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वही पुराना दस्तूर है... कि दुनिया का ऐसा उसूल है... जिसने रीत नहीं निभाई, उससे हुई भारी भूल है... पर नाम अगर राधा–कृष्ण का हो, तो वह भी कुबूल है। पर शायद यही मक़बूल है— जिससे प्रीत न जाए, वह तो सरासर शूल है। - Manvika Shveta
अक्सर हम उन खामोशियों को सुनने से कतराते हैं.. जो हमारे कानों में गूंज रही होती हैं।
क्या हो अगर मैं कभी खो जाऊं, तुमसे इतना दूर कहीं चला जाऊं कि तुम मुझे मुड़ कर देख ना पाओ. क्या फिर भी यूं ही मुस्करा सकोगे या फिर बस यादों में बहाओगे ये कीमती अश्क... सुधर जाओ क्योंकि... अभी मैं पास हूं। जिस पल दूर हुआ तुम सम्भाल कर हँस भी न पाओगे। क्या हो अगर मैं कहीं खो जाऊं.. एक ऐसी गहरी नींद में सो जाऊं.. - Manvika Shveta
खामोशियाँ ज़्यादा बोलने लगी हैं, इसलिए सन्नाटा भी सुनाई दे रहा है। श्श्श... धीरे-धीरे साँस लो, कहीं ये अँधेरा तुम्हें क़ैद न कर ले... और तुम्हारी ही धड़कनों को तुम्हारे ख़िलाफ़ गवाही न बना दे। - Manvika Shveta
उसकी आँखों में एक अजब उदासी थी, लेकिन होठों पर एक धीमी हंसी थी। ऐसे लग रहा था मानो कुछ तो है, आंखें कहीं और ही घूमती, लेकिन फिर भी मुझे देख रही थी, जैसे मैं कोई हीरा हूं, और वह मुझसे बहुत दूर है। मानो एक कसक सी थी उसके चेहरे पर, लेकिन फिर भी वह दिल से खुश थी। क्या था यह अजीब सा संगम, मुझे समझ ही नहीं आया वह इतनी खुश थी..! या फिर वह मुझे बता ही नहीं पाई कि वह कितनी खुश है ? अजीब मुस्कान थी, जैसे थोड़ा दर्द हुआ, थोड़ी चोट लगी, लेकिन मीठा भी लगा, थोड़ा तीखा और थोड़ा तेज सा लगा। लेकिन कुछ तो था… बात तो थी उसमें, पता नहीं क्या बात थी मैंने पूछा नहीं, और वह बता नहीं पाई...🫠
जिंदगी यूँ ही कतरा-कतरा, रेत की तरह हाथों से फिसलती जा रही है… संभल सको तो संभाल लो, वरना यूँ ही गुजरती जा रही है। वक़्त भी कितना बचा है, जो यूँ ही खाली बैठकर बिताए जा रहे हो… कभी तो पास आओ, देखो—हम यहाँ तन्हा बैठे हैं। पता नहीं क्यों खफ़ा हो, क्या कोई गिला है हमसे… अगर शिकायत है, तो कह क्यों नहीं देते, क्या पता हम ही तुम्हारी राह देख रहे हों। खैर छोड़ो… तुम भी बेवफ़ा ही निकले, सबकी तरह। अब तुमसे क्या गिला करें, जब हम खुद ही एक शिकवा बन गए हैं। - Manvika Shveta
रफ़्ता-रफ़्ता धड़कनें चली जा रही हैं, उन्हें तो ख़बर ही नहीं ये क्या धुन गुनगुना रही हैं। अपनी लट को सँवारती हुई, वो खुद में ही मुस्कुरा रही हैं। किसी सरगम की ताल है, या फिर मोहजाल है... मैं ठहरा खड़ा हूँ, और मेरा दिल खिंचा जा रहा है... - Manvika Shveta
वो नाराज़ हैं हमसे, कि हम जताते नहीं। इतनी मोहब्बत तो करते हैं, पर कभी दिखाते नहीं। जाने क्यों ख़्वाब सजाते हैं, जब उनमें वो आते नहीं। शायद इसलिए ख़फ़ा हैं, कि हम उन्हें मनाते नहीं। - Manvika Shveta
तड़पन सीने में जल रही है, बेचैनी का ऐसा आलम है, कि साँसें भी थम रही हैं। धुआँ-धुआँ सा दहक उठा हूँ, क्या बताऊँ वजह क्या है, यूँ समझ लीजिए कि मेरा ज़र्रा-ज़र्रा जल रहा है। आग इतनी तीखी है कि बस वजूद ही पूरा झुलस गया है। - Manvika Shveta
ये कैसी उलझन है, मन में ख़ामोशी है, पर लबों से शोर बहता है। इक झरने-सा भटक रहा हूँ, राह कोई मिल नहीं रही, फिर भी समंदर की प्यास बुझाने को आतुर हूँ। मानो उन लहरों से अठखेलियाँ करना चाहता हूँ, जहाँ मेरा बचपन घूमता था। शायद अब यही अंत है..! - Manvika Shveta
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