Quotes by Kajal Soam in Bitesapp read free

Kajal Soam

Kajal Soam

@vanshsingh118873
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happy friendship Day

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आलम इकबाल मैं क्या खूब पंक्तियां लिखी है मतलब समझो तो समझ में आता है वरना तो लिखते तो हर कोई है

लोग पूछते हैं कि 'फैमिली मूवी नाइट' कब होनी चाहिए?
हमारे घर में इसका जवाब थोड़ा हटके है!
जब हमारे फोन का रिचार्ज खत्म हो जाता है, तब शुरू होती है हमारी असली Family Gathering! 🎬🍿
रिचार्ज खत्म होने से एक दिन पहले नई मूवीज़ डाउनलोड हो जाती हैं, और फिर अगले 3-4 दिन कोई फोन नहीं, कोई सोशल मीडिया नहीं... सिर्फ फैमिली, ढेर सारी बातें और एक साथ बैठकर मूवी देखना!
ये हमारे पापा का बनाया हुआ एक खास रूल है। उनका मानना है कि जिंदगी में कभी-कभी डिजिटल दुनिया को साइड में रखकर अपनों के साथ रहना बहुत जरूरी है। यह सिर्फ पैसे बचाने की बात नहीं, बल्कि उस 'मज़े' और 'इंतजार' की बात है जो एक साथ आने पर मिलता है।
पापा की इस सीख ने हमें सिखाया है कि असली रीकनेक्ट फोन रिचार्ज करने से नहीं, बल्कि अपनों के साथ टाइम स्पेंड करने से होता है।
मुझे अपने घर की ये परंपरा बहुत पसंद है। क्या आपको लगता है कि हर घर में ऐसा एक 'No-Recharge/No-Phone' रूल होना चाहिए? 💭✨

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वीर पुत्र अभिमन्यु

​धरती का वह वीर पुत्र था, रण का एक उजास था,
अर्जुन का वह नन्हा सुपुत्र, पर साहस अतुल कपास था।
नहीं डरा वह कभी काल से, न युद्ध की ललकारों से,
अनजान था वह उस साजिश से, कपट भरे वादों से।
​छल का था ताना-बाना, साजिशों की बंदिशें जहाँ,
पर डरा नहीं वह बाल-वीर, गूँजी उसकी हुंकार वहाँ।
व्यूह चक्र का भेद दिया, जब बोला तीसरा पहर,
बढ़ता गया वह निडर-अचल, बन शत्रुओं के सिर पर कहर।
​पीछे मुड़कर देखा उसने, कोई न दिखा अपना सज्जन,
था अकेला वह निर्भय बालक, फिर भी अडिग रहा मन।
रथ वालों को, घोड़े वालों को, एक-एक कर धूल चटाई,
साहस के उस महा-समर में, शत्रुओं को हार दिखाई।
​देख पराक्रम उस बालक का, दुर्योधन तब घबराया,
कपटी मन में अधर्म जगा, सातों महारथियों को बुलवाया।
"लड़ो एक संग सारे मिलकर, मत छोड़ो इस पांडव को आज,
प्रण लिया है मैंने रण में, इसका वध करना अनिवार्य आज!"
​गूँज उठी जब छल की बातें, सातों ने एक संग वार किया,
अस्त्र-शस्त्र सब काट दिए, बालक पर न कोई दया किया।
पर कहाँ हार मानने वाला था, वह वीर-श्रेष्ठ अभिमन्यु महान,
जब टूटी ढाल और छूटे अस्त्र, तब जागा रण का नया मान।
​उखाड़ लिया रथ का ही पहिया, हवा में दिया घुमाए,
सातों महारथी थर-थर काँपे, जब पहिया उसने तान उठाए।
पर पीछे से कपट-वार कर, स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताया,
छल से गिराया उस बालक को, पर वह बालक नहीं घबराया।
​अंतिम साँस, अंतिम कतरे तक, वह रणभूमि में डटा रहा,
कौरव दल के हर अभिमानी का, झूठा मस्तक कटा रहा।
कहना जाकर मेरे पिता से, उनका पुत्र बलवान था,
लड़ा आपके मान की खातिर, जब तक प्राण में प्राण था!

