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Vijay Erry

Vijay Erry

@vijayerry.232206
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Mother's Day — माँ के नाम
माँ

— १ —
जब भी थकान ने आँखें मूँद लीं,
माँ की लोरी ने नींद सजाई थी।
अँधेरे में जो दीप जलाया था,
वो माँ की ही उँगली थी, वो माँ की ही रोशनाई थी।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— २ —
आँचल में जो सुकून मिला करता था,
वो दुनिया के किसी कोने में नहीं मिलता।
झुलसती धूप में छाँव बनी रही,
माँ का प्रेम हर मौसम में खिलता।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ३ —
जब पाँव लड़खड़ाए राहों में,
माँ की दुआ ने थामा हर बार।
गिरने से पहले हाथ थे तेरे,
माँ, तू ही मेरा हर आधार।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ४ —
रोटी में तेरे हाथों की महक थी,
भोजन नहीं, वो प्रेम का भोग था।
दुनिया के हर स्वाद से ऊपर,
माँ के हाथों का अपना ही योग था।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ५ —
जब रोया मैं चुपके-चुपके रात को,
तू बिन बोले पास आ जाती थी।
आँसू पोंछने को शब्द नहीं चाहिए,
माँ की नज़र सब कुछ जान जाती थी।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ६ —
तूने कभी शिकायत न की ज़िन्दगी से,
हर तकलीफ़ को मुस्कान में ढाला।
त्याग को तूने नाम नहीं दिया,
बस चुपचाप हर पल को सँभाला।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ७ —
तेरी झुर्रियाँ मेरी कहानी हैं माँ,
हर लकीर में मेरा बचपन छुपा है।
तेरे सफ़ेद बालों में देखता हूँ,
मेरे लिए जो तूने सब कुछ चुका है।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ८ —
देव मंदिरों में ढूँढा ईश्वर को,
पर वो तो घर में ही मिलता रहा।
माँ के चरणों की धूल जो है,
हर तीर्थ से वो पावन निकला।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— ९ —
दूर हूँ आज, पर दिल में है तू,
हर साँस में तेरी दुआ बसी है।
जहाँ भी जाऊँ, जो भी पाऊँ,
माँ, तेरी ममता मेरे साथ चली है।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— १० —
शब्द कम पड़ते हैं तुझे कहने को,
सागर भी कलम बने तो कम होगा।
माँ, बस इतना जान ले —
तेरे बिना यह जीवन सूना, अधूरा, धुंधला होगा।
माँ — तू जीवन की पहली कविता है मेरी।
— कवि
Vijay Sharma Erry
विजय शर्मा 'एरी'
Mother's Day — 2026 🌸

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उठते सागर
विजय शर्मा एरी

उठते सागर,
गरम होती धरती,
भीषण तूफ़ान,
चेतावनी स्पष्ट दी…

रोते हिमखंड,
उनकी चुप्पी गूँजती,
पिघलते आँसू,
लहरों में बदलती।

जलते वन,
आकाश धुँधला,
प्रकृति का गीत
अब शोक में ढला।

नदियाँ घुटतीं,
सूखी ज़मीन,
पक्षी उड़ते,
पर ठिकाना कहीं नहीं।

काँपते नगर,
सागर किनारे हटते,
मानव का अहंकार
अब हार चखते।

बच्चों की आँखें
मुरझाए प्रभात पर,
हरियाली के सपने
खो गए रात भर।

फिर भी आशा
साँसों में पलती,
परिवर्तन के बीज
धरती में खिलती।

साथ मिलकर उठें,
साथ मिलकर खड़े हों,
धरती को सँवारें,
उसके घाव भरे हों।

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यह हिंदी कविता अंग्रेज़ी मूल की भावनाओं को उसी गहराई और चेतावनी के स्वर में प्रस्तुत करती है, साथ ही अंत में आशा और सामूहिक प्रयास का संदेश देती है।

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प्रकाश ही प्रकाश
विजय शर्मा एरी

I.
अंधेरों में जब जीवन था,
सन्नाटा हर क्षण गहरा था।
फिर कोई आया मधुर उजाला,
मन में खिल उठा नया उजाला।

II.
मुस्कान उसकी वसंत समान,
स्वर में छिपा मधुर गान।
निशब्द क्षणों में आशा जन्मी,
थका हुआ मन फिर से संवरी।

III.
न कोई आडंबर, न कोई शोर,
बस करुणा का निर्मल भोर।
सुनने वाला धैर्य भरा,
निकट रहे तो जग सुधरा।

IV.
टूटे दीवारों पर साहस लिखा,
गिरते पलों में संबल दिया।
जहाँ संदेह का शासन था,
वहाँ विश्वास का आलोक रहा।

V.
दबी हुईं आशाएँ फिर उठीं,
बादलों में ताराएँ झिलमिलीं।
हर कदम हुआ हल्का-सा,
मानो सृष्टि संग चल पड़ा।

VI.
उसकी उपस्थिति ने दिखलाया,
मन में छिपा बल जगाया।
सत्य का दर्पण सामने आया,
भूला हुआ सौंदर्य फिर पाया।

VII.
यात्रा चाहे मुड़े, झुके,
उसका प्रकाश सदा थामे।
समय, नियति चाहे बदल जाए,
स्नेह का उपहार साथ निभाए।

VIII.
आज मैं खड़ा हूँ पूर्ण, नया,
कृतज्ञता का गान रचा।
उसके आने से जीवन बदला,
नीले गगन सा मन उजला।

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