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हे प्रभु कैसी है ये दुनिया बनाई मुझे तो समझ ना आई क्या सही क्या बुरा सब कुछ तुमने ही रचाया एक बीज से कैसे पौधा बनता इंद्रधनुष आकाश में कैसे बनता कहीं धरती मिलती आकाश से कहीं नदियां मिलती समन्दर से कहीं ऊँची-ऊँची इमारतें कहीं टेढ़े-मेढ़े रास्ते जितना मैं सोचूं, उतना ही उलझूं कैसी ये रीत, कैसी परम्परा अंत में सब राख हो जाना है यही रह जायेगी सब माया साथ नहीं कुछ जाना है जीवन है क्षणिक बुलबुला जल का कब फूट जाय किसने जाना है पांच तत्व जल, भू, अग्नि, वायु, आकाश प्राण है कहाँ, कहाँ चले जायेंगे तेरा-मेरा, जीवन का सब फेरा आए कितने और कितने सिकन्दर जायेंगे ये दुनिया एक छलावा है जान ले खुद को समय से पहले आयेगा तेरा भी कल बुलावा है न आदि है न अंत है सब शून्य है, शून्य में ही यही सृष्टि है एक चक्र है ये जीवन, दर्शन उसकी दृष्टि है मैं कौन हूँ क्या है मेरा ध्येय ले लो शरण मुझे अब अपनी नहीं समझना मुझे कुछ भी, शेष न रहे अब कुछ ज्ञान तेरे दर्शन की प्यास है अब तेरी ही आस है परब्रह्म परमेश्वर तू मेरा विश्वास है हे प्रभु आपको वंदन बारम्बार है। ।। जय महाकाल ।। डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
बालकनी हर घर में होती है बालकनी एक ऐसी जगह जहाँ से खुलती है विचारों की खिड़की दिखाई देता है सारा आसमां मिलते हैं मेरे सपनों को पंख बीतपाने आती है एक नन्ही चिड़िया दूर पेड़ पर करतब दिखाती नन्ही गिलहरी एक ऐसी जगह जहाँ अक्सर आती हैं महिलाएं अपने केश संवारने युवा अपने फ़ोन पर बीतपाने बुजुर्ग अपनी पोतों के किस्से सुनाने बच्चे आते हैं नयी दुनिया को समझने कुछ सामान बाहर फेंकते हैं कुछ अन्दर तोड़फोड़ करते हैं बालकनी से झाँक - झाँक कर राहगीरों को आवाज़ लगाते हैं कभी बन्दर, कभी चिड़िया जीत - जीत चिल्लाते हैं एक ऐसी जगह जहाँ छिपाते हैं कुछ अपने आंसू मिटाते हैं कुछ अपनी उदासी जलाते हैं कुछ अपना क्रोध जब शांत हो जाता है मन हल्का सा मुस्काते हैं और बीतपाते हैं एक कप काफी लेकर बीतपाती हैं साथ उनके बालकनी - - - || =============.... डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
धरती सी सहनशील माँ है पिता आकाश से भी ऊँचे मन तो पिता का भी करता है खेलूँ अपने बच्चे के साथ करूँ कुछ मस्ती ,कुछ पागलपन सिखाऊं कुछ नया साथ रहकर मारकर अपने मन को वो भविष्यसृष्टा पिता जाता है अपने काम पर खटता है रात -दिन ,सुनता है बॉस की बीमारी में भी करता काम कभी बयां न किया अपना दर्द किसी के आगे ,रहता मजबूत अपने परिवार के आगे. खटता है रात -दिन ,सुनता है बॉस की बीमारी में भी करता काम कभी बयां न किया अपना दर्द किसी के आगे ,रहता मजबूत अपने परिवार के आगे थका -हारा घर जब वो लोटे देख संतान को सोता चैन से भूल जाता सारे गम ,सारी चिंता करने पूर्ण बच्चों के सपने ,इच्छाएं करता है तमाम कोशिशें दुनिया ने पत्थर दिल कह तो दिया पिता को पर सूखे आंसू ,दबे जज्बात ना देखे पूरी ज़िंदगी संघर्ष में हवन कर दी जिसने उस पिता को शत -शत प्रणाम डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
