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जो ये राहें बोलती राज़ खोलती । हर राहगीर को रोज तोलती । हो जाता कहर इस जमानें में जो राहें भी अपनी रज़ा बोलती । - Alok Mishra
तरंगों से सराबोर हो जिंदगी उमंगों से सराबोर हो जिंदगी अबकी होली जी भर खेलो कि रंगों से सराबोर हो जिंदगी - Alok Mishra
अपना शहर अपना ही होता है उसे भी तो रोज बदलना होता है लोग छोड़ जाते है उसे आवारा समझ उसे भी तो वक्त के साथ चलना होता है - Alok Mishra
इंतजार इंतजार और इंतजार जीने का सलीका बदल लिया - Alok Mishra
गर दिल होगा तुम्हारे भी सीने में कभी तो तड़पोगे हम याद आऐंगे -Alok Mishra
इश्क तो किया था दोनों ने | कुछ हमने खोया कुछ तुमने | तन्हा तुम भी हुए और हम भी | कुछ हमने खोया कुछ तुमने | बिछडे थे तो नम थी आंखें चारों | कुछ हमने रोया कुछ तुमने | जहर के बीज थे पनप गए | कुछ हमने बोया कुछ तुमने | शायद कुछ और था पाने को | कुछ हमने पाया कुछ तुमने | बुत हो गए दिल दोनों ही | कुछ हमने ढोया कुछ तुमने | आलोक मिश्रा "बुत"
कितना तराशू में अपने ही बुत को उन्हें तो हर-सू कमीयां नज़र आती है -Alok Mishra
भूल तो बहुत है जिंदगी में । पर भूल से भी तुम्हें भूल जाउं ये हो नहीं सकता । भूलना तुमको मेरी भूल होगी । जो भूल हो ऐसी जिंदगी मुझे भूल जाए । आलोक मिश्रा बुत -Alok Mishra
दस्तान मसला ही कहां था प्यार का | वो हुनर बता रहे थे व्यापार का | बस हम ही बेवकूफ बनते रहे , समय ही कहां था उन्हें प्यार का | बस एक झूठ था उस इकरार का | झूठ था अमल वादों के इरादों का| हमें हर शब्द सच्चा ही लगा हर दम , वो मज़ाक ही उड़ाते रहे एहसास का | किस्सा अजीब था उस बदकार का | हुनर अज़ीम था उस फनकार का | हम ही अश्क बहाते रहे ईमान से , उसे तो मज़ा आ रहा था तमाशे का | आलोक मिश्रा "बुत" -Alok Mishra
कुछ हमनें कुछ तुमनें इश्क तो किया था दोनों ने | कुछ हमने खोया कुछ तुमने | तन्हा तुम भी हुए और हम भी | कुछ हमने खोया कुछ तुमने | बिछडे थे तो नम थी आंखें चारों | कुछ हमने रोया कुछ तुमने | जहर के बीज थे पनप गए | कुछ हमने बोया कुछ तुमने | शायद कुछ और था पाने को | कुछ हमने पाया कुछ तुमने | बुत हो गए दिल दोनों ही | कुछ हमने ढोया कुछ तुमने | आलोक मिश्रा "बुत" -Alok Mishra
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