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मैंने भी कुछ लोगों को अपना समझा था… जो साथ हँसते थे, साथ खाते थे, और पीठ पीछे साजिश रचते थे। पहले मैं टूट जाती थी… अब मुस्कुरा कर कलम उठाती हूँ ✍️ क्योंकि अब ऐसे लोग मेरी कमज़ोरी नहीं, मेरी कहानियों के सबसे दमदार किरदार हैं। 😌🔥 - archana
हे वीणावादिनी माँ सरस्वती, करुणा बरसाना, ज्ञान देना ऐसा कि मन में न आए अभिमान। भक्ति करूँ तो विनय रहे, न रहे मन में घमंड, तेरे चरणों में झुका रहे मेरा हर एक भाव, हर एक संकल्प। देना मुझे ऐसी सद्बुद्धि, जो राह दिखाती जाए, हर्ष में भी संयम रहे, दुख में भी धैर्य समाए। मन न भटके, बुद्धि न डोले, सत्य से न हो दूर, तेरी कृपा से हर पल मेरा जीवन हो भरपूर। गलत रास्तों पर बढ़ते कदम थाम लेना माँ, अँधियारे में डगमगाऊँ तो बन जाना मेरी लौ माँ। हाथ पकड़ कर चलाना मुझे धर्म की डगर पर, रखना सदा अपने आँचल की शीतल छाया भर। तू ही मेरी वरदानिनी, तू ही मेरी पुकार, न मुझसे किसी का अहित हो, न मन में आए विकार। ऐसी कृपा करना माँ, रहे सबका कल्याण, तेरे नाम में ही बस जाए मेरा तन-मन-प्राण।
अब ठान लिया है कुछ करके दिखाना है, जो हँसते थे नाम पर, उनका गुरूर मिटाना है। हे ईश्वर, बस इतनी सी दुआ है मेरी, हर मोड़ पर मेरा हाथ थामे रखना। जब हौसले डगमगाएँ, मुझे थाम लेना, जब रास्ते अंधेरे हों, खुद रौशनी बन जाना। मेहनत मेरी हो, भरोसा तुझ पर रहे, हार भी आए तो सीख बनकर जाए। और एक दिन मेरी चुप साधना को, सफलता की सबसे ऊँची आवाज़ मिल जाए। 🙏✨ - archana
दुनिया को बताऊँ तो तमाशा बन जाएगा, अपनों को कहूँ तो घर उजड़ जाएगा… इसलिए दर्द को स्याही बना लिया मैंने, और काग़ज़ को अपना सबसे करीबी बना लिया। रो कर लिख देती हूँ अपने मन की हर बात, क्योंकि सुनने वाला कोई होता तो कलम चुप रहती… मन हल्का हो जाता है काग़ज़ से बात करके, इतनी-सी तसल्ली भी आजकल बहुत होती है जीने के लिए।
कह दिया उसने – कब तक इलाज कराऊँगा, काश कोई पूछे… ये बीमारी क्या मैंने खुद लिखी है अपनी किस्मत में कहीं? इलाज मजबूरी है, कोई शौक नहीं मेरा, तानों में दबकर भी जीना पड़ता है हर रोज़ सवेरा। लाचार हूँ इसलिए हाथ फैलाना पड़ता है, वरना किसी को भीख बनकर जीना अच्छा नहीं लगता है।
मुझे समझ नहीं आता… हर बार बदनाम सिर्फ बहू ही क्यों होती है? अगर बहू जवाब दे दे, तो कहा जाता है – बदतमीज़ है, ज़ुबान चलाती है, सेवा नहीं करती। लेकिन कोई ये नहीं सोचता कि एक अकेली लड़की पूरे ससुराल को कैसे परेशान कर सकती है? वो तो पढ़-लिख कर, अपना घर छोड़कर, सिर्फ एक नया घर बसाने आती है… किसी को तोड़ने नहीं। क्या वो अकेली इतनी ताक़तवर होती है कि सबको बिगाड़ दे? या फिर सच ये है कि जब हद से ज़्यादा दबाया जाता है, तो खामोशी टूट जाती है… और उसी टूटन को “बदतमीज़ी” का नाम दे दिया जाता है। - archana
कलयुग में कहा जाता है कि राक्षस बाहर नहीं होंगे, वे इंसान के भीतर जन्म लेंगे। मन में बैठा राक्षस ही सबसे बड़ा शत्रु होगा, वही अधर्म बनेगा, वही अत्याचार करेगा। और युद्ध भी होगा… पर तलवारों से नहीं, सच्चे लोगों के चरित्र से। जो भगवान की भक्ति करेंगे, सत्य के रास्ते चलेंगे, उन्हीं को सबसे पहले निशाना बनाया जाएगा। क्योंकि कलयुग में बुराई की पहचान चेहरे से नहीं, सोच से होती है। - archana
अगर मेरी मृत्यु के अंतिम क्षणों में मुझसे कोई इच्छा पूछी जाए… तो बस इतना कहना चाहूँगी — हे ईश्वर, अब मुझे इस धरती पर दोबारा मत भेजना। - archana
उसने बड़े आसानी से कह दिया – कल मरो तो आज मर जाओ, और अच्छा है… जल्दी मर जाओ। आज मेरी आख़िरी उम्मीद भी टूट गई, अब मन नहीं करता कुछ लिखने का… क्योंकि अब भीतर कुछ बचा ही नहीं। जिसे अपना सब कुछ माना था, उसी के आख़िरी शब्द ज़हर बन गए। अब क्या रखूँ उम्मीद… जब सांसों की कीमत उसी की नज़रों में शून्य हो गई।
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