मायके की गलियां आज बस यूं एक ख्याल आया मैं हूँ अपनी माँ की परछाई वो ममता भरा साया ससुराल हो भले ही कितना प्यारा अवचेतन मन में महकता हमेशा बचपन प्यारा वो मायके की गलियां, वो शरारतें साँझ होते ही लग जाती थीं छत पर बैठक पापा सुनाते हमें अपने संघर्ष के किस्से पर नटखट बचपन आया हमारे हिस्से लड़की चाहे बूढ़िया भी हो जाए मायके की याद ना दिल से जाए क्योंकि वहाँ वो पापा की राजकुमारी थी भाइयों की दुलारी थी, जिद्दी थी बेफिक्र हँसती थी, नये ख्वाब बुनती थी ना कोई जिम्मेदारी थी, बस पढ़ना ही एक लाचारी थी सभी के लिए मायका होता है सुहाना सपना चाहे बाद में कोई प्यार न करे अपना एक उम्र के बाद बस यादें रह जाती हैं मायका शब्द सुनते ही, अधरों पर मुस्कान आती है डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi
हरयाली तीज सावन का महीना ,बारिश की फुहार सखियों का संग ,ठंडी ठंडी चले बयार वो अमिया की डाली में पड़े झूले वो लोकगीतों की नटखट मस्ती घेवर की महक ,गुझियों का स्वाद वो मेहँदी भरे हाथ ,वो सोलह श्रृंगार हरी चूड़ियों की खन खन पायलिया की छन छन ,उस पर पीहर में बरसता बाबुल का प्यार कुछ ऐसा था बरसो पहले हमारा प्यारा तीज का त्यौहार वक़्त ने ली ऐसी अंगराई कैसी चली हाय पुरवाई ये कहाँ आ गए हम ना सखियों का संग ना अमिया के झूलेइस आधुनिकता ने तो सारे सुख हमसे छीने माई तेरा आँगन बहुत याद आता है बाबुल तेरा दुलार बहुत याद आता है वो मायके की नटखट तीज याद आती है सखियों का चिड़ाना ,हरियाली गाना ज़िंदगी की दौड़ में छूट गया बहुत कुछ पीछे ----वो बरसात ,वो सावन माँ तेरा आंचल बहुत याद आता है ---डॉ वंदना शर्मा
हरयाली तीज हरयाली तीज सावन का महीना ,बारिश की फुहार सखियों का संग ,ठंडी ठंडी चले बयार वो अमिया की डाली में पड़े झूले वो लोकगीतों की नटखट मस्ती घेवर की महक ,गुझियों का स्वाद वो मेहँदी भरे हाथ ,वो सोलह श्रृंगार हरी चूड़ियों की खन खन पायलिया की छन छन ,उस पर पीहर में बरसता बाबुल का प्यार कुछ ऐसा था बरसो पहले हमारा प्यारा तीज का त्यौहार वक़्त ने ली ऐसी अंगराई कैसी चली हाय पुरवाई ये कहाँ आ गए हम ना सखियों का संग ना अमिया के झूलेइस आधुनिकता ने तो सारे सुख हमसे छीने माई तेरा आँगन बहुत याद आता है बाबुल तेरा दुलार बहुत याद आता है वो मायके की नटखट तीज याद आती है सखियों का चिड़ाना ,हरियाली गाना ज़िंदगी की दौड़ में छूट गया बहुत कुछ पीछे ----वो बरसात ,वो सावन माँ तेरा आंचल बहुत याद आता है ---डॉ वंदना शर्मा
ए जिंदगी कुछ तो बता अपना पता ,रहती है तू कहाँ कलियों में ,फूलों में बारिश की बूंदों में अपनों की आँखों में सपनो की चाहों में ढूँढू तुझे मैं कहाँ #drvandnasharma
यूँ ही फिसलती जा रही ज़िंदगी हाथों से और हम ख्वाब देखते रहे जलजला विचारों का आकर चला गया और हम गुबार देखते रहे वो आये और आकर चले भी गए और हम उनकी राह देखते रहे उम्मीदों का सूरज निकलेगा कभी तो और हम यूँ ही आस जोहते रहे ------------------------------#drvandnasharma
-पत्र जो भेजा नहीं गया कहना है तुमसे जो कभी कहा नहीं चाहो मुझे ऐसे ,जैसे आजतक चाहा नहीं मत करो दुनिया की परवाह आज बांहो में भर लो ,करो बेपनाह प्यार जी लो इस पल को जो है सिर्फ आज #drvandna sharma
हाथों में हाथ तेरा हो ,हो सुहाना सफर न हो मंजिल का पता ,हो अनजानी डगर कुछ बचपना ,कुछ पागलपन हम -तुम करे यूँ ही काट जायेगा सफर ,तुम साथ दो अगर
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