Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(1m)

मैं और मेरे अह्सास

ख़्वाब
आज ख़्वाब ने दिल्लगी कर ली l
उसने अजनबी से दोस्ती कर ली ll

महफिल में जाने को मना था कि l
निगाहों से बहुत दूर गली कर ली ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

तसव्वुर
प्यारा सा तसव्वुर ख्यालों में उठता हैं l
चल खड़ा हो सपनें पूरे कर कहता हैं ll

उसने मुड़कर एक बार देखा भी नहीं l
जिस पर रोज दिल दिन रात मरता हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

बेइंतिहा और बेपनाह प्यार की जकड़ में l
दो पल दूर रहकर सब्र-आज़मा चाहता हूँ ll

बात मानो मेरी सम्भाले न संभलेगा दिल l
क्यूँ फ़िर भी आमना सामना चाहता हूँ?

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
माघ
माघ के मौसम में अरमान खिलते हैं गुलाबों की तरह l
यही गुलाब संभाले रखेंगे ताउम्र ख़्वाबों की तरह ll

मौसम, ठंड और धुंध से भरी खुशनुमा ये हवा l
कुहासे में लिपटे सूर्य की किरणें हिजाबों की तरह ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
संकल्प
सब से हट कर लेना संकल्प वो अनोखा भी चाहिए l
आसानी से मुकम्मल पूरा कर सके ऐसा भी
चाहिए ll
अकेले में गले से लगाने से कोई नई बात नहीं है कि l
सरे महफिल में हाथ थामने को कलेजा भी
चाहिए ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

नूतन
नूतन शहर नई उम्मीदों लेकर आई हैं l
दिल ने चैन औ सुकून की साँस पाई हैं ll

नया सवेरा नया उजाला साथ साथ l
हर तरफ़ आशाओं की किरनें छाई हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
अवसान
साल २०२५ अवसान हुआ तभी २०२६ का आगमन होगा l
क़ायनात का चक्र चलता ही रहता है यहीं
आदतन होगा ll

दुनिया उसूल है जो दिखता है वहीं बिकता
है इस लिए l
जो बड़े लोग करेंगे उसीका छोटे लोगों से
आचरण होगा ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

कोहरा
दिल में यादों का कोहरा छाया हैं l
तबसे दिल ने सुकून ना पाया हैं ll

गम के घने बादलों घेर कर वो l
साथ अपने अश्कों को लाया हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

सर्दियों में धूप
सर्दियों में धूप के ज़्यादा उजाले न रहेंगे l
गर्दिश में वाईज के हाथ में पियाले न रहेंगे ll

शहर भर चाहे जितनी भी रोशनी कर लो l
देर तलक उजियारे देखने वाले न रहेंगे ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

तन्हाई
तन्हाई से शिकायत है तो मर क्यूँ नहीं जाते l
इतने ही थक गये हों तो गुज़र क्यूँ नहीं जाते ll

किसे घबराते हो और किस बात का है डर l
नजरों से उतरे दिल से उतर क्यूँ नहीं जाते ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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