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समाज में कई लोग यह समझते हैं कि अगर कोई इंसान बहुत कष्ट सह ले, अपमान सह ले और फिर भी चुप रहे, तो वह बहुत संस्कारी है। लेकिन सच्चाई यह है कि किसी को कष्ट देना और फिर उसकी सहनशीलता की तारीफ करना, यह इंसानियत नहीं है। किसी को दुख देकर हम कैसे खुश रह सकते हैं? अगर मैं ही किसी को कष्ट दूँ और फिर कहूँ कि “देखो, यह कितना संस्कारी है, सब सह लेता है”, तो यह संस्कार नहीं बल्कि अन्याय है। भगवान सब देखता है। जो इंसान दूसरों को कष्ट देता है, उसे अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है— चाहे देर से ही सही। इसलिए किसी पर निर्णय देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए। हो सकता है कि जिसकी हम आलोचना कर रहे हैं, उसकी परिस्थिति और दर्द हमें दिखाई ही न दे रहा हो। सच्चा संस्कार तो यह है कि हम किसी को दुख न दें, बल्कि उसकी स्थिति को समझने की कोशिश करें।
दिमाग… एक ऐसी प्रयोगशाला, जहाँ सिर्फ विचार नहीं, पूरी-पूरी दुनियाएँ जन्म लेती हैं। और जब यही दिमाग किसी लेखक का होता है, तो ये प्रयोगशाला और भी खास बन जाती है… लेखक का दिमाग कभी शांत नहीं रहता। वो हर पल कुछ सोचता है, कुछ गढ़ता है, कुछ महसूस करता है… कभी हँसी के दृश्य बनते हैं, कभी आँसुओं की कहानी, कभी एक मासूम किरदार जन्म लेता है, तो कभी एक दर्द भरी दास्तान। लेखक जब लिखने बैठता है, तो वो सिर्फ शब्द नहीं लिखता… वो अपने दिमाग की प्रयोगशाला में नए-नए प्रयोग करता है। सोचता है — आज कौन सा किरदार जन्म लेगा? कौन सी कहानी दिलों को छुएगी? क्या नया होगा, जो पहले कभी नहीं हुआ? कभी उसका दिमाग उसे आसमान तक ले जाता है, तो कभी धरती के सबसे गहरे दर्द तक… कभी वो कल्पना में उड़ता है, तो कभी हकीकत से लड़ता है। यही दिमाग की प्रयोगशाला है, जो मनगढ़ंत कहानियाँ भी बना सकती है, और सच्चाई को आईना भी दिखा सकती है। कभी यही दिमाग ओवरथिंकिंग में उलझ जाता है, पर यही उसकी ताकत भी है… क्योंकि जो ज्यादा सोचता है, वही कुछ नया रचता है। जैसे वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में नई खोज करता है, वैसे ही लेखक अपने दिमाग में नई दुनिया बना देता है। लेखक का दिमाग ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है… यहीं से शब्द जन्म लेते हैं, और शब्दों से कहानियाँ… और कहानियों से जुड़ती हैं भावनाएँ। यही प्रयोगशाला एक साधारण इंसान को “लेखक” बना देती है… और उसी लेखक के शब्द, किसी के दिल तक पहुँच जाते हैं। ✨
**“कुछ महीने पहले… मेरे बाल लगभग चले गए थे। आज छोटे-छोटे बाल वापस आए हैं… शायद किसी के लिए ये छोटी बात हो, पर मेरे लिए ये बहुत बड़ी जीत है। ❤️ हाँ, मेरा ट्रीटमेंट अभी भी चल रहा है… जैसे ही दवाई छोड़ती हूँ, वही परेशानी फिर लौट आती है— खुजली, बाल झड़ना, दर्द… डॉक्टर भी अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं, पर मैं हार नहीं मानी हूँ। महंगी दवाइयाँ भी चल रही हैं, और साथ में लोगों के ताने भी— पर अब मैंने सीख लिया है, दर्द से लड़ना… चुप रहकर भी मजबूत रहना। मेरे बाल अभी थोड़े-थोड़े हैं, टूटते भी हैं… लेकिन हर नया बाल मुझे ये याद दिलाता है— मैं हार नहीं रही, मैं ठीक हो रही हूँ। ✨ एक दिन सब ठीक होगा… और मैं फिर से मुस्कुराऊँगी, पूरे आत्मविश्वास के साथ।”