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माँ, पत्नी, बहू... और एक 'औरत' ठंडी हवा के झोंके सुबह की नींद को और गहरा कर देते हैं, जब हम थोड़ी और चादर ऊपर खींच कर बेफिक्र होकर सोते हैं और सपनों में खोते हैं। ठीक उसी वक्त हमारी माँ अपनी मीठी नींद छोड़कर अपने पति और बच्चों के लिए शगुन, एक बेहतर लाइफ और एक बेहतरीन दिन बनाने के लिए जतन करती हैं। घर के बाहर पहली औरन (घर के फ्रंट रास्ते पर शगुन के लिए रंगोली या चौकपूर्णा, जिससे उनके बच्चे, पति और घर में खुशहाली बनी रहे)—और ऐसे ना जाने कितने काम वह बस घर और बच्चों की खुशहाली के लिए करती हैं। शायद ये सभी माताएँ करती हैं, और धीरे-धीरे यह उस घर की बहू और बेटी भी सीख जाती हैं। कुछ चीजें हमें सिखाई नहीं जातीं, लड़कियों में यह माँ को देखकर खुद-ब-खुद आ जाती हैं। सुबह के 4:30 बज रहे थे। उस वक्त घर के सभी सदस्य एक सुकून और गहरी नींद में सो रहे थे। सुमन घर की औरन और रंगोली बनाने में व्यस्त थीं और मन ही मन घर की खुशहाली और बच्चों, पति के लिए दुआ कर रही थीं। लगभग मोहल्ले की सारी औरतों का यह एक तय काम था और उस वक्त सभी यही करती थीं। सुमन अपने बाहर के काम निपटा कर मुस्कुराते हुए रसोई के कामों में लग गईं। धीरे-धीरे घर में सभी की नाश्ते की फरमाइशें और काम के लिए माँ को आवाज गूंज की तरह आने लगीं। सुमन कभी रसोई में भागतीं, तो कभी बच्चों के पास, तो कभी पति के पास... (माँ के बिना जिंदगी वैसे ही बहुत अधूरी होती है; वह बस घर में हो तो लगता है कि घर सच में घर है, और वह ना हो तो लगता ही नहीं कि घर सच में घर है)। ठीक ऐसे ही सुमन सभी के लिए थीं, और वह इसमें खुश थीं। रात के 10 बजे तक बस वह सभी की फरमाइशों पर ही काम करती रहती थीं। सुमन रसोई में काम करने में व्यस्त थीं, और उनकी बेटी उनकी मदद कर रही थी। जब सुमन पराठे बनाने में पूरी तरह मग्न थीं, तभी रूही ने कप में चाय डालते हुए नरमी से पूछा, "मम्मी, क्या आप सच में इस तरह से खुश हैं?" यह सवाल सुनकर सुमन का दिल एक पल के लिए थम गया, और उनके चेहरे की हंसी थोड़ी फीकी पड़ गई। रूही की ओर देखते हुए उन्होंने जवाब दिया, "हाँ, मैं बहुत खुश हूँ। मैं क्यों नहीं होऊँगी? यह मेरा घर है, और मेरे पति और बच्चे मेरे साथ यहीं पर हैं।" रूही अपनी माँ के चेहरे को लगातार घूरती रहीं—शायद उस जवाब के पीछे छिपे असली सच की तलाश कर रही थीं, वह सच जो सिर्फ एक 'माँ, पत्नी और बहू' के लिए नहीं, बल्कि एक व्यक्ति 'सुमन' के लिए था। तभी रसोई के बाहर से रूही के पिता ने कड़े स्वर में डाँटते हुए कहा, "क्या कर रही हो? क्या अभी तक नाश्ता तैयार नहीं हुआ? मुझे देर हो रही है!" डाइनिंग टेबल पर अखबार के ऊपर से देखते हुए उन्होंने आगे कहा, "मेरे पास तुम्हारी तरह नाश्ते का इंतजार करने के लिए पूरा दिन नहीं है। अगर मैं बाहर जाकर न कमाऊँ, तो