बात में जल्दबाजी करती हैं।”
“मैं?”
“जी।”
सिया ने कव्या की तरफ देखा।
“देख रही हो?”
कव्या ने तुरंत नजरें झुका लीं।
“मैं बीच में नहीं पड़ रही।”
सिया ने आँखें घुमाईं।
“धोखेबाज।”
---
कुछ देर बाद तीनों राजमहल के कार्यालय में थे।
सिया ने सामने रखी पहली फाइल खोली।
“ये किस बारे में है?”
कव्या ने कहा,
“शहर के पुराने बाजार के पास सड़क की हालत बहुत खराब है। पिछले कुछ महीनों से वहाँ रहने वाले लोग शिकायत कर रहे हैं।”
सिया ने कागज पलटे।
“तो सड़क बनवा देते हैं।”
कव्या कुछ कहती, उससे पहले अर्जुन बोला,
“इतना आसान नहीं है।”
सिया ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
अर्जुन ने सामने रखे नक्शे की तरफ इशारा किया।
“सड़क के दोनों तरफ दुकानें हैं।”
“तो?”
“सड़क चौड़ी करनी होगी।”
सिया कुछ पल चुप रही।
“इससे दुकानदारों को परेशानी होगी।”
“और अगर सड़क चौड़ी नहीं हुई तो लोगों को।”
सिया ने फिर फाइल पढ़नी शुरू कर दी।
कुछ देर तक कमरे में सिर्फ कागजों की आवाज सुनाई देती रही।
फिर उसने पूछा,
“कितने परिवार वहाँ रहते हैं?”
कव्या ने तुरंत दूसरा कागज निकाला।
“लगभग पैंतीस परिवार।”
“और दुकानदार?”
“बयालीस।”
सिया ने गहरी सांस ली।
“अगर हम सड़क चौड़ी करते हैं तो बहुत सारे लोगों की दुकानें हटानी पड़ेंगी।”
अर्जुन चुपचाप उसे देख रहा था।
सिया ने उसकी तरफ देखा।
“क्या करूँ?”
अर्जुन ने कोई जवाब नहीं दिया।
सिया ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“आपको पता है।”
“हाँ।”
“तो बताइए।”
“फैसला आपको करना है।”
सिया कुछ पल उसे देखती रही।
“आप मदद नहीं करेंगे?”
अर्जुन ने शांत स्वर में कहा,
“मदद करूँगा।”
“कैसे?”
“आपको जवाब देकर नहीं।”
सिया ने नाराज होकर कहा,
“फिर?”
“आपको सही सवाल सोचने में मदद करके।”
सिया चुप हो गई।
अर्जुन ने नक्शे की तरफ देखा।
“अगर सड़क चौड़ी होगी तो किसे फायदा होगा?”
“शहर के लोगों को।”
“और नुकसान?”
“दुकानदारों को।”
“तो क्या दोनों के बीच कोई रास्ता हो सकता है?”
सिया ने फिर नक्शा देखा।
उसकी आँखों में सोच उतर आई।
वह अपनी कुर्सी से उठी और नक्शे के पास चली गई।
“अगर सड़क को इस तरफ से चौड़ा करने के बजाय…”
उसने नक्शे पर उंगली रखी।
“पीछे वाली खाली जमीन को इस्तेमाल किया जाए?”
कव्या तुरंत आगे आई।
“लेकिन वहाँ पुराना गोदाम है।”
सिया की नजर अर्जुन पर गई।
“क्या वह जमीन राजपरिवार की है?”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“कुछ हिस्सा।”
सिया के चेहरे पर हल्की चमक आई।
“तो सड़क दूसरी तरफ से बनाई जा सकती है।”
अर्जुन ने कुछ नहीं कहा।
सिया मुस्कुराई।
“देखा?”
“क्या?”
“मैंने खुद समाधान निकाल लिया।”
“जी।”
“आपको मुझ पर भरोसा नहीं था।”
अर्जुन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा,
“मुझे था।”
सिया कुछ पल चुप रही।
उसकी मुस्कान अपने आप गहरी हो गई।
---
दोपहर तक सिया ने उस इलाके की पूरी जानकारी मंगवा ली।
वह सिर्फ कागज देखकर फैसला नहीं करना चाहती थी।
उसने कहा,
“मैं खुद वहाँ जाऊँगी।”
कव्या ने तुरंत कहा,
“आज?”
“हाँ।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“मैं साथ चलूँगा।”
सिया ने मुस्कुराकर कहा,
“ये तो मुझे पता ही था।”
---
कुछ देर बाद वे शहर के पुराने बाजार में पहुँचे।
सड़क सच में बहुत खराब थी।
जगह-जगह गड्ढे थे।
बारिश का पानी जमा था।
दुकानदार अपनी दुकानों के बाहर खड़े थे।
जैसे ही सिया वहाँ पहुँची, लोगों ने उसे पहचान लिया।
एक बुजुर्ग दुकानदार आगे आए।
“राजकुमारी साहिबा…”
सिया ने मुस्कुराकर कहा,
“आप मुझे साहिबा मत कहिए। बस सिया कहिए।”
बुजुर्ग के चेहरे पर मुस्कान आ गई।
“आप खुद हमारी समस्या देखने आई हैं?”
