"देखो भाई, इस देश में बेईमान को जेल भेजने का रिवाज पुराना हो गया है, अब हम ईमानदार को विदा करने की परंपरा डाल रहे हैं।"
यह शब्द हमारे दफ्तर के बड़े बाबू, खन्ना जी के थे। अवसर था—मिश्र जी की विदाई का। मिश्र जी, जो पिछले तीस सालों से इसी दफ्तर की एक ऐसी कुर्सी पर चिपके थे, जिसे हिलाने की हिम्मत तो दूर, साफ करने की जहमत भी किसी ने नहीं उठाई थी। मिश्र जी 'ईमानदार' थे। और ईमानदारी इस दौर में वैसी ही बीमारी मानी जाती है, जैसे किसी अच्छे-भले आदमी को बीच बाजार में दौरे पड़ने लगें।
विदाई समारोह में पाँच लोग मुख्य भूमिका में थे। पहले मिश्र जी खुद, जो अपनी फटी हुई बनियान को कोट के नीचे छिपाने की नाकाम कोशिश कर रहे थे। दूसरे खन्ना जी, जो भ्रष्टाचार के इतने पुराने खिलाड़ी थे कि उनके चेहरे की झुर्रियों में भी रिश्वत के पैसे छिप सकते थे। तीसरी थी सुधा, दफ्तर की नई क्लर्क, जो अभी-अभी आदर्शों का झोला लेकर आई थी। चौथे थे तिवारी जी, जो हर बात में धर्म और पाप-पुण्य ले आते थे, बशर्ते चंदे की रसीद उनके हाथ में हो। और पांचवें थे वर्मा जी, जो केवल समोसे खाने और दूसरों की बुराई करने के लिए पैदा हुए थे।
खन्ना जी ने गला साफ किया। "साथियों, मिश्र जी जा रहे हैं। इन्होंने कभी एक पैसा इधर-उधर नहीं किया। इनके घर की छत टपकती रही, पर इन्होंने दफ्तर की फाइलों पर कभी पानी नहीं गिरने दिया। ऐसी मूर्खता... मेरा मतलब है, ऐसी महानता आजकल कहाँ दिखती है?"
दफ्तर के हॉल में ठहाका गूँजा। मिश्र जी ने नीची नजरें कर लीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि यह तारीफ है या गाली। उनके मन में द्वंद चल रहा था—'तीस साल! तीस साल में मैंने क्या कमाया? एक टूटी साइकिल और घुटनों का दर्द? खन्ना जी ने दो बंगले बना लिए, और मैं आज भी बस के पास के लिए लाइन में लगता हूँ।'
सुधा ने धीरे से कहा, "सर, आप हम सबके लिए प्रेरणा हैं।"
वर्मा जी ने समोसे की चटनी चाटते हुए कटाक्ष किया, "प्रेरणा का क्या करेंगे बिटिया? प्रेरणा से पेट नहीं भरता। मिश्र जी ने ईमानदारी पाली, अब रिटायरमेंट के बाद यह ईमानदारी इन्हें पाल ले तो जानें। सुना है लड़का प्राइवेट नौकरी में धक्के खा रहा है, क्योंकि मिश्र जी ने किसी को सिफारिश के लिए फोन तक नहीं किया।"
मिश्र जी के भीतर एक ज्वालामुखी धधक उठा। उन्हें याद आया वह दिन, जब उनके साले ने एक टेंडर पास कराने के लिए पांच लाख की पेशकश की थी। तब मिश्र जी ने 'आत्मा की आवाज' सुनी थी। आज उन्हें लग रहा था कि उनकी आत्मा शायद उस दिन नशे में थी। साला आज ऑडी में घूमता है और मिश्र जी की पत्नी आज भी आटे के डिब्बे से पैसे निकालकर घर चलाती है।
तिवारी जी बीच में कूदे, "मिश्र जी, संतोष धन सबसे बड़ा धन है। गीता में लिखा है..."
