दयाल कहता है ----
दयाल :- ठिक है आप लोग शांत हो जाओ मैं जाकर मलिक से कहता हूं।
इतना बोलकर दयाल दक्षराज के पास चला जाता है।
इधर एकांश वर्शाली से उत्सुकता से पुछता है ।
एकांश :- वर्शाली तुम किसी शक्ति के बारे में बोल रही थी ना। बताओ ना क्या है वो शक्ति जो तुम परियों को यहां आके मिलता है ?
वर्शाली कहती है----
वर्शाली : - हाँ एकांश जी बताती हूं।
वर्शाली एकांश का हाथ पकड़ कर कमरे से बाहर ले कर आती है और कहती है---
वर्शाली :- देखिये एकांश जी इस महल को।
वर्शाली :- देखिए एकांश जी इस महल में हम परियों
के लिए अलग अलग कक्ष बनाया गया है। जहां पर परी जोड़ा अपने साथी के साथ जन्माष्टमी की रात को
विश्राम और संभोग करता है और फिर झरने के पानी से स्नान करते हैं। ताकि सब जोड़ी की शक्तियों में वृद्धि हो सके। झरने के पानी से नहाने से शक्ति मिलती है? जब स्वर्ग से आने वाली अमृत की किरण झरने पर आकार मिलती है तब परी जोड़ा इस झरना
के पानी से स्नान करता है। जिनसे उसके शक्ति में वृद्धि होती है और वो युवान बने रहते हैं।
एकांश :- मतलब यहाँ पर सिर्फ जन्माष्टमी पर जिस समय स्वर्ग की अमृत किरण इस झरने पर पड़ी है तब ऐसा हो सकता है। है ना..??
वर्शाली : - हां एकांश जी अपने सत्य कहा।
एकांश :- तो क्या यहां पर सिर्फ पा़रियां ही नहा सकती है या कोई और भी।
वर्षाली :- यहाँ पर सभी स्नान कर सकते हैं। पर ये जल उसी को शक्ति देती है जो अपने साथी के साथ
ही इस झरने में स्नान करे।
एकांश :- मतलब एक लड़का और एक लड़की अगर एक साथ है तो ऐसा हो सकता है।
वर्शाली: - नहीं एकांश जी .. अगर कोई लड़का और लड़की जिसके मन में एक दुसरे के प्रति प्रेम ना हो फिर भी झरने में स्नान करता है तो उसे कोई फल प्राप्त नहीं होता उल्टा उससे इसका भयंकर श्राप भोगना पड़ता है। जब दोनो के मन में एक दुसरे प्रति प्रेम हो केवल वही इस झरने में स्नान कर सकता है। केवल प्रेमी जोड़ा को ही झरने के जल का आशीर्वाद मिलता है।
एकांश :- बाप रे इतना बड़ा रहस्य छुपा है, झरने के पानी में। पर वर्शाली तुमने अभी जो कहा के जिसके मन में प्रेम ना हो वो अगर यहाँ वही ले तो उसका श्राप भोगना पड़ता है। पर वो क्या है..?
वर्शाली :- ये जल जीवन देता है, युवान देती है पर वही इसके विपरीत ये जल श्राप में भायंकर पिड़ा देती है एकांश जी ।
.वर्शाली धीरे से कहती है----
वर्शाली :- जिसे एकांश नही सुन पाता है और ये पिड़ा
बहुत ही कष्ट दायी होती है एकांश जी और वो पिड़ा अब मेरी बहन भोग रही है और वो भी किसी मानव के कारण।
एकांश :- तब तो तुम्हारे पास भी बहुत सारी शक्ति है वर्शाली । पर वो कौन सी शक्ति है जिनसे तुम परियां यहां बड़ाने के लिए आती हो।
वर्शाली :- बस आप इतना जान लो के हमारी जो शक्ती है वो शक्ति दिव्य है एकांश जी , हम इन शक्तिया़ों से कुछ भी कर सकते हैं।
एकांश :- क्या तुम मुर्दा इंसान को जिंदा कर सकती हो ? ?
वर्शाली: - नहीं एकांश जी हम परियां प्रकृति के बनाए नियम को नहीं तोड़ सकते क्योंकि अगर हमने ऐसा कर दिया तो प्रकृति हमसे नाराज हो जाएगा और जो अलौकिक शक्ति हमें प्रकृति से मिलती है वो मिलना बंद हो जाएगा।
एकांश :- हे भगवान इतना सस्पेंस तो मैंने फिल्म में भी नहीं देखी।
वर्शाली एकांश से पुछती है :- ये फिल्म क्या है एकांश जी..?
