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*"जन्मदिन: जश्न नहीं, बदलाव की शुरुआत" आज 2 अक्टूबर का दिन मेरे लिए बेहद महत्वपूर्ण है—इसलिए नहीं कि आज मेरा जन्मदिन है, बल्कि इसलिए कि आज मेरे जीवन का एक और वर्ष कम हो गया है। शायद आप सोच रहे होंगे कि ऐसे खुशी के अवसर पर मैं ऐसी बातें क्यों कर रहा हूँ। लेकिन कड़वा सच यही है कि हमारा जीवन और हमारी उम्र हर दिन घट रही है। इसलिए मेरा मानना है कि जन्मदिन पर सिर्फ जश्न मनाने के बजाय हमें कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे समाज में एक नया भाव और सकारात्मक बदलाव जागे। अक्सर लोग मोमबत्तियाँ बुझाकर, केक काटकर और गुब्बारों जैसी चीज़ों पर पैसे खर्च करते हैं जो सिर्फ 1-2 घंटे ही काम आती हैं और बाद में फेंक दी जाती हैं। इतना ही नहीं, केक को चेहरे पर लगाना आजकल का एक फैशन बन चुका है, जो मेरे दृष्टिकोण से सही नहीं है। क्यों न हम चंद मिनटों के इस दिखावे पर खर्च होने वाले पैसे से समाज के किसी आर्थिक रूप से कमजोर व्यक्ति की मदद करें? इसके साथ ही, पर्यावरण भी हमारे जीवन का सबसे अनमोल हिस्सा है। जन्मदिन पर केवल बातें करने के बजाय हमें पर्यावरण के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। अगर हम नए पेड़-पौधे नहीं भी लगा पा रहे हैं, तो कम से कम जो पेड़ पहले से मौजूद हैं, उन्हें कटने से बचाने के लिए एकजुट तो हो सकते हैं! चाहे कोई व्यक्ति हो या प्रशासन—यदि पेड़ों को अनावश्यक रूप से काटने का आदेश दिया जाता है, तो हमें उसके खिलाफ आवाज उठानी चाहिए, ताकि आने वाली पीढ़ियों के लिए पर्यावरण बचा रहे। आइए, अपने जन्मदिन को सिर्फ एक व्यक्तिगत उत्सव न बनाकर समाज और प्रकृति को बेहतर बनाने की दिशा में एक छोटा सा कदम बनाएँ। — [-एस.टी.डी.]
🇮🇳 स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएँ! 🇮🇳 "मैं खूबसूरत इसलिए नहीं कि मुझे खूबसूरत बनाया गया है, खूबसूरत तो मैं इसलिए हूँ, क्योंकि अपने लहू का कतरा-कतरा लुटाया गया है..." मेरा भारत - एस.टी.डी मौर्य ✍️ लिखूँ तेरी कहानी — तेरी कहानी में आग है, रक्तों से सजी-धजी कहानियाँ तेरी हैं! तेरे दिलों में इंक़लाब — लहू में सिर्फ़ आग है, अनेकता में एकता बनी, दुनिया में तेरी पहचान है। मिट्टी की महक सारी ज़हन में फैल रही है, बुद्ध, फुले, अशोक, वीर प्रताप की वाणी गूँज रही है। वीर भगत, सुभाष चंद्र बोस का चेहरा युवाओं में छलक रहा है, युवाओं में इंक़लाब के बोल, दिलों में गूँज रहे हैं। भीमराव के बने असूल, दिलों को जोड़ रहे, कलम का जादू है दुनिया में, यह भाव जगा रहे... आँखों में सिर्फ़ आग दिखती, दिलों में प्यार छलकता है, मुझे गौरव है कि मेरे भारत की मिट्टी में मोहब्बत की सुगंध आती है। अनेक राज्य, अनेक भाषा, अनेक बनी संस्कृति यहाँ, गुलदस्ते से भी ख़ूबसूरत बन, एकता उभरती है यहाँ... तराज़ू की तौल बना है यहाँ, नाज़ुक फूलों की उम्मीद बना है यहाँ, सपनों से प्यारा भारत, दुनिया में हमारा!
