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Mannu Gujjar

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@mannugujjar


जिंदगी.,....

कभी धूप है, कभी छाँव है जिंदगी,
कभी हँसी है, कभी घाव है जिंदगी।
जो कल मिला था, आज दूर हो गया,
यही तो बदलता हुआ भाव है जिंदगी।
कभी अपने भी पराए हो जाते हैं,
कभी अजनबी दिल के करीब आते हैं।
जिसे हम समझते हैं अपना हमेशा,
वही अक्सर हमें सबक सिखाते हैं।
गिरना भी पड़े तो घबराना नहीं,
टूट जाओ मगर बिखर जाना नहीं।
रास्ते चाहे कितने भी मुश्किल हों,
अपने कदमों को पीछे हटाना नहीं।
वक्त किसी के लिए रुकता नहीं,
दर्द हमेशा दिल में टिकता नहीं।
आज अगर आँखों में आँसू हैं तो क्या,
हर मौसम हमेशा एक-सा रहता नहीं।
बस चलते रहो, चाहे राह कठिन हो,
उम्मीद रहे तो मंज़िल भी निश्चित हो।
जिंदगी ने जो दिया, उसे स्वीकार करो,
और जो नहीं मिला—उसका इंतज़ार करो।
क्योंकि जिंदगी नाम ही चलते रहने का है,
गिरकर फिर अपने पैरों पर खड़े होने का है।
हार मान लेना तो आसान है मगर,
असली मज़ा तो जिंदगी से लड़ने का है।

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सत्ता के सौदागर”
सिंहासन पर बैठे नागों पर, जनता कब तक फूल चढ़ाए?
जो रक्षक थे इस धरती के, वे ही घर-घर आग लगाए।

वचन बेचते, धर्म बेचते, बेच रहे ईमान वतन का,
सोने की थाली में परोसें, विष हर भूखे निर्धन का।

माथे पर जनसेवा लिखकर, भीतर काला लोभ छिपाए,
हाथ जोड़कर वोट माँगते, फिर जनता को भूल ही जाएँ।

खेतों की हरियाली सूखी, महलों में उत्सव की रातें,
रोटी रोती चौखट-चौखट, हँसती रहती झूठी बातें।

ओ भारत के वीर जवानो!
कब तक यूँ अपमान सहोगे?

जिनकी नसों में स्वार्थ बहा हो,
क्या उनको भगवान कहोगे?

यह धरती राणा की धरती, यह चंद्रगुप्तों की जननी,
यहाँ नहीं बिकता मानव, यहाँ नहीं झुकती है धरणी।

जब-जब सत्ता अंधी होती, जनता बन जाती ज्वाला,
एक चिंगारी ही काफी है, जल जाए अन्याय का जाला।

उठो युवाओं! हुंकार भरो,
अब कलम बने रण का भाला,
सत्य-अग्नि से दग्ध करो तुम
हर भ्रष्टाचारी का जाला।
जिस दिन भूखा किसान उठेगा,
टूटेंगे सोने के सिंहासन,
जनता जब क्रोधित होती है,
डगमग होता हर शासन।

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