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सारा अँधेरा यहीं रूका था जीवन हारा, जन-धन त्यागा, घिरे उजाले से देखा तो सारा अँधेरा यहीं जमा था। युग चलते हैं आदि-अन्त तक जीवन सारे मुड़ जाते हैं, संकट आते-जाते हैं जीवन पहरेदार रहे हैं। *** महेश रौतेला
क्षणभर बह जाऊँ ओ नदी पलभर उछल जाऊँ ओ जलधि, कुछ देर चढ़ जाऊँ ओ पहाड़ मनभर ठहरा रहूँ ओ पृथ्वी। कुछ पल देखता रहूँ ओ नक्षत्र आवागमन चलता रहे ओ प्राण, सुखमय मौन धरूँ ओ जीवन बातों में रिटता रहूँ ओ मनुष्य। छाँव बैठता रहूँ ओ वृक्ष प्रार्थना करता रहूँ ओ शान्ति, सत्य पर टिका करूँ ओ चेतना सुरसुर चलता रहूँ ओ हवा। * महेश रौतेला २६.०८.२०२३
न मुझे पता है न तुम्हें पता है, इस अनजानेपन में कौन देवता है! न मुझे पता है न तुम्हें पता है, इस भ्रष्टाचार में कौन देवता है! न मुझे पता है न तुम्हें पता है, इस परीक्षा में कौन देवता है! *** महेश रौतेला
समय के साथ अब रहा नहीं जाता, चलो घर चलो कुछ फूल तुम चुनोगे कुछ फूल मैं चुनूँगा। समय के साथ अब बिका नहीं जाता, कुछ कदम तुम बढ़ाओ कुछ हाथ मैं बढ़ाऊँगा। समय के साथ अब गाया नहीं जाता, कुछ बात तुम कहो कुछ बात मैं कहूँगा। समय के साथ अब चला नहीं जाता, कुछ आँसू तुम बहाओ कुछ आँसू मैं बहाऊँगा। समय के साथ अब झुका नहीं जाता, कुछ खड़े तुम रहो कुछ खड़ा मैं रहूँगा। *** महेश रौतेला
हर कोई जिन्दगी में परेशान है फिर भी जीना चाहता है, कौन सा अमृत है इसमें जो हर कोई चखना चाहता है। ***महेश रौतेला
बदलाव कब-कब हुये थे- जब पतझड़ हुआ और पेड़ नंगे हो गये, तब वसंत आया। जब गरमी प्रचंड थी तब बारिश हुयी, जब ठंड में कँपकँपी आयी तब जमकर बर्फ गिरी और पहाड़ों को सफेद कर गयी। ** महेश रौतेला
हमने शास्त्रीय ढंग से प्यार किया था, पतली पगडण्डी पर हम मिले थे, अकेले पेड़ के नीचे चुपचाप खड़े थे, या कभी-कभी हवा की तरह चले थे। *** महेश रौतेला
जिन्दगी तुझे कैसे नापूँ कोई हल जोतता, कोई हिमालय चढ़ता कोई खाना बनाता कोई आराम से बैठा रहता। कौन सा पैमाना लूँ कोई नाचता रहता, कोई गाता रहता कोई सोचता रहता। यह लिखना-पढ़ना यह खेलना-कूदना, कितना प्यार करूँ कि तू शेष रह जाय। *** महेश रौतेला
धूप खिलेगी: धूप खिलेगी, बिछेगी और समेट ली जायेगी, जीवन आयेगा, चलेगा और समेट लिया जायेगा। आन्दोलन बनेंगे, बिछेंगे और मुरझाने दिये जायेंगे, यदि सत्ता तक पहुँचे तो झगड़ने लगेंगे। हर नदी का स्रोत स्वच्छ होता है, फिर वह बहेगी,बिछुड़ेगी और समुद्र में डूब जायेगी। जीवन सत्य से उपजता झूठ में लिपटता है, मीलों चलकर सत्य में डूब जाता है। अभी-अभी जो सुबह थी वह शाम बन जायेगी, पृथ्वी मृत्यु के बाद हमें नहीं जगा पायेगी। ***** *** महेश रौतेला
तुझसे मैं एक बात कहूँ तुझको लम्बी रात कहूँ, जब जब मानव युग आये तुझसे अपना प्यार कहूँ। अमृत कहीं रखा होगा विष भी पहले पीना होगा, जीवन के इस मंथन में फूल हाथ में रखना होगा। लो बीत गयी क्षण की माया सन्नाटा उधर घिर आया, लोग अव्यवस्थित दौड़ रहे घर अपना भूल रहे। राहों का कोई अन्त नहीं आनन्द मेरा अनन्त नहीं, तुझसे मैं एक बात कहूँ मन में कोई दिगंत नहीं। *** *** महेश रौतेला
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