यह घर नहीं चलेगा!" यह एक ऐसा ताना था जिसे सुमन लगभग रोज सुनती थीं, फिर भी उन्होंने कभी शिकायत नहीं की और हमेशा मुस्कुराती रहीं। पर कौन जानता है कि वह अंदर से कितनी टूटी हुई महसूस करती थीं, और कितनी बार अकेले में रोई थीं! रूही ने भी यह सब सुना, लेकिन सुबह का माहौल खराब न हो, इसलिए इससे पहले कि रूही कुछ कहती, सुमन ने आँखों के इशारे से उसे चुप रहने को कहा। रूही ने अपने पिता को नाश्ता परोसा और बिना एक शब्द कहे चुपचाप कॉलेज चली गई। रूही का कॉलेज में बिल्कुल मन नहीं लगा, और वह पूरे समय बस अपनी माँ के बारे में सोचती रही। वह बार-बार याद करती रही कि कैसे वह खुद भी कभी-कभी अपनी माँ को केवल एक 'माँ' के रूप में देखती है—यह उम्मीद करती है कि वह कभी कोई गलती न करें, हर काम आसानी से पूरा करें—और वह यह पूरी तरह भूल जाती है कि माँ बनने से पहले वह 'सुमन' नाम की एक स्वतंत्र औरत हैं! वह यह भी सोचने लगी कि जब भी कुछ गलत होता है, तो उसके भाई भी अपने आप अपनी माँ को ही दोषी क्यों ठहराते हैं। रूही थोड़ी देर के लिए रुकी और विचार किया: क्या यह आदत उनके पिता को देखकर आई है, जो हमेशा हर छोटी-छोटी बात के लिए माँ को जिम्मेदार ठहराते थे जबकि हर सफलता का सारा श्रेय खुद लेते थे? जब रूही कॉलेज से घर आईं, तो सुमन की तबीयत कुछ ठीक नहीं थी। वह अपने कमरे में खांसते हुए पापा के कपड़ों पर आयरन कर रही थीं। रूही ने पास जाकर सुमन के सर पर हाथ रखा, तो सुमन बुखार से तप रही थीं। रूही ने झट से कपड़े लेकर रख दिए और माँ को बिस्तर पर लिटा दिया। कुछ दवा देकर माँ के पास बैठ गईं और हिदायत देते हुए बोलीं, "मम्मी, अब आप काम मत कीजिए, सब बड़े हो गए हैं, अपना काम खुद कर सकते हैं; आप बीमार नहीं पड़ेंगी।" सुमन ने रूही की चिंता पर मुस्कुराते हुए कहा, "मेरी फिक्र मत करो, मैंने दवा ले ली है और एक-दो घंटे में बेहतर महसूस करने लगूँगी। तुम्हें भी आराम करना चाहिए।" लेकिन जब दो-तीन घंटे में बुखार नहीं उतरा और सुमन की तबीयत और बिगड़ने लगी, तब सुमन को अस्पताल में भर्ती कराया गया। जाँच और रिपोर्ट के आने के बाद मालूम हुआ कि सुमन को टाइफाइड हो गया है, और डॉक्टर ने सुमन को कुछ दिन अस्पताल में ही भर्ती रखने की सलाह दी। जब सुमन के बिना सब घर आए, तो पहली बार सबको अहसास हुआ कि सुमन के बिना घर, सच में घर है ही नहीं! बेटे को अपने किसी काम के लिए अचानक माँ की आवाज सुनाई नहीं दे रही थी। पति को किसी भी गलती या गुस्से को ताने के रूप में सुनाने के लिए जिनकी पत्नी सुमन थीं, वह घर में नहीं थीं। और बेटी रूही—जैसे ना चाहते हुए भी सारी जिम्मेदारी उसके ऊपर आ गई थी। सब अपने-अपने काम में तो लगे थे और जिम्मेदारी भी पूरी कर रहे थे, लेकिन कोई भी घर के उस खालीपन को नहीं भर पा रहा था जो सुमन के ना होने से था। एक ऐसी खामोशी घर में छा गई थी कि सबके मन में