Quotes by Dr Darshita Babubhai Shah in Bitesapp read free

Dr Darshita Babubhai Shah

Dr Darshita Babubhai Shah Matrubharti Verified

@dbshah2001yahoo.com
(1.7m)

मैं और मेरे अह्सास
हादसों
पढ़ सको तो पढ़ो एहसास लिखा हैं l
सुख और दु:ख पास पास लिखा हैं ll

मुकम्मल जिंदगी को उतारा उस में l
दुनिया को लगे उपन्यास लिखा हैं ll

सामने था दूर तक फेला समन्दर l
जलजलों के साथ प्यास लिखा हैं ll

घोसलें वीरान कर गया परिंदा सा l
प्यार के दुश्मन को खास लिखा हैं ll

घर छोड़ा अब कोई खौफ़ नहीं है l
हादसों की ज़र्द पे हास लिखा हैं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास
वाइज
आज वाइज सुराही लिए बैठा हैं l
भरी महफिल जाम पिए बैठा हैं ll

रस्मों रिवाज की ओर जाते हुए l
सारे दरवाजे बंध किए बैठा हैं ll

ताउम्र तो रफ़ू कर नहीं सकते है l
जिंदगी का लबादा सिए बैठा हैं ll

क्या हुआ जो बेपरवाही से वो l
खुद की मरज़ी से जिए बैठा हैं ll

बेफिक्र बेदर्दी इंसान से सखी l
मोहब्बत अपनी दिए बैठा हैं ll
८-४-२०२६
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

दुनियादारी
दुनिया की धरेड से निकलना चाह्ता हूँ l
और ख़ुद ही खुद ही में ढलना चाह्ता हूँ ll

किसी ओर को बदलने से बहेतर है कि l
सब से पहले खुद को बदलना चाहता हूँ ll

जहाँ में इंसान मुखौटा पहने घूमता है तो l
दूसरों से पहले खुद समझना चाहता हूँ ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

दुनियादारी
चाहता हूँ दुनिया की सभी रस्में तोड़ दूँ l
मंज़िल की राह ईश्वर की गली में मोड़ दूँ ll

रीति रिवाज के नाम पर कलंक है सब l
दुनियादारी के ढकोसलों को फोड़ दूँ ll

कोई छोटा कोई बड़ा सिर्फ इन्सां बने l
और दिलों से दिलों का रिश्ता जोड़ दूँ ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

मोहब्बत
मोहब्बत का असर हो रहा हैं l
दिवाना घर से बेघर हो रहा हैं ll

आरज़ूएं हद से बढ़ती रहने से l
यूही बेबाक सजन हो रहा हैं ll

आज रूपरेखा के अनुसार ही l
उम्मीद पर सफर हो रहा हैं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

निशाँ
कोशिशों के बाद भी हम ना छुपा पाये निशाँ ll
सिर्फ पानी की लकीरें थी हमारी राजदां ll

आँखों के रास्तों से निकले ओ पहुँचे दिल तलक l
भावनाओ का युगों से दूर फेला कहकशाँ ll

रोनके होती दिखावे की भरोसा मत करो l
बेतुकी सी राज ना आई मुझे रंगीनियाँ ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

संगदिल
में कहां कभी किसीका एहसान रखता हूँ l
बात सीधी लगती है पर सच्ची कहता हूँ ll

बेपनाह बेहिसाब इश्क़ हो गया कब से l
संगदिल सनम से मोहब्बत करता हूँ ll

में एक तरफ़ा प्यार युगों युगों करके l
रोज सुबह शाम ठंडी आहे भरता हूँ ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जिंदगी
जिंदगी के राज बोले क्या l
पटारा दिल का खोले क्या ll

थोड़ी सी खुशी के लिए l
आस्तीन को छोले क्या ll

कहो तो तुम्हारी खुशी को l
पूराने जख्मों फोले क्या ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

जिंदगी
जिंदगी की अहमियत को समझा ही नहीं l
गहराईयाँ औ बारीकी को जाना ही नहीं ll

सहरा में रेत फ़िसलती वैसे ही जिंदगी गई l
रात दिन वक्त का हिसाब पहचाना ही नहीं ll

कुछ अपनी कुछ अपनों के लिए गुजरी कि l
प्यार को नशीले लम्हों से सजाया ही नहीं ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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मैं और मेरे अह्सास

प्यार
सीतमगर से प्यार किया l
दिल को यू बेकरार किया ll

नया बहाना सुनाता फिर भी l
हर बात पे एतबार किया ll

झूठी उम्मीदे दे संगदिल ने l
अश्क़ देके खुशगवार किया ll

"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह

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