शीर्षक: सावन का शृंगार हरी-हरी साड़ियाँ पहन कर सामने आओगी, तुम साजन की दीवानी बन जाओगी। होठों की लिपस्टिक, हाथों के कंगना जब चमकेंगे, सावन की हरियाली धरती पर लाएँगे। ओह! तेरा कंगना जब खनकेगा, मेरा दिल चुराएगा। तेरी माथे की बिंदिया दिल धड़काएगी, मेरी नज़रों का चैन चुराएगी। हाथों में मेहंदी, पाँव में पायल से सँवरोगी, मेरे नयनों को तुम ख़ूब तड़पाओगी। देखना सनम, मेरी नज़र न लग जाए तुमको, मेरी याद तुम्हें भी तड़पाएगी। साजन की तुम सावन का सवेरा बन जाओगी, हाथों की हरी-हरी चूड़ियाँ जब खनकाओगी। ज़ुल्फ़ों में जब तुम चमेली के फूल सजाओगी, मेरे दिल में खुशबू बिखेर जाओगी। ओह! तेरा कंगना मेरा दिल चुराएगा... -एसटीडी मौर्य ✍️ 7648959825
*बदल रही है दुनिया* बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं रिश्तों की खूबियाँ गिनाए जा रहे हैं सिक्कों से रिश्ते तोले जा रहे हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। छल-कपट बढ़ रही आग की तरह अपनों में भी अपने नहीं दिख रहे दूर-दूर तक रिश्तों में सिर्फ हाँ की कीमत रह गई है बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। छल-कपट उसूल बन गया है हृदय में कपट भर, इंसान महान बन गया इंसानों में अब इंसानियत नहीं—इंसान मुखौटा बन गया बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। इंसानों की सूरत में भी सुंदरता का मुखौटा लगा लिए इंसानों के सूरत नज़र नहीं आते हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। गुब्बारे में हवा भर, दूध में ज़हर मिला बाज़ार में बेचे जा रहे हैं पूछो तो सिर्फ कीमत गिनाए जा रहे हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। मदिरा के प्रसार में बड़े-बड़े पोस्टर लटकाए जा रहे टीवी के विज्ञापन में फायदा गिनाए जा रहे हैं संघ के माध्यम से नशा-मुक्ति आंदोलन चलाए जा रहे हम देख रहे—दुनिया बदल रही है...। प्रश्न को दबाए जा रहे हैं तथ्य को मिथ्या बताए जा रहे हैं बदल रही है दुनिया, हम देख रहे हैं...। *एस.टी.डी. मौर्य,*✍️ कटनी (मध्य प्रदेश)
शीर्षक- प्रेम की रंगत* हम लिखें कहानी प्रेम की, तुम प्रेम बन जाना...। मैं बनूँ दीप तो तुम मेरी परछाई बन, जीवन भर साथ चलना...। मैं बनूँ कभी उलझन तो बेहिचक प्रश्न करना...। उलझन से प्रश्न का प्रेम-करुण महक कम न करना...। फूलों सा मुकुट तुम्हारा, पायल की खनक तुम्हारी...। बागों के आँगन में पायल की खनक तुम्हारी...। फूलों की पंखुड़ी की तरह जुल्फ़ें तुम्हारी...।फूलों सी मुस्कान सदा रहती है तुम्हारी...। नयन की रंगत, नयन की प्रेम नज़र तुम्हारी...। पियोनी सी कहानी है नयन की तुम्हारी...। नयन की पलक छाँव की तरह तुम्हारी, वर्षा की बूँद की तरह है कहानी तुम्हारी...। तुम मेरे साथ रहना उम्र भर, प्रीत बरसाना, छाँव बन जाएगी जग में प्रीत हमारी...। -एसटीडी मौर्य ✍️ 7648959825