यह सवाल उठने लगे—क्या कहीं वे खुद ही तो आज सुमन की इस हालत के जिम्मेदार नहीं हैं? जब सुमन आठ दिन के बाद अस्पताल से घर आईं, तो घर की चौखट पर बनी रंगोली को देखकर हल्का सा मुस्कुरा दीं और रूही की तरफ देखकर आँखों में ममता के आँसू छलक पड़े। रूही भी मुस्कुराते हुए और थोड़ा नाज से बोलीं, "मम्मी, रंगोली अच्छी बनी ना? मैंने बनाई है!" सुमन ने भी प्यार से उनके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, "हाँ, बहुत अच्छी है।" बेटा भी सुमन के लिए झट से फल लेकर आ गया और उनके पास बैठ गया। यह पहली बार था जब सुमन का बेटा खुद अपनी मर्जी से सुमन के पास बैठा हो। सुबह जब सब सो रहे थे, सुमन उठकर फिर अपने रोजमर्रा के काम में लग गईं। सुमन जब पति के लिए चाय लेकर आईं, तो सुमन के पति ने चाय का कप उठाते हुए थोड़ा झिझक कर पहली बार कहा, "तुम भी अपनी चाय ले आओ।" सुमन जैसे यह सुनकर वहीं थम गईं—जैसे इतने दिनों की तपस्या पूरी हो गई हो, और उनकी आँखें भर आईं! एक एहसास हम जाने-अनजाने में यह भूल जाते हैं कि माँ सिर्फ 'माँ' नहीं है; इससे पहले वह सिर्फ एक 'औरत' है जिसका अपना एक वजूद है, जो हमारी तरह गलती कर सकती है। लेकिन हम जाने-अनजाने में माँ, बीवी और बहू से यह उम्मीद करते हैं कि वह एक परफेक्ट इंसान बनें जो कभी कोई गलती ना करें, जिनका अपना कोई वजूद ना हो, और जो बस हमारे लिए ही जिएँ। ☆अनामकारा
अनकही खामोशी: एक पिता का अधूरापन "हम अक्सर अपने माता-पिता के 'प्यार न जताने' की शिकायत करते हैं। लेकिन क्या हमने कभी उस खामोशी को समझने की कोशिश की है जो एक पिता अपनी दिनचर्या और जिम्मेदारियों के शोर में छिपा लेता है? आज की यह कहानी एक ऐसे पिता की है, जो अपने परिवार के भविष्य के लिए अपनों से ही दूर हो गया। यह सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि उन लाखों पिताओं का आईना है जो बोल नहीं पाते, पर अपने हिस्से का हर पल अपनों के सुरक्षित भविष्य के लिए समर्पित कर देते हैं।" सुनील बरामदे में अखबार पर नज़रें गड़ाए बैठा था। आज उसकी तबीयत कुछ ठीक नहीं थी, लेकिन बरामदे में लगी घड़ी अपनी रफ्तार से टिक-टिक कर रही थी—मानो कह रही हो कि उसका काम पर जाने का वक्त हो गया है। सुनील ने एक नज़र घड़ी पर डाली, फिर पूरे घर में और अंत में घर के बाहर देखा, जहाँ से वह लोगों को रोज़मर्रा के जीवन-यापन के लिए भाग-दौड़ करते देख रहा था। वह सोच में पड़ गया कि कैसे लोग अपने परिवार को सुरक्षित करने के लिए बिना रुके और बिना थके काम करते हैं। तभी पीछे से बेटे ने आवाज़ दी और थोड़ा डरते हुए बोला, "पापा... आज ट्यूशन की फीस देनी है।" सुनील ने उसके चेहरे को गौर से देखा, जो थोड़ा डरा-सहमा लग रहा था। उसे देख सुनील सोचने लगा, "मैंने तो कभी इसे डांटा नहीं, हर ख्वाहिश पूरी की, फिर भी यह मुझसे इतना डरता है कि मन की एक छोटी सी