** ❤️
मैंने कई जगह देखा है—चाहे कुछ घरेलू महिलाएँ हों या कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ— वे अक्सर उन महिलाओं को गलत समझ लेती हैं जो साफ-साफ और तर्क के साथ अपनी बात रखती हैं। अगर कोई महिला समझदारी से, स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कह दे, तो उसे जल्दी ही “बहुत बोलने वाली” या “बदतमीज़” कह दिया जाता है। जबकि सच्चाई यह है कि साफ और तर्क के साथ बात करना बदतमीज़ी नहीं, बल्कि समझदारी की निशानी है। कई बार लोग उस बात को समझ नहीं पाते जो उनकी सोच से अलग होती है, इसलिए वे उसे गलत नाम दे देते हैं। लेकिन सच यही है कि ज्ञान और समझ रखने वाला व्यक्ति अपनी बात स्पष्ट कहता है, और जो सुनने की आदत नहीं रखते, उन्हें वही बात बुरी लगती है। - archana
कौन कहता है चरित्र कॉपी नहीं होता, यहां लोग चेहरों के साथ किरदार भी बदल लेते हैं… बातों और व्यवहार की नकल करके, अच्छाई का दिखावा कर लेते हैं… इंस्टाग्राम की रीलों से सीखकर, संस्कारों का नकाब पहन लेते हैं… पर सच तो ये है — चेहरा बदल जाता है, पर दिल कभी कॉपी नहीं होता… 💔
इतिहास उठाकर देख लो— जितने भी महान लेखक, ज्ञानी, साधु-संत, ऋषि-मुनि, वीर योद्धा और राजा-महाराजा हुए हैं, सबने अपने जीवन में संघर्ष सहा है। उन्होंने समाज के लिए काम किया, आजादी के लिए लड़े, शिक्षा और ज्ञान के लिए अपना जीवन लगा दिया। लेकिन जब वे यह सब कर रहे थे, तब समाज ने उनका साथ कम दिया… उन पर आरोप लगाए, उनका मज़ाक उड़ाया, यहाँ तक कि कई बार पत्थर भी मारे। पर उन्होंने लोगों की बातों की चिंता नहीं की, वे अपने रास्ते पर चलते रहे। समय बीता… और वही लोग बाद में महान कहलाए, उनका नाम इतिहास में अमर हो गया। सच यही है— समाज अक्सर किसी को आगे बढ़ते देख पहले उसे गिराने की कोशिश करता है। आप चाहे कितने भी सकारात्मक क्यों न हों, कुछ लोग आपको गलत ही समझेंगे। संघर्ष में साथ देने के बजाय वे आलोचना और पत्थर ही बरसाएंगे। लेकिन यही दुनिया का नियम है— जो पत्थरों से डर गया, वह रास्ता नहीं बना पाया। और जिसने पत्थरों को सह लिया, वही इतिहास बना गया।
अगर इंसान कमाने लायक न रहे, किसी के काम का न रहे, और शरीर भी साथ छोड़ दे… तो दुनिया ही नहीं, कई बार अपने भी ठुकरा देते हैं। यह किसी किताब की बात नहीं, यह मेरे जीवन का अनुभव है।
हम बुरे नहीं थे, बुरे बनाए गए थे। बस पारदर्शी जाल बिछाकर फँसाए गए थे।
घर में भंडारा हुआ था। सबने प्रसाद खा लिया, लेकिन सास के लिए प्रसाद खत्म हो गया। छोटी बहू बोली — “माँजी, मेरा तो झूठा हो गया है, मैं नहीं दे सकती… नहीं तो मुझे नरक मिलेगा।” सास बोली — “मुझे तो बहुत भूख लगी है, झूठा ही दे दो।” तभी बड़ी बहू ने अपनी थाली देखी। उसने तो बस एक कौर ही खाया था। एक पल को उसने सोचा — “अगर मैं झूठा दूंगी तो शायद नरक मिलेगा…” लेकिन अगले ही पल उसके मन ने कहा — “मैं खुद खा लूं और मेरी सास भूखी रह जाए, इससे बड़ा पाप क्या होगा?” और उसने चुपचाप पूरी थाली सास के आगे रख दी। ✨ सीख: भगवान नियमों से नहीं, दिल की सच्चाई से खुश होते हैं।
पति बोला — “घर टूटने की वजह पत्नी ही होती है!” पत्नी मुस्कुराकर बोली — “क्या तुमने मधुमक्खी का छत्ता देखा है?” “मधुमक्खी तब तक नहीं काटती जब तक कोई उसके छत्ते को छेड़े नहीं। लेकिन जैसे ही कोई उसका छत्ता गिराने की कोशिश करता है, वह अपने घर को बचाने के लिए काटने के लिए पीछे पड़ जाती है “ठीक वैसे ही पत्नी भी होती है… वह झगड़ा घर तोड़ने के लिए नहीं करती, बल्कि अपने घर बसाने के लिए लड़ती है।” ✨ इसलिए पत्नी को दोष देने से पहले यह समझो कि वह लड़ क्यों रही है।
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