अधूरी किताब का आखिरी पन्ना
भाग 1: पहाड़ों की वह धुंधली सुबह
शिमला की वादियों में आज भी वही पुरानी महक थी—देवदार के पेड़ों की ताज़गी और मिट्टी की सौंधी खुशबू। आर्यन ने अपनी गाड़ी मॉल रोड के पास रोकी। दस साल बाद वह इस शहर में वापस आया था। इन दस सालों में बहुत कुछ बदल गया था, सिवाय उसके दिल के एक कोने के, जहाँ आज भी 'अनन्या' नाम की एक याद सुरक्षित थी।
आर्यन अब एक सफल लेखक बन चुका था, लेकिन उसकी सबसे बड़ी कामयाबी—उसका पहला उपन्यास—अधूरा था। पब्लिशर्स कहते थे कि कहानी का अंत सुखांत (Happy Ending) होना चाहिए, लेकिन आर्यन का मानना था कि हर प्रेम कहानी का अंत 'मिलन' नहीं होता।
उसने अपने कोट के कॉलर ऊपर किए और उस पुराने कैफे की ओर चल पड़ा, जहाँ वह और अनन्या घंटों बैठकर कॉफी पिया करते थे। 'द विंटेज कैफे'।
भाग 2: यादों का झरोखा
कैफे का दरवाज़ा खुलते ही एक छोटी सी घंटी बजी। वह आवाज़ आर्यन को सीधे कॉलेज के दिनों में ले गई।
अनन्या... वह कॉलेज की सबसे मेधावी और हँसमुख लड़की थी। आर्यन थोड़ा शांत और अंतर्मुखी था। उनकी दोस्ती एक लाइब्रेरी में हुई थी, जहाँ दोनों एक ही किताब—'द ओल्ड मैन एंड द सी'—के लिए लड़ पड़े थे।
"यह किताब मुझे पहले मिली थी," अनन्या ने शरारत भरी आँखों से कहा था।
"लेकिन मैं इसे पिछले तीन दिनों से ढूँढ रहा हूँ," आर्यन ने तर्क दिया था।
अंत में समझौता हुआ कि दोनों साथ बैठकर किताब पढ़ेंगे। उस एक किताब ने दो अनजानों को एक-दूसरे के करीब ला दिया। उनकी बातचीत किताबों से शुरू होकर सपनों, डर और फिर एक-दूसरे की पसंद-नापसंद तक पहुँच गई।
शिमला की सर्द शामों में वे हाथ पकड़कर चलते थे। अनन्या अक्सर कहती थी, "आर्यन, अगर कभी हम अलग हो गए, तो क्या तुम मुझे ढूँढोगे?"
आर्यन हमेशा उसका हाथ और कसकर पकड़ लेता और कहता, "तुम खोओगी, तब तो ढूँढूँगा न? तुम तो मेरी रूह में बसी हो।"
भाग 3: बिछड़ने की वह शाम
लेकिन तक़दीर को कुछ और ही मंज़ूर था। अनन्या के पिता का तबादला अचानक विदेश हो गया। उन दिनों सोशल मीडिया आज की तरह हावी नहीं था। गलतफहमियाँ और लंबी दूरियाँ रिश्तों की सबसे बड़ी दुश्मन होती हैं। अनन्या का आखिरी खत आर्यन तक कभी पहुँचा ही नहीं, और आर्यन को लगा कि अनन्या उसे भूल गई है।
वक्त बीतता गया। आर्यन ने अपनी तन्हाई को शब्दों में पिरोना शुरू किया। वह मशहूर तो हुआ, पर उसके अंदर का खालीपन कभी नहीं भरा।
भाग 4: एक अप्रत्याशित मुलाकात
कैफे के कोने वाली मेज पर एक महिला बैठी थी, जिसकी पीठ आर्यन की तरफ थी। उसने पीले रंग का वही स्कार्फ पहना था जो आर्यन ने अनन्या को उसके बीसवें जन्मदिन पर दिया था। आर्यन के पैर जैसे ज़मीन से चिपक गए। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा।
"अनन्या?" उसके गले से एक धीमी आवाज़ निकली।
