Shaheed ki Vidhwa - Season 1 - Part 2 in Hindi Love Stories by Dhananjay dwivedy books and stories PDF | शहीद की विधवा - सीजन 1 - भाग 2

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शहीद की विधवा - सीजन 1 - भाग 2

सिंह साहब ने मुझसे कहा –“ठीक है बेटा, वैसे भी अब इस पूरे जहाँ में हमारा अपना तो कोई भी नहीं बचा है। इस क्रियाकर्म को सम्पन्न कराने के लिए किसी न किसी की आवश्यकता तो पड़ेगी ही… और वो तुम ही सही। शायद भगवान की भी यही मर्ज़ी है, तभी तो उन्होंने तुम्हें हमारे पास भेजा है।

    ”उनकी बातें सुनकर मैंने संयमित होकर उन तीनों को प्रणाम किया और फिर जाकर वहीं बैठ गया।

  कुछ देर बाद पंडित जी का आगमन हुआ, तब मुझे पता चला कि वे मृतात्मा की शांति के लिए गरुण पुराण का पाठ करने आए हैं, तभी उन्होंने गरुण पुराण से संबंधित  आवश्यक सामग्री माँगी तो घर में बहुत-सी चीजें उपलब्ध नहीं थीं,

  उनकी बात सुनने के पश्चात मैंने उनसे कहा कि कृपया एक पूरी सूची बना दें, ताकि कोई वस्तु छूट न जाए।

   थोड़ी ही देर बाद उन्होंने मुझे सूची थमाते हुए कहा –“सबसे पहले ये सभी सामान ले आइए, तो ही आज से पाठ प्रारंभ हो सकेगा।

  ”पंडित जी की बात सुनकर सिंह साहब मेरी तरफ मुड़ने के बाद बोले –

    “ठीक है आप इन सामानो को लेने के लिए ऋचा बेटी से पैसे ले लीजिए।

” उनकी बात सूनने के बाद मैंने सिंह साहब से गंभीरता पूर्वक कहा –“नहीं, अरे ऐसी कोई बात नहीं है, अभी मैं अपने पास से ही ले आता हूँ, बाद में हमलोग हिसाब कर लेंगे।

      ”इतना कहकर मैं बाज़ार की ओर चल पड़ा, लगभग बीस मिनट के बाद मैं गरुण पुराण से संबंधित सारा सामान लेकर लौट आया और उसे बरामदे में रखकर 240 रुपये का बिल सिंह साहब को दे दिया।

     सिंह साहब ने बिल देखते ही अपने बिस्तर के सिरहाने के नीचे रख दिया, इसके बाद मैंने पंडित जी के निर्देशानुसार गरुण पुराण के लिए सारी तैयारी कर दी और पंडित जी के आदेश के बाद हम सभी लोग सिंह साहब के साथ बैठकर गरुड़ पुराण का श्रवण करने लगे।

    लगभग एक घंटे बाद गरुण पुराण की कथा का पहला अध्याय समाप्त हुआ और कथा खत्म होने के बाद कुछ ही देर के पश्चात पंडित जी ने एक और सूची मुझे दी और पास रखी कुर्सी पर बैठते हुए बोले –“ये शेष सामग्री भी ले आइए।

    ” पंडित जी से उस सूची को लेकर बाज़ार चला गया और आधे घंटे पश्चात सारी सामग्री लेकर लौटा और 675 रुपये का बिल फिर से सिंह साहब को थमा दिया।

  इस बार भी उन्होंने मुझसे बिल लेने के बाद फिर से अपने सिरहाने के नीचे रख दिया और तुरंत ही सिंह साहब ने अपनी पत्नी को आवाज़ दी, जैसे ही उनकी पत्नी वहाँ पहुँचीं, तो उन्होंने दोनों बिल निकालकर उन्हें देते हुए कहा –

    “इन दोनों बिल के पैसे मिलाकर राहुल को दे दीजिए, ”उनकी बात जैसे ही खत्म हुई थी तभी मैंने उनकी तरफ देखते हुए उनसे तुरंत कहा –“नहीं-नहीं, अभी रहने दीजिए। मुझे जब ज़रूरत होगी, मैं खुद ले लूँगा, अभी तो मैं आपके घर पर ही हूँ, और यहाँ रहते हुए भला मुझे पैसों की क्या आवश्यकता होगी, ”इधर रात भी गहरी होने लगी थी।