बात कहने में भी हिचकिचाहट है।" बेटे ने फिर दबी आवाज़ में 'पापा' कहा। उस आवाज़ से सुनील अपनी सोच से बाहर आया और जेब से पैसे निकालकर उसे दे दिए। पैसे लेकर बेटा रसोई की तरफ भागा, जहाँ उसकी माँ काम में लगी थी। वह माँ का पल्लू पकड़कर एक पाँच साल के बच्चे की तरह मनुहार करने लगा। सुनील यह सब बरामदे की खिड़की से देखकर मुस्कुरा तो रहा था, लेकिन उसके मन में बेटे की वह हिचकिचाहट अब भी शोर मचा रही थी और उसके दिल पर चोट कर रही थी। वह बरामदे में लगी अपने परिवार की सुंदर तस्वीर को गौर से देखने लगा—जिसमें उसकी बेटी, पत्नी, बेटा और वह खुद था। वह सोचने लगा, आखिर क्या वजह रही होगी कि परिवार का सबसे ज़रूरी सदस्य होने के बावजूद वह सबसे दूर है? उसे याद आया कि जब बेटा एक-दो साल का था, तब वह अपनी माँ के साथ ज़्यादा वक्त बिताता था। सुनील उस समय बेटे को एक सुरक्षित भविष्य देने के लिए ऑफिस के ओवरटाइम में इतना व्यस्त था कि उसे समय ही नहीं दे पाया। जब बेटा पहली बार स्कूल गया, तब भी उसकी माँ ही उसके साथ गई थी। ऐसा नहीं है कि वह साथ जाना नहीं चाहता था, लेकिन उस दिन ऑफिस में एक बहुत ज़रूरी मीटिंग थी—जो सुनील के लिए इसलिए ज़रूरी थी क्योंकि उसी से वह अपने परिवार को एक बेहतर घर देने में मदद कर सकता था। सुनील को रह-रहकर अपना व्यस्त होना और परिवार से दूर जाना याद आने लगा, और उसकी आँखों से न चाहते हुए भी आँसू छलक पड़े। तभी किचन की खिड़की से पत्नी ने आवाज़ दी, "सुनिए जी, नाश्ता कर लीजिए, ऑफिस के लिए देर हो जाएगी और तैयार हो जाइए।" उसकी आवाज़ से सुनील अपने ख्यालों से बाहर आया। उसने भागती हुई घड़ी की तरफ देखकर एक गहरी ठंडी सांस ली और तैयार होने के लिए कमरे की तरफ बढ़ गया। एक एहसास हम भी कभी-कभी अपनों से बिना कहे और न चाहते हुए भी दूर हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि हमें उनसे कोई शिकायत है या वे हमारे लिए ज़रूरी नहीं हैं, फिर भी न चाहते हुए दोनों उस खामोशी को नहीं तोड़ पाते। आइए, एक कोशिश करते हैं उस खामोशी को धीरे-धीरे कम करने की… ☆अनामकार
घर का बड़ा बेटा आज घर में सब दुआओं में बैठे थे और बेसब्री से अमित के रिज़ल्ट का इंतज़ार कर रहे थे। इंतज़ार सिर्फ़ रिज़ल्ट का नहीं था—उम्मीदों का था, सपनों का था और अपने बोझ के थोड़ा कम हो जाने का था। पापा को इंतज़ार था कि अमित के रिज़ल्ट से उनके कंधों का थोड़ा बोझ कम हो जाएगा। माँ को इंतज़ार था कि वह सबसे कह सकेगी—उसका बेटा सरकारी अफसर बन गया। वहीं भाई-बहनों को इंतज़ार था कि अब वे बड़े शहर के अच्छे कॉलेज में पढ़ने जा सकेंगे। वहीं अमित अपने कमरे में लेटा छत को एकटक देख रहा था। घड़ी की टिक-टिक के साथ उसके दिल की धड़कन भी बढ़ती जा रही थी। बाहर से आती घरवालों की आवाज़ें जैसे उसकी बेचैनी और बढ़ा रही थीं। वह किसी गहरी सोच में डूबता जा रहा था। अगर