Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

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(2.9m)

मैं और मेरे अह्सास

त्याग और समर्पण
त्याग और समर्पण भीतरी घटना हैं l
खुद के अंदर चैन ओ सुकून भरना हैं ll

बलिदान का भाव, गहरा हृदय रखो l
मुकम्मिल प्रेम की राहों में चलना हैं ll

प्रारब्ध सोने चांदी जैसे चमकेगा तो l
यही अच्छे सच्चे व्यक्ति का गहना हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

कब्र से लिपटकर रोने से क्या फ़ायदा l
सखी गले से लगाने में बहुत देर लगी ll

अभी पूरी तरह से मिले भी न थे के बिछड़ गये l
सखी मिलना बिछड़ना हमारा भी अज़ीब था ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जीने के मायने
अजनबी हमराही जीने के मायने सिखा गया l
मंजिल तक पहुंचने के सहीं रास्ते दिखा गया ll

जिंदगी किस तरफ जीते हैं वो बताकर के l
चार लम्हें हसी खुशी के साथ बिता गया ll

मुस्कराकर आगे बढ़ने का नाम ही जीवन l
ताउम्र पाया हुआ तजुर्बा वो लिखा गया ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

बस एक बार
बस एक बार वादा निभाने आ जाओ l
दो पल के लिए दिल सजाने आ जाओ ll

शमों हया के सभी पर्दों को चीरकर l
तन मन में मुकम्मल समाने आ जाओ ll

चारागर बनके लफ्जों की दवा लाना कि l
सोये हुए अरमान जगाने आ जाओ ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

अपनी मंजिल
हौसलों के साथ अपनी मंजिल की और आगे बढ़ना चाहिए l
ख़ुद के विकास की सीढ़ी को एक के बाद एक चढ़ना चाहिए ll

अपनी मंज़िल को पाने की चाहत में भटक ना जाओ तो l
मंजिल की और जाने वाला रास्ता अच्छी तरह पढ़ना चाहिए ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

मन की शांति
मन की शांति को भीतर तलाश कर l
अन्तरात्मा को चैन ओ सुकू से भर ll

अपनेआप को जगाकर धीरे धीरे ही l
शांति के लिए करना पड़ता है सफ़र ll

जिंदगी शांति से जीने के वास्ते भी l
बहुत ही ज्यादा होनी चाहिए तरस ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

खुद के पास ख़ुद का ताजमहल होना बहुत जरूरी है l
इस क़ायनात में अब एसी मोहब्बत
नहीं रही हैं l

सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

वक़्त भी ठहर जाता हैं
यार दोस्तों की मजलिस में वक़्त भी ठहर जाता हैं l
दिल एक अजीब सा चैन और सुकून को पाता हैं ll

भागती दौड़ती दुनिया की रफ़्तार से थक कर यहां l
जो आता दो पल के हसीं मज़ाक के लिए आता हैं ll
सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

एक नजर देखने की ख्वाहिश है तो हैं l
आज मोहब्बत की आजमाइश है तो हैं ll

बार बार चहेरा देखने की ख्वाहिश ना किया करो l
ज़माने के लोगों की नजरों से भी जरा बिया
करो ll

सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

ख्वाहिशें
ख्वाहिशों से बाहिर निकलना चाहता हूँ l
खुली हवा में साँस लेने निकलना चाहता हूँ ll

क्या रखा है बड़ी ख्वाहिशों में इस लिए l
मुकम्मल खुद को ही बदलना चाहता हूँ ll

कल को अफसोस न रहे जाए टूटने का l
मोमबत्ती की तरह पिघलना चाहता हूँ ll

सखी
डॉ दर्शिता बाबूभाई शाह

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