वह महिला धीरे से मुड़ी। वही आँखें, वही सादगी, बस चेहरे पर वक्त की कुछ लकीरें और आँखों में एक ठहराव था। अनन्या की आँखों में भी वही हैरानी थी जो आर्यन की आँखों में थी।
"आर्यन... तुम यहाँ?" अनन्या की आवाज़ में एक कंपकंपाहट थी।
दोनों कुछ देर चुपचाप एक-दूसरे को देखते रहे। दस साल की खामोशी उन चंद सेकंडों में चीख रही थी। वे पास वाली मेज पर बैठ गए। कॉफी के दो प्याले आए, लेकिन पीने की सुध किसी को नहीं थी।
भाग 5: शिकायतों का पुलिंदा
"तुमने कभी संपर्क करने की कोशिश क्यों नहीं की?" अनन्या ने अपनी पलकें झुकाते हुए पूछा।
"मैंने किया था, अनन्या। मैंने तुम्हें दर्जनों खत लिखे, लेकिन कोई जवाब नहीं आया। फिर सुना कि तुम्हारी शादी कहीं तय हो गई है," आर्यन ने कड़वाहट और दर्द के मिले-जुले स्वर में कहा।
अनन्या की आँखों से एक आँसू टपक कर मेज पर गिर गया। "शादी? आर्यन, मैंने कभी शादी नहीं की। पापा का एक्सीडेंट हो गया था और मैं सब कुछ भूलकर उनकी सेवा में लग गई। मैंने तुम्हें खत लिखा था कि मैं इंतज़ार करूँगी, पर शायद वह तुम तक नहीं पहुँचा।"
आर्यन सन्न रह गया। जिसे वह बेवफाई समझ रहा था, वह तो किस्मत का एक क्रूर मज़ाक था।
भाग 6: अधूरे पन्ने का सच
आर्यन ने अपना बैग खोला और अपनी डायरी निकाली। उसने वह अधूरा उपन्यास अनन्या के सामने रख दिया।
"इसका नाम 'अधूरी किताब का आखिरी पन्ना' है। मैं इसका अंत नहीं लिख पा रहा था, क्योंकि मेरी कहानी का अंत तुम थी, और तुम मेरे पास नहीं थी।"
अनन्या ने कांपते हाथों से डायरी के पन्ने पलटे। उसमें सिर्फ कहानियाँ नहीं, बल्कि अनन्या के लिए आर्यन का बेपनाह प्यार और विरह का दर्द लिखा था। हर पन्ने पर अनन्या का ज़िक्र था।
"आर्यन, हम बहुत वक्त खो चुके हैं," अनन्या ने रुंधे हुए गले से कहा।
"वक्त खोया है अनन्या, एहसास नहीं। आज भी जब मैं लिखता हूँ, तो कलम मेरी होती है पर शब्द तुम्हारे होते हैं।"
भाग 7: एक नई शुरुआत
बाहर बर्फबारी शुरू हो गई थी। शिमला की सड़कें सफेद चादर से ढकने लगी थीं। कैफे के अंदर की गर्माहट और उन दोनों के दिलों की तपन ने सालों की बर्फ पिघला दी थी।
आर्यन ने अनन्या का हाथ अपने हाथों में लिया। "क्या तुम इस किताब का आखिरी पन्ना मेरे साथ लिखना चाहोगी? इस बार अंत सुखांत होगा।"
अनन्या ने मुस्कुराते हुए अपना सिर आर्यन के कंधे पर रख दिया। "हाँ आर्यन, इस बार हम अपनी कहानी खुद लिखेंगे, जहाँ कोई गलतफहमी नहीं, सिर्फ हम होंगे।"
उपसंहार
उस रात आर्यन ने अपनी डायरी का आखिरी पन्ना भरा। उसने लिखा—
"प्यार कभी खत्म नहीं होता। वह बस ठहर जाता है, सही वक्त और सही इंसान के इंतज़ार में। आज मेरी किताब पूरी हो गई, और मेरी ज़िंदगी भी।"
अगले दिन के अखबार में खबर थी कि मशहूर लेखक आर्यन की नई किताब 'मुकम्मल' जल्द ही बाज़ार में आने वाली है। और इस बार, उस किताब का समर्पण (Dedication) था— "उस अनन्या के लिए, जो कभी गई ही नहीं थी।"