“हाँ।”
उन्होंने सड़क की तरफ इशारा किया।
“सालों से शिकायत कर रहे हैं। कोई सुनने नहीं आया।”
सिया ने आसपास देखा।
“अगर सड़क चौड़ी करने के लिए आपकी दुकान हटानी पड़े तो?”
बुजुर्ग तुरंत चुप हो गए।
पीछे खड़े दूसरे दुकानदार भी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
एक आदमी आगे आया।
“हम अपनी दुकानें नहीं छोड़ सकते।”
सिया ने धीरे से कहा,
“मैं आपकी दुकानें नहीं हटाना चाहती।”
सबकी नजरें उसकी तरफ उठ गईं।
“लेकिन सड़क भी ठीक करनी है।”
एक महिला ने पूछा,
“तो रास्ता क्या है?”
सिया ने पीछे खड़े अर्जुन की तरफ देखा।
अर्जुन शांत खड़ा था।
वह कुछ नहीं बोला।
सिया ने वापस लोगों की तरफ देखा।
“रास्ता हम मिलकर निकालेंगे।”
उसने अपने साथ आए अधिकारियों से कहा,
“पुराने गोदाम वाली जमीन का पूरा रिकॉर्ड निकालिए। अगर वहाँ से रास्ता बन सकता है, तो किसी की दुकान हटाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।”
लोगों के चेहरों पर उम्मीद दिखाई देने लगी।
एक दुकानदार ने हाथ जोड़ दिए।
“भगवान आपको खुश रखे, राजकुमारी साहिबा।”
सिया ने मुस्कुराकर कहा,
“मुझे धन्यवाद मत दीजिए। पहले काम पूरा होने दीजिए।”
अर्जुन के चेहरे पर हल्की-सी संतुष्टि दिखाई दी।
सिया ने उसे देख लिया।
---
वापसी के रास्ते में गाड़ी में कुछ देर तक दोनों चुप रहे।
फिर सिया ने धीरे से पूछा,
“आप खुश हैं?”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
“क्यों?”
“आज मैंने फैसला सही लिया ना?”
“हाँ।”
सिया मुस्कुराई।
“बस?”
“क्या चाहिए?”
“थोड़ी तारीफ।”
अर्जुन ने गंभीरता से कहा,
“अच्छा काम किया आपने।”
सिया ने आँखें बड़ी कर लीं।
“इतनी-सी?”
“और क्या कहूँ?”
“पता नहीं…”
वह कुछ पल सोचकर बोली,
“बहुत अच्छा किया, राजकुमारी।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा।
सिया हँस पड़ी।
“ऐसे।”
अर्जुन ने सिर हिलाया।
“आपको तारीफ की आदत डालनी है?”
“हाँ।”
“तो काम भी ऐसा ही करना पड़ेगा।”
सिया ने होंठ फुला लिए।
“आप ना…”
“क्या?”
“बहुत कंजूस हैं।”
“किस चीज में?”
“तारीफ में।”
अर्जुन के होंठों पर हल्की मुस्कान आई।
“ठीक है।”
“क्या?”
“अगली बार दो शब्द ज्यादा बोल दूँगा।”
सिया हँसते हुए खिड़की की तरफ देखने लगी।
---
शाम को कार्यालय लौटकर सिया ने पूरे दिन की रिपोर्ट खुद तैयार की।
कव्या ने उसे देखा तो हैरान रह गई।
“आप सच में सीख रही हैं।”
सिया ने मुस्कुराकर कहा,
“सीखना ही तो है।”
“और अगर कोई आपको रोकने की कोशिश करे?”
सिया ने कुछ पल सोचा।
फिर आत्मविश्वास से बोली,
“तो पहले समझूँगी कि वह क्यों रोक रहा है।”
कव्या ने सिर हिलाया।
“अब आप सच में राजकुमारी लग रही हैं।”
सिया मुस्कुराई।
लेकिन कमरे के बाहर खड़ा अर्जुन उन दोनों की बात सुन रहा था।
उसने सिया को देखा।
कल तक जो लड़की लंबे समय बाद काम पर लौटी थी…
आज वही लड़की अपने लोगों की समस्या का समाधान ढूँढने के लिए खुद मैदान में उतर चुकी थी।
उसकी नजर कुछ पल सिया पर टिकी रही।
फिर वह चुपचाप वहाँ से चला गया।
उसे पता था…
सिया के लिए यह सिर्फ पहला फैसला था।
लेकिन आने वाले दिनों में उसके सामने फैसले कहीं ज्यादा कठिन होने वाले थे।
और उन फैसलों के साथ…
कुछ ऐसे लोग भी उसके करीब आने वाले थे,
जिनके चेहरे पर मुस्कान होगी…
लेकिन इरादे कुछ और।
— एपिसोड 29 समाप्त —
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© Diksha
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