जिलिंगटांडी गाँव में अब रामलाल को लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ होने लगी थीं।कोई कहता—
“रामलाल को किसी अज्ञात देवता का आशीर्वाद है।”
दूसरा कहता—
“बाँसुरी की वह मधुर धुन सिर्फ उसी को सुनाई देती है।”
तीसरा धीरे से बोलता—
“और उस दिन पीपल के नीचे मिली माँ काली की माला... शायद उसी शक्ति की कोई निशानी हो!”
गाँव में तरह-तरह की बातें होने लगी थीं।
लेकिन कुछ लोग रामलाल के पक्ष में भी बोलने लगे थे।
“इसने बुराई क्या की है?”
“दीक्षा लेकर कोई गुनाह तो नहीं किया।”
“उलटे अपना जीवन सही दिशा में ले जा रहा है।”
इन्हीं चर्चाओं के बीच एक सुबह रामलाल स्कूल जाने के लिए घर से निकला।
रात की बारिश के कारण रास्ते में जगह-जगह पानी जमा था। खेतों के किनारे घास पर ओस की बूंदें चमक रही थीं।
कुछ दूर जाने पर उसने देखा—मगन अपनी गाय-बैलों को चरा रहा था।
रामलाल को देखते ही मगन ने हाथ उठाकर उसे रोक लिया।
“रामलाल!”
रामलाल रुक गया।
“क्या हुआ, दादा?”
मगन ने इधर-उधर देखा और फिर तीखे स्वर में पूछा—
“सुना है तेरे भाई बिरसा तुझे बाप की जमीन से बेदखल कर रहा है? तू उस दिकू गुरु को छोड़ क्यों नहीं देता?”
रामलाल कुछ क्षण चुप रहा।
फिर शांत स्वर में बोला—
“दादा, मेरा भाई पिता समान है। मैं उससे लड़ूँगा नहीं। मैं अपने चरित्र से उदाहरण बनकर दिखाऊँगा।”
मगन ने भौंहें सिकोड़ लीं।
“तू उस दिकू गुरु को नहीं छोड़ेगा?”
रामलाल ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—
“दादा, हमने पकड़ा ही क्या है? सब तो छूटा हुआ है। क्या तुमने दया पकड़ी है? प्रेम की बातें क्या घर में होती हैं?”
मगन कुछ क्षण उसे देखता रहा।
रामलाल की आवाज में अब शिकायत नहीं, बल्कि अपने जीवन का अनुभव था।
वह धीरे से बोला—
“काश... मैंने पहले दीक्षा ली होती।”
मगन ने व्यंग्य से कहा—
“अब पछताने से क्या होगा?”
रामलाल ने गहरी साँस ली।
“मुझे अच्छी तरह याद है... माही की माँ से मेरा कितना झगड़ा हुआ करता था। मैंने बहुत दारू पी। एक दिन नशे में नाले में गिर गया था।”
मगन चुपचाप सुनता रहा।
रामलाल ने कहा—
“उस समय किसी ने मुझे यह नहीं कहा कि तू दारू को मत छोड़, मन की गुलामी को छोड़। मन की गुलामी छूट जाएगी तो दारू अपने आप छूट जाएगी।”
कुछ क्षण के लिए उसकी आवाज भर्रा गई।
“सबने मेरे पैसों से मौज की... तुमने भी, मगन दा।”
मगन का चेहरा कठोर हो गया।
“बातें तू तो अब बहुत गहरी करने लगा है।”
रामलाल चुप रहा।
मगन ने कुछ क्षण बाद फिर कहा—
“मगर तुमसे हर संताल पूछेगा—‘क्या हमारे मारांग बुरू, लुगू बाबा में उतनी शक्ति नहीं, जो तुम दूसरों के देवता की पूजा करो?’ तब क्या जवाब देगा?”
रामलाल ने तुरंत उत्तर नहीं दिया।
दूर कहीं एक हल्की रोशनी दिखाई दी।
उसने कुछ क्षण उस ओर देखा।
फिर धीरे-धीरे अपनी आँखें बंद कर लीं।
कुछ पल बाद उसकी आवाज सुनाई दी—
“दादा, भगवान एक है। परंतु वह वास्तव में निराकार है। वह असीम है। और असीम को साकार रूप में ही जाना जा सकता है।”
मगन ने सिर हिलाया।
“मुझे तेरी बातें अब समझ में नहीं आ रही।”
फिर वह अपनी आस्था पर दृढ़ होकर बोला—
“मैं इतना जानता हूँ कि हमारे देवताओं में असीम शक्तियाँ हैं। तू उसमें अपने आप को खो दे, सब कुछ पाएगा।”
रामलाल ने कोई उत्तर नहीं दिया।
तभी पास ही झाड़ियों के पीछे से किसी के कदमों की आहट सुनाई दी।
दोनों ने उधर देखा।
सोहरी धीरे-धीरे उनकी ओर आ रहा था।
वह कुछ दूरी पर बैठकर काफी देर से उनकी बातें सुन रहा था।
मगन ने उसे देखकर पूछा—
“तू कब से सुन रहा था?”
सोहरी हल्का-सा मुस्कराया।
“जब से बात दिल की होने लगी।”
मगन चुप हो गया।
सोहरी ने रामलाल की ओर देखा और बोला—
“मैं तो रामलाल के साथ हूँ।”
मगन ने कोई उत्तर नहीं दिया।
सोहरी आगे बोला—
“मेरे पिता कहा करते थे कि बहुत पहले इस जंगल में मारांग बुरू सफेद घोड़े पर सवार होकर संतालों के बीच उठते-बैठते थे।”
रामलाल ध्यान से उसकी बात सुनने लगा।
“जब उनकी बाँसुरी की मधुर ध्वनि जंगल में गूँजती थी,” सोहरी ने कहा, “तब लोग उस बड़ी चट्टान के पास जाते थे।”
रामलाल की आँखें स्थिर हो गईं।
सोहरी ने धीरे से कहा—
“लोग जो माँगते थे, वही मिलता था।”
हवा अचानक तेज हो गई।
पीपल की पत्तियाँ सरसराने लगीं।
सोहरी ने दूर जंगल की ओर देखते हुए कहा—
“आज वही धुन फिर सुनाई दे रही है।”
मगन ने बेचैनी से पूछा—
“क्या कहना चाहता है तू?”
सोहरी ने रामलाल की ओर देखा।
“अवश्य ही उस गुरु में मारांग बुरू का कोई रूप है।”
रामलाल कुछ नहीं बोला।
उसकी नजर अब गाँव के बाहर खड़ी उस बड़ी चट्टान की ओर टिक गई थी।
उसी क्षण—
दूर जंगल से बाँसुरी की वही मधुर धुन सुनाई दी।
धीमी...
मधुर...
और पहले से कहीं अधिक स्पष्ट।
रामलाल का हृदय तेजी से धड़कने लगा।
उसने आँखें बंद कर लीं।
धुन के बीच उसे जैसे किसी ने बहुत धीमे स्वर में पुकारा—
“रामलाल...”
उसने अचानक आँखें खोल दीं।
मगन और सोहरी दोनों उसकी ओर देख रहे थे।
रामलाल ने कुछ नहीं कहा।
उसकी आँखें अब उसी बड़ी चट्टान पर टिकी थीं, जिसके बारे में सोहरी के पिता बताया करते थे।
और उसके मन में पहली बार एक नया सवाल उठा—
क्या बाँसुरी की धुन केवल उसे बुला रही थी...
या उस बड़ी चट्टान के भीतर कोई ऐसा रहस्य छिपा था, जो उसके अपने अतीत से जुड़ा हुआ था?