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Jeetendra

Jeetendra

@a9560
(64)

सुबह सात बजकर बीस मिनट हुए थे।
आज भी वही रूटीन।
बाथरूम का दरवाज़ा खुला।
दर्पण के सामने खड़ी हुई।
लाइट जलाई।
ट्यूबलाइट की ठंडी सफ़ेद रोशनी चेहरे पर पड़ी।

मैंने दाँत ब्रश किया।
मुँह धोया।
फिर हाथों से चेहरा पोंछा।
और फिर... वही काम।
जो पिछले तीन साल से हर सुबह करती हूँ।
मुस्कुराई।
दर्पण में देखकर।
बस एक बार।
हल्की-सी।
जैसे कोई पुराना दोस्त मिल गया हो।

आज भी मुस्कुराई।
पर कुछ अजीब लगा।
मुस्कान टिकी नहीं।
होंठ उठे तो थे, पर आँखों तक नहीं पहुँची।
जैसे होंठों ने धोखा दे दिया हो।
या शायद आँखों ने मना कर दिया हो।

मैंने फिर कोशिश की।
इस बार ज़ोर से।
दाँत दिखाकर।
वो मुस्कान जो ऑफिस में सबको दिखाती हूँ।
"गुड मॉर्निंग सर", "हाँ जी बिल्कुल", "नो प्रॉब्लम" वाली।
पर दर्पण ने कह दिया—नहीं।
ये भी झूठी लग रही है।

अब थोड़ा गुस्सा आया।
मैंने आईने से नज़रें मिलाईं।
और बोली—
"क्या प्रॉब्लम है तुझे?
बस एक मुस्कान ही तो चाहिए।
कितना मुश्किल है?"

आईना चुप रहा।
बस मेरी आँखें मुझे घूरती रहीं।
थकी हुई।
थोड़ी सूजी हुई।
और बहुत पुरानी।

मुझे याद आया—
पिछली बार कब सचमुच मुस्कुराई थी मैं?
नहीं, वो हँसी नहीं जो फ़ोन पर आती है।
नहीं, वो मुस्कान नहीं जो पड़ोसन को देखकर देनी पड़ती है।
वो मुस्कान जो अंदर से आती है।
जो छाती में गुदगुदी करती है।
वो कब आई थी आखिरी बार?

शायद उसी शाम जब राहुल ने कहा था—
"तू ऐसे ही मुस्कुराती रहे, बस।
बाकी सब मैं संभाल लूँगा।"

उसके बाद कभी नहीं आई।
न उसकी बात आई।
न वो शाम।
न वो मुस्कान।

मैंने हाथ बढ़ाया।
आईने पर उँगली रखी।
अपने होंठ छुए।
ठंडे थे।
जैसे किसी और के होंठ हों।

फिर धीरे से बोली—
"ठीक है।
न सही।
आज नहीं तो कल।
पर एक दिन फिर आएगी।
मुझे पता है।"

आईने ने जवाब नहीं दिया।
पर इस बार उसकी चुप्पी में कुछ अलग था।
जैसे वो कह रहा हो—
"मैं इंतज़ार कर रहा हूँ।
तू बस मत छोड़ना कोशिश।"

मैंने लाइट बंद की।
बाथरूम से निकली।
आज भी ऑफिस जाना था।
आज भी वही "गुड मॉर्निंग" वाली मुस्कान लगानी थी।

पर जाते हुए एक बार फिर मुड़ी।
अँधेरे में भी दर्पण पर हल्की-सी चमक थी।
शायद मेरी आँखों की।
या शायद उस मुस्कान की जो अभी आने वाली है।

बस इतना ही।
एक दिन।
एक कोशिश।
और थोड़ा सा भरोसा।

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पत्नी: “तुम्हें मुझमें सबसे अच्छा क्या लगता है?”
पति सोच में पड़ गया।
पत्नी: “जल्दी बोलो।”
पति: “तुम्हारा… टाइम पर गुस्सा उतर जाना।”

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वो बोली,
“तुम्हारी बातें सुनकर दिमाग़ काम करना बंद कर देता है।”
मैंने कहा,
“क्योंकि कुछ चीज़ें दिमाग़ से नहीं, फील से समझी जाती हैं।”
वो बोली,
“तुम बहुत खतरनाक हो।”
मैंने कहा,
“खतरनाक नहीं… प्रैक्टिकल हूँ।” 😄

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युवा उम्र में सपनों को बस बहने मत दो,
कैरियर चुनो ऐसा जिसमें खुद को पहचान सको।
दुनिया क्या कहे, ये सोच कर कदम मत रोकना,
दिल और दिमाग दोनों कहें “हाँ”, वही रास्ता चुनना।

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तेरा नाम जब लबों पे आता है,
दिल कुछ पल को ठहर जाता है,
न जाने कैसी आदत है ये,
हर रास्ता तुझ तक ही जाता है।

हर इंसान थका हुआ है—
कोई शरीर से, कोई दिमाग से, कोई हालात से।
फ़र्क सिर्फ इतना है कि
कुछ लोग थककर रुक जाते हैं
और कुछ लोग थककर भी चलते रहते हैं।

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सुबह की धूप सा मन रखो,
हर हाल में उजला तन रखो,
Good Morning बस इतना कहती है,
आज खुद को सबसे ऊपर रखो।