आज रिज़ल्ट उसके हक़ में नहीं आया तो वह क्या करेगा? सबको क्या जवाब देगा? एक पल को उसकी साँस जैसे गले में ही अटक गई। माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूँदें तैर आईं। बड़ी मुश्किल से उसने खुद को संभाला, लेकिन मन की चाल पर भला किसका बस होता है। करवट बदलते ही एक और ख्याल उसके मन में आ गया। वह पापा का बोझ कैसे कम करेगा? माँ से कैसे नज़र मिलाएगा? छोटे भाई को पढ़ने के लिए बाहर भेजना है… और बहन की भी तो शादी की उम्र हो गई है। इन सबके बारे में सोचते हुए उसने एक लंबी साँस ली और आँखें बंद कर लीं। उसे याद आया, जब उसने बारहवीं में टॉप किया था, तब उसके पापा ने शर्मा अंकल से बड़े गर्व से कहा था— "अमित मेरा बोझ कम करेगा।" शर्मा अंकल भी मुस्कुराकर बोले थे— "अमित जैसा होनहार बेटा मिलना बड़ी किस्मत की बात है।" उन्हीं बातों को सोचते-सोचते न जाने कब उसकी आँख लग गई। कुछ देर बाद माँ ने कमरे के दरवाज़े पर दस्तक दी। उसके साथ पापा, भाई और बहन भी थे। माँ ने अमित को प्यार से जगाया, उसका माथा चूमा और उसे सीने से लगा लिया। अमित कुछ समझ पाता, उससे पहले पापा अपनी आँखों की नमी छिपाते हुए बोले— "मुझे तो पता था… हमारा बेटा हमारा नाम ज़रूर रोशन करेगा।" अमित का रिज़ल्ट आ चुका था। वह सरकारी अफसर बन गया था। अमित कुछ पल तक अचंभित होकर सबको देखता रहा। जब बहन ने उसे हिलाकर बधाई दी, तब जाकर जैसे उसे होश आया। वह उठकर माँ-पापा के पैर छूने लगा। अमित की जॉइनिंग हो गई। उसके दोस्तों ने शहर से काफी दूर पोस्टिंग ली थी, ताकि वे अपनी जिंदगी थोड़ा खुलकर जी सकें। मन तो अमित का भी था। दोस्तों की बातें सुनकर वह कुछ देर सोच में पड़ गया। लेकिन अगले ही पल उसके मन में उन खर्चों की उधेड़बुन शुरू हो गई, जो कभी उसके पापा किया करते थे। कौन देखेगा घर? माँ-पापा का खर्च कैसे चलेगा? भाई की पढ़ाई? बहन की शादी? चेहरे पर एक अनजानी-सी मुस्कान लिए अमित ने कहा— "मैं कुछ साल शहर के आसपास ही रहूँगा।" धीरे-धीरे अमित ने घर की सारी ज़िम्मेदारियाँ अपने ऊपर ले लीं। छोटे भाई का अच्छे कॉलेज में दाखिला करवाया। बहन के लिए अच्छा-सा घर देखकर धूमधाम से उसकी शादी की। इन सबके बीच जब कभी माँ अमित से उसकी शादी की बात करती तो वह हँसकर टाल देता— "अभी उम्र ही क्या है मेरी… कर लूँगा।" लेकिन अमित के मन में कुछ और था। वह पहले अपने छोटे भाई को अपने पैरों पर खड़ा करना चाहता था। एक रोज़ अमित अपने कमरे में कुछ कागज़ ढूँढ़ रहा था। किताबों के बीच से एक पुरानी बाइक की तस्वीर निकलकर नीचे गिर गई। वही बाइक, जिसे वह कभी खरीदना चाहता था। दोस्तों के साथ उसी बाइक पर घूमने और लंबी यात्राओं पर जाने के कितने सपने देखे थे उसने। तस्वीर को देखकर अमित के चेहरे पर हल्की-सी मुस्कान आई। उसने एक लंबी, ठंडी साँस ली। तभी पीछे से माँ की आवाज़ आई— "अमित…" माँ की