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बुद्धि भ्रष्ट

माधव की बुआ के समय बीता हुआ शिशु हुआ।
सब खुशियां मनाए रहे पर जब देखा पहली बार शिशु को सब संकोच उठाए रहे।
चार भुजा तीन नेत्र देखकर सब घबराए रहे।
माता-पिता चले त्यागने शिशु को दूर कर रहे।
हुई आकाशवाणी जब फिर परमात्मा समझाए रहे।
मत त्यागो पुत्र को जिसकी गोद में खेल के यह ठीक होगा।
वही पुत्र का अंत करेगा।
अब बारी माधव की थी।
लेत गोद में जब शिशु को झड़ गए सभी अंग बन गया सामान्य शिशु को देखकर खुशी बना रहे।
याद आई बुआ को बात फिर क्या था?
मांगने लगी माधव से वचन तुम 100 गलती भी क्षमा करो।
वचन दो माधव मुझको दिया वचन माधव ने मैं 100 गलती क्षमा करूं।
101 गलती पर अंत करूं।
सुन वचन बुआ माधव के अब कुछ संतुष्टि पाई शिशु बड़ा होने लगा।
नाम शिशुपाल कहलाने लगा।
माधव को बैरी मान रहा।
अब उनकी निंदा कर रहा।
यज्ञ कराया पांडव ने सबको न्योता आया।
भारी भरी सभा में माधव को उत्तम पुरुष माना।
यही नहीं सह पाया निंदक फिर क्या होना था?
लगा बोलने माधव को छलिया ग्वाला अनगिनत नाम लगे माधव करने गिनती अब हुई 99 गलती।
फिर माधव ने सोच चेत किया।
आखिरी गाली मत करना।
फिर उसको समझाया है पुत्र मेरी बुआ का गलत लगता मेरा भाई है।
मान जा गलती मत करना।
यही सीख समझाई है।
जब अकल पर पत्थर पड़ जाएं कुछ नजर नहीं आता है।
आखिर उसने फिर माधव का अपमान किया।
लिया सुदर्शन चक्र बुलाए फिर उसका अंत किया।

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कर्ण का आत्मसमर्पण
शब्दों में लिखी कहानी नही,
माधव मैत्री का संदेशा लाए,
उसको भी ठुकरा दिया,
जब चले वहाँ से माधव,
मिले सूत पुत्र कर्ण से,
उसको प्रलोभन देने चले,
देखो माधव बतला रहे,
कैसे कर्ण को विचला रहे,
क्या-क्या प्रलोभन दिखला रहे,
मिल जा पांडव से जाकर,
तू राजा बन जाए,
कुंती का है ज्येष्ठ पुत्र,
सब तुझे मिल जाएगा।
छोड़ दुर्योधन का चक्कर,
आ जा मेरे अंदर,
पांडव भी सर झुकाएंगे।
क्षमा करे माधव मुझे,
ये ना मैं अपना सका,
वो कुंती जिसने मेरा त्याग किया,
एक नवजात शिशु को गंगा में समाए दिया,
जब सबके ताने सुनकर, मैं बड़ा हुआ,
एक बार ना पूछा उसने, उसका ये लाल था,
कैसे मैं अपना मानूँ,
जो प्रलोभन देते हो, उसको मैं त्यागूँ।
जब सूत पुत्र कहकर,
जग ने बदनाम किया,
कहाँ थी पांडव जननी,
मिला श्राप ऋषि से,
जब सबने बहिष्कार किया।
वही था दुर्योधन,
जिसने सम्मान किया,
मित्र बनाया अपना उसने,
ऐसा काम किया,
कैसे उसका ऋण उतारूं,
जिस वृक्ष ने छाँव दी,
उसका ही तना काटूं,
ये ना मैं कर सकती,
मुझे क्षमा करे माधव।
क्या लेना मुझे इस माया से,
कौन साथ ले जाएगा,
किसका राजपाठ,
उससे मैं क्या काम करूँ,
मुझे दूर रहने दे माया से,
इतना सम्मान करूँ,
जो होता परिणाम,
मैं दुर्योधन के साथ लडूं,
मर जाऊं उसके लिए,
तो मैं ऋण से आजाद हो पाऊं।
क्षमा करे माधव,
माधव मन में हरषाये,
वचन सुन कर्ण के,
वे कुछ संतुष्टि पाए।
एक कृपया करना, केशव,
ये बात किसी को ना बतलाना,
पता चला दुर्योधन को,
वो राजपाठ देगा मुझको,
कुछ नही मिले पांडवों को,
ये बात वही रह जाए।
अभी मुझे ऋण चुकाने है,
मित्र का ऋण युद्ध भूमि में,
श्राप का ऋण युद्ध भूमि में,
जननी का ऋण युद्ध भूमि में।
अब होने दे माधव जो घटा,
अब अंत में प्रणाम स्वीकार करो,
हे केशव.....

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