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हिमालय की किसी चोटी से पूछना - अकेलापन कितना प्यारा होता है! - आचार्य प्रशांत .
लोग तुम्हें नहीं चाहते, तुम्हारे द्वारा उनको जो मिल रहा होता है उस चीज़ को चाहते हैं। - आचार्य प्रशांत
तुम्हारा साथ बिन कहे जो दिल की हर बात पढ़ जाए, वो एहसास हो तुम, भीड़ में भी जो सुकून दे जाए, वो खास हो तुम। तपती धूप में जैसे ठहरती हुई कोई ठंडी हवा, मेरे हर बिखरे पल को संभालता वो किनारा हो तुम। तुम आए तो यूँ लगा जैसे वक्त ने करवट ली हो, सूखी डाल पर चुपके से फिर ज़िंदगी खिली हो। मुझे दुनिया की ख्वाहिश नहीं, न कोई और अरमान, बस इतना काफी है — तुम रहो मेरे पास हर शाम। तुम्हारी मुस्कान अब आदत सी बन गई है मेरी, जैसे अंधेरे को रोशनी की ज़रूरत होती है गहरी। ये रिश्ता लफ़्ज़ों का नहीं, खामोशी का पैगाम है, जहाँ दिल ही समझे दिल को — वही सच्चा मुकाम है। अगर कभी दूर भी हो जाओ, तो एहसास बनकर रहना, मेरी हर धड़कन में, मेरी हर सांस में बस तुम ही बहना।...✍️
धड़कन मेरी, पर एहसास तुम्हारा है, मेरी तन्हाइयों में भी अब पास तुम्हारा है। यूँ तो दुनिया में चाहने वाले कम नहीं हमें, पर इस दिल को सिर्फ इंतज़ार तुम्हारा है। .
जो कुछ लिखा तूने, उसे मिट के मिटा। जो पास है तेरे, उसे खुद से बचा। जो बोया है तूने, उसे जड़ से हटा। जो बोया नहीं तूने, उसे अपना खून पिला। जो तेरी कमाई है, उसे आग दे लगा। जो कमाया नहीं तूने, उसे कभी न गँवा। जो याद में घूमे, उसपे धूल उड़ा। जो याद ना आए, उसमें जी के दिखा। जो आंखें भर आएँ, ज़रा हँस के दिखा। जो हँसाता हो तुझे, उसे मौन बता। जो कुछ समझा तूने, उसे भूल ही जा। जो समझ के बाहर है, उसे सर दे झुका। — आचार्य प्रशांत (जिस-जिस को यह कविता समझ में आई हो, वो ज़रूर बताएं। देखते हैं कितने लोग इसके असली अर्थ को पकड़ पाए हैं।..🤔🙂)
" छिपाते अपनी हार नहीं , इंसान हैं अवतार नहीं थकते भी हैं रुकते भी हैं , पर मैदान में पीठ दिखाना कभी हमें स्वीकार नहीं "..... - आचार्य प्रशांत..
"लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती, बस एक माँ है जो कभी खफा नहीं होती। सारे जहाँ की खुशियाँ मिल जाती हैं पल भर में, जब माँ के चरणों में सिर होता है, तो कोई कमी नहीं होती।"
☺️😀
"चेहरे पर हंसी और आँखों में शरारत है, तेरी सादगी में भी गजब की कयामत है। यूँ तो आईना रोज़ देखता होगा तुझे, पर मेरी नजरों से देख, तू खुदा की इबादत है।" .
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