बंधन इंसानियत के बंधन टूट रहे, न जाने इंसान क्या तराश रहे...। जाति-धर्म का जाल बुन, स्वयं को ही बांध रहे हैं...। प्रेम-करुणा पन्नों में लिख, स्वयं के अंदर घृणा भर रहे हैं...। नद-नाले के आँसू बह रहे, इंसान उन्हें खूबसूरत झरना बता रहा...। फूलों की खुशबू स्वयं को तराश रही, न जाने ये भंवरे फूलों का रस चुरा रहे...। चिड़ियों की चीँ-चीँ सूनी-सूनी हो रही, कोयल-कबूतर न जाने कहाँ जा रहे...। पायल की खनक में कोई मधुर आवाज़ नहीं, न जाने लोग किसकी आवाज़ सुन रहे...। - एस.टी.डी. मौर्य ✍️
स्नेह की ज्योति तुम हो स्नेह की दिव्य ज्योति, आँगन में भर देती हो प्रियता की रंगत। प्रियांशी-सी चंचल तुम नटखट, दीप-सा हर मन जगमगा देती हो...। सत्येंद्र-सी सत्य की आभा लेकर, सुमित-सी सबकी सच्ची मीत, फूलों-सा जीवन महका देती हो...। वर्षा की बूंद-सी निर्मल, अभिषेक-सी पावन तुम, माथे पर शुभम की रौनक़ बनती हो...। मौसम-सी शीतल छाँव हो, अँधेरे में अंशुल-सी उजियारी हो...। – एस.टी.डी. मौर्य ✍️
शीर्षक *इश्क़ होने तो दीजिए* नफ़रत ही सही बेफ़िक्र कीजिए, दफ़्तरों का शहर, ज़ख़्म होने तो दीजिए। माना कि इश्क़ में ज़िंदगी है बसी, मगर पहले इश्क़ होने तो दीजिए...। दौलत-शोहरत तराज़ू की तौल है, वज़न तो बताने तो दीजिए। इश्क़ के अँधेरे में, मुझे डूबने तो दीजिए...। माना कि इश्क़ इबादत है यहाँ, मुझे इश्क़ में दफ़न होने तो दीजिए यहाँ। क़बूल नहीं इश्क़ मुझे, पहले इश्क़ होने के लिए फ़रमाने तो दीजिए यहाँ...। सुना है इश्क़ में लोग घुट-घुट कर जीते हैं यहाँ? एकतरफ़ा इश्क़ में आशिक़ पिस जाते हैं क्या यहाँ? आशिक़ों को आशिक़ी मुझे फ़रमाने तो दीजिए। - *एस.टी.डी. मौर्य* ✍️ 7648959825
शीर्षक "हाँ, मैं आज़ाद हूँ" हाँ, मैं आज़ाद हूँ, मुझे गुलामी पसंद नहीं। आँखों में क्रांति है, शब्दों में इंकलाब, हाँ, मैं भगत सिंह का फैन हूँ। अन्याय मुझसे देखा नहीं जाता, ईश्वर के सामने गिड़गिड़ाना आता नहीं। आँखों में क्रांति की लौ लिए चलता हूँ, भीख माँगना मुझे पसंद नहीं। अन्याय पर मेरा मुँह बंद नहीं रहता, खून से इंकलाब लिख देता हूँ। ईश्वर जब कुछ करता नहीं, इसलिए खुद को नास्तिक कह देता हूँ। मेरे कंधों पर मेरा ही हाथ है, अन्याय देखता हूँ तो खुल कर बोल देता हूँ। मुझे मौत का कोई डर नहीं, डर तो बस इस बात का है— अन्याय पर न बोलूँ तो मेरा जीवन व्यर्थ है, इसलिए शायद, मैं कुछ नज़रों में बुरा हूँ। -एस.टी.डी. मौर्य ✍️ #stdmaurya
शीर्षक - "अभिलाषा" ऐ सुनो, मुझे इतना नज़रअंदाज़ क्यों करती हो? तीन बार बुलाता हूँ, कम से कम एक बार आवाज़ तो दो... बोल नहीं सकती, इशारा तो कर सकती हो। इशारा नहीं कर सकती, सिर तो हिला सकती हो। मानता हूँ कि तुम नफ़रत करती हो, नफ़रत ही सही, पर प्यार भी तो जता सकती हो। यह भी नहीं कर सकती, तो मेरी राह में काँटे ही बिछा सकती हो... काँटे नहीं, तो फूल भी बिछा सकती हो... दूसरों को आवाज़ देता हूँ, यूँ ही चिढ़ जाती हो। तुम्हें आवाज़ देता हूँ, फिर क्यों मुँह फेर लेती हो? मुझे जब हिचकी आती, यूँ ही नीर ले आती हो। फिर क्यों नहीं मुझे, नीर में ज़हर की पुड़िया घोल कर दे देती हो? -एस.टी.डी. मोबाईल न. 7648959825 कटनी मध्य प्रदेश #stdmaurya
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