   तभी मैंने सिंह साहब और माताजी से आज्ञा लेकर कहा –“अगर आप लोगों को रात में किसी भी चीज़ की आवश्यकता हो तो आप लोग मुझे बेझिझक फ़ोन कर लीजिएगा, वरना तो मैं सुबह आ ही जाऊँगा।

    ”सिंह साहब से इतना के पश्चात मैं अपने घर की तरफ़ चल पड़ा।---अगली सुबह मेरी नींद थोड़ी देर से खुली। दीवार पर टँगी घड़ी पर नज़र डाली तो सुबह के साढ़े छह बजे थे। मुझे तुरंत याद आया कि मुझे सिंह साहब के यहाँ भी जाना है। यह सोचते हुए मैंने एक सिगरेट जलाई। (अरे हाँ! मैं बताना भूल गया था कि दिनभर में मैं चार सिगरेट पिया करता हूँ और किसी भी प्रकार से तंबाकू का इस्तेमाल स्वास्थ्य एवं समाज के लिए हानिकारक होता है, धूम्रपान से दूर रहें इव स्वस्थ रहें।)

       इसके बाद किचन से एक कप ब्लैक कॉफ़ी बनाई और बरामदे में बैठकर सिगरेट और कॉफ़ी का अपनी नजर में लुत्फ लेने लगा, तभी मेरे मन में अनायास ही ख्याल आया – परसों अंतिम संस्कार के दिन यहां कितनी भीड़ थी, और कितने लोग उमड़ पड़े थे, और सभी बड़ी आत्मीयता से सिंह साहब को और परिवार के सदस्यों को ढाढ़स बंधा रहे थे, जैसे वे सब भी सिंह साहब के परिवार के ही सदस्य हों, लेकिन कल ?

      दिन भर कोई झाँकने तक नहीं आया, और मीडिया वाले भी उस दिन ऐसे रिपोर्टिंग कर रहे थे मानो उनकी कवरेज से भगवान खुद आकर सिंह साहब के परिवार का दुख हर लेंगे,  लेकिन दो दिन बीतते बीतते सभी ग़ायब।

     इन्हीं सब खयालों में उलझते हुए मैंने मन ही मन सोचा –“कि इस देश में किसी व्यक्ति को किसी की समस्या से कोई मतलब ही नहीं है,  चाहे कोई उनके लिए अपनी जान ही क्यों न दे दे।

  ”यह सब सोचने के बाद मैं उठकर बाथरूम की ओर चला गया, करीब सवा सात बजे मैं तैयार होकर सिंह साहब के घर पहुँचा, मुझे देखते ही वे बोले –“आओ बेटा, आओ, मैं और पार्वती अभी तुम्हारे ही बारे में बात कर रहे थे।

      ”तभी बंशी ठाकुर जी भी आ पहुँचे और फिर मैं दोनों को अपनी गाड़ी में बैठाकर घाट की ओर चल पड़ा, रास्ते में सिंह साहब अपने पुत्र के किस्से सुनाते रहे,  जैसे-जैसे वे बताते जाते, उनकी आवाज धीमी होती जातीं।

    कुछ ही देर बाद हम घाट पहुँच गए,

     पंडित जी पहले से ही वहाँ मौजूद थे,  उन्होंने अस्थि-संचयन की क्रिया प्रारंभ करवाई,  घाट से है लोगों को लौटते-लौटते लगभग ग्यारह बज गए और घर पहुँचने पर देखा कि पहले से ही दो व्यक्ति वहाँ उपस्थित हैं, सिंह साहब उनका परिचय करवाते हुए कहा –“ये ठाकुर राममनोहर सिंह हैं, और ये बलभद्र।

     ये ऋचा के पिताजी और भाई हैं, ”फिर उन्होंने मेरा परिचय भी उन दोनों से करवा दिया, थोड़ी ही देर पश्चात ऋचा जी उन लोगों के लिए चाय और बिस्कुट लेकर आई।

      लेकिन उन्होंने लेने से मना कर दिया और बोले –“सिंह साहब, आपके घर में तो छूत लगा हुआ है, और हम लोग छूत लगे घर का अन्न-जल ग्रहण नहीं कर सकते, ”यह सुनकर सिंह साहब और ऋचा दोनों असमंजस की स्थिति में पड़ गए।


क्रमशः…---