"गीता में यह नहीं लिखा तिवारी जी कि बच्चों की स्कूल फीस संतोष से भरी जा सकती है," मिश्र जी अचानक बोल पड़े। उनकी आवाज में बरसों की दबी हुई लाचारी और गुस्सा एक साथ बाहर आया। पूरा हॉल सन्न रह गया।
खन्ना जी ने माहौल को हल्का करने के लिए कहा, "अरे मिश्र जी, भावुक मत होइए। चलिए, अब उपहार की बारी है।"
उपहार में मिश्र जी को एक 'दीवार घड़ी' दी गई। व्यंग्य देखिए, जिस आदमी ने पूरी जिंदगी समय की पाबंदी और नियम कायदों में गुजार दी, उसे अंत में समय देखने के लिए ही एक मशीन थमा दी गई। मानो समाज कह रहा हो—'लो, अब खाली बैठकर अपना बचा-कुचा समय गिनते रहना।'
वर्मा जी फुसफुसाए, "घड़ी भी सेल वाली कंपनी की है। खन्ना जी ने फंड से पैसे बचाकर सस्ती वाली उठवाई है।"
मिश्र जी ने घड़ी हाथ में ली। उन्हें लगा जैसे उन्होंने कोई पत्थर पकड़ लिया हो। उनके मन का बोझ बढ़ता जा रहा था। उन्हें अपनी पत्नी का चेहरा याद आया, जिसने पिछले पांच साल से नई साड़ी नहीं ली थी। उन्हें अपनी बेटी याद आई, जिसकी शादी सिर्फ इसलिए रुकी हुई थी क्योंकि मिश्र जी के पास 'ऊपर की कमाई' का कोई जरिया नहीं था।
"बोलिए मिश्र जी, दो शब्द कहिए," खन्ना जी ने आग्रह किया।
मिश्र जी मंच पर खड़े हुए। उनके सामने वही लोग थे जो रोज उनके पीछे उनका मजाक उड़ाते थे। जो उन्हें 'पुराने जमाने का ढर्रा' कहते थे। जो उनकी फाइलों में कमियां निकालकर इसलिए परेशान करते थे ताकि वे भी 'लाइन' पर आ जाएं।
मिश्र जी ने बोलना शुरू किया, "साथियों, आज मैं जा रहा हूँ। लोग कहते हैं मैं ईमानदार हूँ। पर सच कहूँ? मैं ईमानदार नहीं था, मैं डरा हुआ था। मैं डरता था समाज से, मैं डरता था कानून से, और सबसे ज्यादा मैं डरता था अपनी खुद की नजरों से गिरने से। लेकिन आज इस विदाई समारोह को देखकर मुझे लग रहा है कि मैंने गलती की। ईमानदारी एक ऐसा गहना है जिसे पहनकर आप सिर्फ नुमाइश कर सकते हैं, उसे बेचकर रोटी नहीं खरीद सकते।"
सुधा की आँखों में आँसू थे, पर खन्ना जी मुस्कुरा रहे थे। खन्ना जी की मुस्कुराहट में एक विजेता का भाव था। वह जानते थे कि कल से मिश्र जी की कुर्सी पर जो नया लड़का आएगा, उसे उन्होंने पहले ही 'सेट' कर लिया है।
"खन्ना जी," मिश्र जी ने सीधे उनकी आँखों में देखकर कहा, "आप जीत गए। आपकी दुनिया जीत गई। मेरी ईमानदारी मेरी हार है। मैं अपनी बेटी को दहेज नहीं दे पाया, अपने बेटे को करियर नहीं दे पाया। मैंने सिर्फ खुद को एक झूठा गौरव दिया। आज जब मैं घर जाऊँगा, तो यह घड़ी मुझे बताएगी कि मैंने अपनी जिंदगी के कितने घंटे व्यर्थ कर दिए।"
मिश्र जी ने घड़ी मेज पर रख दी और बिना अपना थैला उठाए दफ्तर के बाहर निकल गए।
पीछे हॉल में सन्नाटा था। फिर अचानक वर्मा जी बोले, "अरे, ये तो घड़ी यहीं छोड़ गए! अब इसका क्या होगा?"
खन्ना जी ने चाय का घूँट भरा और बोले, "क्या होगा? अगले महीने शर्मा जी रिटायर हो रहे हैं, उन्हीं को दे देंगे। आखिर बजट भी तो बचाना है!"
बाहर सड़क पर मिश्र जी पैदल चल रहे थे। धूप तेज थी। उनकी पुरानी चप्पल का अंगूठा बाहर निकल आया था। उन्हें महसूस हुआ कि ईमानदारी का बोझ उतरते ही उनका शरीर हल्का हो गया है, पर मन इतना भारी है कि उठाना मुश्किल है। उन्होंने पीछे मुड़कर दफ्तर की बिल्डिंग को देखा, जो किसी आदमखोर राक्षस की तरह खड़ी थी, जो हर साल एक नए 'ईमानदार' को निगल जाती थी और 'बेईमानों' को पाल-पोसकर बड़ा करती थी।
तभी एक लग्जरी कार उनके पास रुकी। शीशा नीचे हुआ। अंदर वही साला बैठा था।
"अरे जीजा जी! आज तो रिटायर हो गए? चलिए बैठिए, घर छोड़ देता हूँ। अब तो मान जाइए, मेरे रियल एस्टेट के धंधे में आपकी 'ईमानदारी' का ठप्पा लग जाए तो करोड़ों का हेरफेर आसानी से हो जाएगा।"
मिश्र जी ने कार की ठंडी हवा को महसूस किया। उन्होंने अपनी फटी चप्पल देखी, फिर साले के सोने की चेन। एक पल के लिए उनकी अंतरात्मा ने फिर से सिर उठाया, पर इस बार भूख और लाचारी ने उसे दबा दिया।
मिश्र जी मुस्कुराए—एक ऐसी मुस्कुराहट जिसमें दर्द भी था और आत्मसमर्पण भी।
"बैठता हूँ भाई... अब समय वैसे भी बहुत है मेरे पास।"
गाड़ी आगे बढ़ गई। पीछे धूल उड़ रही थी और दफ्तर की छत पर लगा तिरंगा शायद हवा के झोंके से नहीं, शर्म से हिल रहा था।
समाप्त....🙏