एकांश कुछ दैर वर्शाली को एक तक देखता रहता है और सोचता है ।
एकांश :- अब इससे कैसे समझाऊं के फिल्म क्या होती है ।
एकांश अपने सर ख़ुजाते हुए कहता है---
एकांश :- अरे यार वो क्या कहते हैं।
वर्शाली फिर एकांश से पुछती है----
वर्शाली: - बताइये ना एकांश जी क्या है फिल्म का अर्थ।
एकांश :- चलचित्र..!
वर्शाली :- चलचित्र का अर्थ..! चित्र चलता है क्या..?
एकांश :- हां बस ऐसा ही समझलो ।
वर्शाली हैरानी से पुछता है---
वर्शाली :- चित्र अपने आप कैसे चलता है। पर हमारे
लोक में तो ऐसी कोई माया नहीं है जिससे कोई चित्र अपने आप चलने लगते हैं।
एकांश अपने सर पर हाथ कर कहता है---
एकांश :- हे भगवान ये मेरे मुह से क्या निकल गया।.
वर्शाली एकांश से ज़िद करने लगती हैं---
वर्शाली :- बताइये ना एकांश जी कहा है ऐसी अनोखी चलचित्र। मुझे भी चाहिए ऐसी अनोखी वस्तु ।
एकांश वर्शाली को समझाता कहता है----
एकांश :- वर्शाली ऐसी चिज हर जगह नहीं होती है उसके लिए एक विषेश जगह होती है। जहां जा कर ही
हम चलचित्र देख सकते हैं।
वर्षाली एकांश से ज़िद करके कहती है----
वर्शाली :- मुझे चलचित्र देखना है एकांश जी। चलिये ना !
एकांश :- ठीक है मैं तुम्हें लेकर जाउंगा पर अभी नहीं जब कोई अच्छी फिल्म आएगी तब।
वर्शाली खुश होती है कहते हैं---
वर्शाली :- ठीक है एकांश जी।
उधर दक्षराज अपने कामरे में बैठा था। जहां दयाल आकार दक्षराज से कहता है---
दयाल :- मालिक वो गांव वाले सब आए हुए हैं और
आपसे मिलने की ज़िद कर रहे हैं।
दक्षराज :- किस लिए..? क्या काम है।
दयाल :- वो तो मैंरे बहुत पूछने पर भी उन्होनें नही कहा वे कह रहे हैं के हम सिर्फ मालिक को ही बताएंगे।
दक्षराज एक गहरी सांस लेता है और कहता है---
दक्षराज :- तुम तो जानते हो दयाल के में क्यों सबके सामने नहीं जाता। जबतक ये श्राप है। तब तक मैं हवेली के बाहर सबके सामने नहीं जा सकता।
दक्षराज दयाल से पुछता है----
दक्षराज :- क्या अघोरी बाबा का कोई संदेश आया दयाल?
दयाल अपने सर को झुका के कहता है----
दयाल :- नहीं मालिक ।
दक्षराज गुस्से से कहता है---
दक्षराज :- ओह...! ये बाबा को तो मेरी कोई चिंता ही नहीं है। मैंने आज तक उनके लिए क्या कुछ नहीं किया पर उन्हे..उन्हे तो मेरी कोई फिकर ही नहीं है।
दक्षराज दयाल से पुछता है---
दक्षराज :- आलोक कहा है ?
दयाल :- पता नहीं मलिक आलोक बाबा तो कल पार्टी
से घर आए ही नहीं है।
दक्षराज :- ठिक है चलो अब मुझे ही गांव वालों से मिलना पड़ेगा।
इतना बोलकर दक्षराज और दयाल हवेली से बाहर जाने लगता है। जहां गांव वाले उनका बहार इंतजार कर रहा था।
इधर एकांश वर्शाली से एक और सवाल पुछता है।
एकांश :- अच्छा वर्शाली ! क्या कोई परी और एक इंसान झरने में स्नान कर सकता है ?
वर्शाली: - हां कर सकती है। पर ऐसा होना संभव नहीं है।
एकांश पुछता है---
एकांश :- क्यूं वर्शाली ? ऐसा क्यों नहीं हो सकता ?
वर्शाली कहती हैं---
वर्शाली :- पुरुष मानव का सिर्फ मानव कन्या से ही प्रेम हो सकता है। किसी देत्य, परी, या किसी अन्य जाति से नहीं।
एकांश वर्शाली के नजदिक जा कर कहता है---
एकांश : - क्यूं वर्शाली । क्या प्रेम का कोई नियम या जात पात होता है। क्या प्रेम सिर्फ एक जाति का सीमा
है।
To be continue.....356