Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(2.6m)

मैं और मेरे अह्सास
घनघोर
आकाश में घनघोर बादल छाए हुए हैं l
कड़ी धूप में कहां घुम के आए हुए हैं ll

कहां से आए है और कहां होगी बारिश l
साथ अपने घेरा अंधकार लाए हुए हैं ll

कहीं ये सैलाब सबकुछ बहा ना ले l
सब के दिलों में तूफान पाए हुए हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
रिमझिम
रिमझिम बारिश की बूंदें बहका रही हैं l
धीरे धीरे मन का मयूर चहका रही हैं ll

मिट्टी की सौगी खुशबु से चारो ओर l
बहकती फ़िज़ाओं को महका रही हैं ll

झम-झम-झम-झम पानी बरसे ओ l
जल के बादलो को लहका रही हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
आँखों
आँखों के इशारों से दिल का हाल सुना दिया हैं l
आज नीची नजर करके राज को छुपा दिया हैं ll

किसीके जाने से दुनिया नहीं रुकती स्वीकार कर l
दर्दों गम को भुलाकर हौसला दिखा दिया हैं ll

जिंदगी आगे बढने का नाम है बस यहीं सोच l
दिलों दिमाग से नाम पता सबकुछ मिटा दिया हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
बरसात का मौसम
बरसात का मौसम बड़ा सुहाना लगता हैं l
भीगने भिगोने के बाद वो रुहाना लगता हैं ll

तमन्ना और अरमानो को ओर जवान कर l
धीरे धीरे से भी रिमझिम सुनाता लगता हैं ll

आज शर्माते हुए सिमटने और लिपटने को l
खामोशी से गुफ़्तगू करने पुकारा लगता हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
जेहन में हौसलों ने अंगड़ाई ली हैं l
आँखों ने जीभर के खूबसूरती पी हैं ll

बहारों में रंगत छाई हुई है और l
मौसम आज दुल्हन सी सजी हैं ll

खुशियों को चार हाथ से लुटा है l
एक उम्र अपनी मर्जी से जी हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
रक्षाबंधन
रक्षाबंधन का पवित्र त्योहार है l
भाई बहन का प्यारा बंधन हैं ll

बहन माँ की परछाई होती हैं l
सब के दिल में प्यार बोती हैं ll

अपने अपनों की ख़ातिर वो l
चैन और सुकून भी खोती हैं ll

पूरा घर संभालने की झंझट में l
आराम से कहा वो सोती हैं ll

ईस्वर से प्रार्थना करते समय l
भाई की खुशी के लिए रोती हैं ll

माँ बाप भाई बहन की दुलारी l
घर का वो अनमोल मोती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
नए दौर का भारत
नए दौर का भारत बहुत आगे निकल चुका हैं l
टेक्नोलॉजी और विकास से छलक चुका हैं ll

अब अपनी चलती डगर से रुकेगा नहीं वो l
सोशियल मीडिया आने से बदल चुका हैं ll

विकास की क्रांति के साथ दिलों को जोड़कर l
आज नये युग मे नया भारत सभल चुका हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
मिलना बिछड़ना तो लगा रहता है l
बिखरे हो तब हौसला दिलाती हैं ll

खामोशी को बुलंद करके देख कर l
शोर को मौन शाद से सिलाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
यादें बचपन की
यादें बचपन की जिन्दगी का ख़ज़ाना हैं l
यादों के सहारे सफ़र को सजाना हैं ll

हर उम्र की एक दास्तान होती है तो l
वो भी ज़माना था ये भी ज़माना हैं ll

अल्लडपन नटखट शरारत याद कर l
खुश रहने का अच्छा सा बहाना हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
शोर
खामोशी भीतर बहुत शोर मचाती हैं l
अंदर से झिंझोड़कर वो हिलाती हैं ll

दर्द में डूबे हुए दिलों दिमाग को l
नशीली यादों का जाम पिलाती हैं ll

तन्हाई में जब अकेले हो तब तो l
पुरानी गलीयों से फ़िर मिलाती हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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