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शीर्षक - "गुड़िया" तुम फूलों का ताज हो, मैं खुद को ताज कैसे बना लूँ? तुम फूल बन मेरे करीब आई हो, फिर तुम्हारी महक क्यों चुरा लूँ? मेरे बाग में तुम जैसी कलियां हैं, फिर मैं खुद को काँटा कैसे बना लूँ? फिदा तो ज़रूर हूँ, तुम्हारी फूलों सी पंखुड़ियों पर। उम्र की दूरी है, वरना तुम मेरे भी बाग की शहज़ादी होतीं। जब तुम्हें पहली बार देखा, तुम्हारी आँखों में खो गया। मैंने कभी नहीं सोचा था, कि तुम मुझे अपना ताज बनाना चाहती हो। जब तुमसे बातें कीं, तो समझा, कि तुम भी मुझे ताज बनाना चाहती हो। फूलों की महक! तुम हर बाग में महकना, बैठ जाना उस फूल के पास, जिसके पास खुद की कोई महक नहीं। मैं बस महक का हिसाब करता हूँ, यूँ ही सबको बिखेर देता हूँ। मैं फूलों के ज़ख्म की कहानी लिखता हूँ, इसीलिए मैं हर किसी की महक बन जाता हूँ। -कवि एसटीडी मौर्य ✍️ #stdmaurya #lekhak
"खूबसूरती तो शब्दों में छिपी होती है; चेहरे का क्या है, वह तो उम्र के साथ बदल जाता है।" - Std Maurya
"मैं क्या लिखूँ? खुद को नवाब लिखूँ या खुद को फ़कीर लिखूँ? नवाब लिखता हूँ, तो फ़कीर छूट जाता है, फ़कीर लिखता हूँ, तो नवाब छूट जाता है। हसीना की सूरत देखूँ, तो अपनी सूरत भूल जाता हूँ, तुम अपने लफ्ज़ों से बयां तो करो— अपनी स्याही से खुद को नवाब लिखूँ या फ़कीर लिखूँ? कदम-कदम चलकर मैं यहाँ तक आया हूँ, मैं सोचता हूँ... तुम अपने लफ्ज़ों से बयां करो, गर तुम बयां नहीं करते, तो मैं खुद को फ़कीर ही लिखता हूँ।" - सत्येंद्र कुमार "एसटीडी" कटनी, मध्य प्रदेश दूरभाष -7648959825
शीर्षक -"विदाई" फूलों की महक मिल रही, उम्र धीरे-धीरे गुजर रही, वह पुराना समय अब कहाँ से आएगा? हम थे बागों की चहल-पहल, मगर वो पुराने बाग कहाँ से आएंगे? चिड़ियों की आवाज़ में हम मगन थे, मगर वो चिड़िया अब कहाँ से आएगी? कुछ फूलों से मिले, कुछ फूलों से दूर हो गए, मगर वह पुराना समय अब कहाँ पर आएगा? अब सुनो मेरी इन नन्हीं कलियों, हम तो बागों में रहने वाले फूल थे, अब हम खिल गए हैं, इसलिए बागों में जगह कहाँ? दस्तूर है हर बाग का, खिल कर महकना पड़ता बागों के आँगन में, न महको तो फिर तुम फूल कहाँ? सुनिए मेरे बागों के माली, हम आपको कोटि-कोटि करते हैं प्रणाम, आपने ही सींचा है हमें अपनी ममता से, अब महक कर दुनिया में रोशन करेंगे आपका नाम। कुछ हसीन शब्दों से कुछ सुनहरे रंगों से आपका किताबों के हऱ पन्नों में लिख दूँगा नाम कलम नहीं मेरी जादू है मगर दिया हुआ तों आप लोगो वरदान हैं -सत्येंद्र कुमार "एसटीडी "✍️ #stdmaurya #stdpoem
"इश्क की किताब हम भी लिखेंगे, अभी अपने रक्त से इंकलाब लिख रहा हूँ। रक्त बच जाने दो, फिर हम भी अपनी अधूरी मोहब्बत का हिसाब लिखेंगे।" - Std Maurya
"उगता हुआ सितारा हूँ, बुराइयाँ तो होंगी; मशहूर थोड़ी हूँ जनाब, जो तालियों की शोर होंगी।" - Std Maurya
मत कहो हमें रटने वाले, हम नया पैगाम रचते हैं। काँटों से गुज़रकर हम तो, फूलों की महक बिखेरते हैं। धूप-छाँव को महसूस कर, शब्दों को रंगों में उतारते हैं, हम फसल की तरह उगते हैं। कोई न समझे तो टूट जाते हैं, काँटों और फूलों में हमें फर्क नहीं दिखता, हम काँटों को भी फूल समझते हैं।" - Std Maurya
"नया साल है, अब नया मोड़ लाएंगे हम, जो बीते साल के आखिरी दिन भूल गए हमें, वादा है, नए साल में उन्हें याद भी नहीं करेंगे हम।" - Std Maurya
"नया साल है, अब नया मोड़ लाएंगे हम, जो बीते साल के आखिरी दिन भूल गए हमें, वादा है, नए साल में उन्हें याद भी नहीं करेंगे हम।"
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