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बेटी का परायापन और नया सफर शादी करके एक दिन सबको अपने घर जाना है, बेटियां तो होती ही पराई हैं, कहता सारा जमाना है। बचपन से जिसको हंस-खेल कर पाला-पोसा, वक्त का यह दस्तूर उसी को दूर कर जाता है। ये कैसा रिवाज है इस जालिम दुनिया का, जो अपनी ही जिगर के टुकड़े को पराया कर जाता है। अपना हंसता-खेलता आंगन और बचपन के ठिकाने छोड़, वह नन्हीं कली चुपचाप विदा हो जाती है। दूसरों के घर जाकर अपनी खुशियों की महक से, वह पराये आंगनों को भी अपना बना लेती है। नये घर की चौखट पर रखकर अपने कदम, वह अनगिनत नए रिश्तों की डोर को थामती है। कभी खुद ढल जाती है उस नए माहौल के रंग में, तो कभी अपनों के दिलों में अपनी जगह बनाती है।
मेरी मां का आँचल मेरी माँ का आँचल ऐसा था, जैसे तपती धूप में बादल का साया हो, उसके साए में हर दर्द भुलाया हो। हर हाल में मुझको वो खुश रखा करती थी, मेरी हर खुशी के खातिर जिया करती थी, रहुँ सलामत दुनिया में हमेशा हँसती-खेलती, बस यही दुआ वो दिन-रात किया करती थी। जिसके पास रहकर मैंने कभी परवाह न की, कभी उसकी ममता की कीमत समझी न थी, आज जब हूँ दूर उससे, उसकी हर बात सताती है, हाँ, सच कहती हूँ—मुझे मेरी माँ की याद बहुत आती है। वो बीते हुए दिन जब याद आते हैं, तो रोते हुए चेहरों पर भी मुस्कान ले आते हैं, हाँ, मुझको मेरी माँ की याद बहुत सताती है। छोटी-छोटी बातों पर उससे रोज़ लड़ा करती थी मैं, गुस्से में अक्सर नादानी से यह कहा करती थी मैं— "देखना, एक दिन मैं बहुत दूर चली जाऊँगी," फिर कभी लौटकर तुम्हारे पास न आऊँगी। आज अपनी उन बचकानी भूलों को जब याद करती हूँ, तो खुद पर ही मुझे बहुत हँसी आती है, पर साथ ही दिल में एक टीस सी उठ जाती है। हाँ, यह बिलकुल सच है, इसमें कोई शक नहीं— कि आज भी मुझको मेरी माँ की याद सताती है, उसकी वो अनमोल ममता बहुत रुलाती है।
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