आवाज़ सुनते ही अमित ने तस्वीर को वापस किताब के बीच रख दिया और कमरे से बाहर चला गया। अमित अपनी ज़िम्मेदारियों से खुश था। उसे सुकून मिलता था कि उसके कारण घर की कोई चिंता थोड़ी कम हो जाती है। उसने कभी किसी से शिकायत नहीं की। बस अपनी मुस्कान के पीछे अपनी थकान छिपाना सीख लिया था। एक शाम अमित ऑफिस से घर आया तो उसने अपनी बहन को देखा। मुस्कुराकर बोला— "गुड़िया, तुम कब आई?" बहन ने भाई के चेहरे की तरफ देखा। आज उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसका भाई कितना थक गया है। रात को खाना खाते समय अमित अपनी बहन के ससुराल का हाल-चाल पूछ रहा था। वह उसकी खुशियों और परेशानियों के बारे में जान लेना चाहता था। लेकिन बहन की नज़र बार-बार अपने भाई के चेहरे पर जा रही थी। उसे याद आने लगा— उसकी शादी में भाई ने कितनी मेहनत की थी। उसकी पसंद की हर चीज़ का ध्यान रखा था। माँ-पापा का कितना ख्याल रखता था। छोटे भाई का इतने बड़े शहर के अच्छे कॉलेज में दाखिला भी उसी ने करवाया था, जबकि पापा इतने खर्चे को लेकर परेशान थे। तब अमित ने ही पापा को समझाया था— "पापा, आप परेशान मत होइए… सब हो जाएगा।" बहन की आँखों में नमी उतर आई। उसने बहुत धीरे से पूछा— "भैया… आप शादी कब करेंगे?" अमित ने एक पल उसकी तरफ देखा। फिर खाने की प्लेट में नज़र झुकाकर बोला— "कर लेंगे गुढ़िया… बस कुछ काम और पूरे कर लूँ।" फिर मुस्कुराते हुए बोला— "तुम इतना मत सोचो… तुम खुश रहो।" अमित की बात सुनकर जैसे उसकी बहन की साँस कुछ पल के लिए रुक गई। खाने की मेज़ पर अचानक एक ख़ामोशी उतर आई। वह चुपचाप अपने भाई को देखती रही। उसकी निगाहें अमित के थके हुए चेहरे और आँखों के नीचे उभरी हल्की-सी कालिख पर टिक गईं। अमित ने उसकी तरफ देखा और हमेशा की तरह मुस्कुराकर पूछा— "क्या हुआ गुढ़िया?" वह कुछ नहीं बोली। बस उठी, उसके पास गई और हल्के से उसके कंधे पर हाथ रख दिया। अमित उसकी तरफ देखता रहा। वह कुछ कहे बिना वहाँ से चली गई। अमित ने भी ज्यादा ध्यान नहीं दिया। उसके लिए शायद यह भी रोज़ की तरह ही एक शाम थी। लेकिन बहन के लिए वह शाम पहले जैसी नहीं थी। उसे पहली बार महसूस हुआ कि जिस भाई से उसने हमेशा अपनी हर परेशानी बाँटी थी, उसने अपनी कोई परेशानी कभी किसी से बाँटी ही नहीं। वह सबके लिए खड़ा रहा और शायद इसी वजह से सबको लगा कि उसे किसी के सहारे की ज़रूरत नहीं। उस रात घर में सब सो गए। लेकिन बहन की आँखों में नींद नहीं थी। उसे बार-बार अमित का वही जवाब याद आ रहा था "कर लेंगे… बस कुछ काम और पूरे कर लूँ।" वह सोचती रही पता नहीं अमित की ज़िंदगी में अपने लिए जीने की बारी कब आएगी। और शायद पहली बार उसे यह समझ आया कि ज़िम्मेदारियाँ निभाते-निभाते इंसान हमेशा नहीं थकता, कभी-कभी वह बस थकने का हक़ खो देता है। ☆अनामकारा
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