अम्हेल को आवाज़ देते देते मैथिली उसके कमरे की छत पर पहुंच गई "तुम्हें सर्दियों में क्यूं इस क़दर छत पर टहलने का शौक़ है वो भी बग़ैर शॉल, ठंड लग जाएगी तो सारे एहसास सिर्फ़ बिस्तर पर पड़े रहकर करना।"
अम्हेल को उसकी बात पर हंसी आ गई, वो उसी देखकर मुस्का दी। मैथिली ने कमरे में से शॉल लाकर कहा "मैं नहीं मना करती तुम्हे मगर शॉल लेकर आया करो ना।"
शॉल उसे थमाकर फिर मैथिली ने कहा "शेख़ बाबा ने कहलवाया है की इस मामले की तुम ऐन गवाह हो इसलिए लफ़्ज़ ब लफ़्ज़ कोर्ट रूम में तुम्हे गवाही देना है। तुम... तयार हो?"
"हमें सही और ग़लत का अंदाज़ा है।..कुछ ही लोग है जो बिना किसी डर सही के साथ रहते है, और ये दुनिया ऐसे लोगों की तालाश करती है।.. तुम बताओ हमें क्या करना चाहिए?" उसने पूछा
"हमलोगों को पीछे हटना नही सिखाया जाता इसलिए हम डटे रहते है बिना किसी की परवाह किए वही करते है जिससे ज़मीर राज़ी होता है।"
"बाबा से कह दो हम तयार हैं।"
"मैं तुम्हारे साथ हूं। मैं बाबा से बता देती हूं।" मैथिली चली गई।
अम्हेल छत पर से कमरे में आकर बिस्तर पर बैठकर ख़त को दुबारा पढ़ते हुए अपनी उलझनों में उलझने लगी। थोड़ी ही देर में मैथिली हाड़बड़ते हुए लौट आई
"बाबा का गुस्सा जलाली हो गया है, ये उन्हें बहुत कम आता है।" उसके चेहरे पर घबराहट थी "सुनवाई शुरू हो गई है, वहां बीबिजी के साथ अनाबी भी बैठी है।" मैथिली की बात ख़त्म होते ही कुसुम हांपते हुए कमरे में पहुंच गई
"अम्हेल आपी आपके लिए अम्मा साहब का पैग़ाम है कि जबतक सुनवाई ख़त्म नहीं हो जाती आप यहां से कहीं नहीं जाएंगी।"
"ऐसा क्यों?" अम्हेल ने बेपरवाही से सवाल किया मगर कुसुम तबतक जल्दी जल्दी में वहां से जा चुकी थी।
अम्हेल के मन में कई तरह के सवाल उठे, सुबह से अबतक के सारे हालात का जायेज़ा करते हुए वो सोचने लगी शायद वाक़ई उससे वो लोग नाराज़ हो गए हैं, शायद इसमें उससे भी कोई ग़लती हो गई। अम्हेल इस रवय्ये को न समझ पाई और तरह तरह के ख़्याल उसके मन में घूमने लगे। उसकी परेशानी को देखकर मैथिली ने उसका भ्रम तोड़ते हुए कहा
"शायद तुम अभी समझ नही पाई की यहां के लोग तुम्हारी हिफाज़त चाहते है।" उसकी नादानी पर मुस्कुराकर मैथिली जाने लगी "मैं मालूम करके आती हूं क्या हो रहा है वहां।"
मैथिली चली गई, उसकी पायल की गूंजती आवाज़ें ख़ामोश महल की सारी दीवारों तक पहुंची लेकिन कोर्ट रूम से टकरा टकरा कर पलट गई क्योंकि हम्ज़ा ने महल के लोगो के मन में ऐसा मंज़र बिठा दिया कि यहां लोगों को सिर्फ़ अपने अंदर के गुस्से और झुंझलाहट की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
कोर्ट रूम में सालों बाद शेख़ बाबा का तेज आज फिर से देखने को मिला, जो गुस्सा सालों पहले उन्हें अम्मा साहब की सुनवाई में आया था आज उनकी बेटी के लिए उन्हे उसी तेवर को दुबारा अपनाना पड़ा। आज एक बार फ़िर से शेख़ बाबा मीर साहब बन गए, एक बार फिर उन्होने मीर ए महल की बातों का मान रख लिया, और वो फिर से मीरास महल में जन्मे हालात से शर्मिंदा हैं।