वक़्त जैसे एक पल के लिए ठहर गया था।
रुशाली और मयूर सर, अब भी वैसे ही खड़े थे— इतने क़रीब कि एक साँस की दूरी भी ज़्यादा लग रही थी।
रुशाली का हाथ अब भी मयूर सर के सीने पर था। उस सीने पर जिसके भीतर दिल आज भी उसी के लिए धड़क रहा था।
और मयूर सर का हाथ रुशाली की कमर पर— अनजाने में नहीं, बल्कि उसी हक़ के साथ
जो कभी कहा नहीं गया था।
दोनों कुछ नहीं बोल रहे थे।
लेकिन उनकी आँखें… उनकी आँखें एक-दूसरे से बातें कर रही थीं।
यादों का सैलाब — रुशाली के दिल में
रुशाली की आँखों के सामने
सारे पल
एक-एक करके उभरने लगे।
वो पहला दिन— जब उसने अस्पताल में पहली बार मयूर सर को देखा था।
आत्मविश्वास से भरी चाल,
सरल सा चेहरा,
आँखों में अजीब सी गहराई।
उस पल उसे बस इतना लगा था — “ये सबसे अलग हैं…”
और फिर वो दिन जब उसे पता चला कि वो मयूर सर के अंडर काम करने वाली है।
पहली बार उनके सामने असिस्टेंट बनकर खड़ी थी।
घबराई हुई, पर आँखों में चमक।
मयूर सर ने तब कहा था—
“Relax…You'll learn fast , just stay observant and confident.”
बस वही एक लाइन रुशाली के दिल को छू गई थी।
मयूर सर की यादें — उतनी ही गहरी
मयूर सर की आँखों में भी अतीत ज़िंदा हो उठा।
उन्हें याद आया जब रुशाली पहली बार उनके केबिन में आई थी।
फाइल को दोनों हाथों से पकड़े हुए।
उन्हें याद आया - कैसे वो धीरे-धीरे काम सीखने लगी।
कैसे वो हर छोटी बात नोट करती।
कैसे उनकी थकान बिना पूछे समझ लेती।
और कैसे, कब दोस्ती हुई और कब आदत—उन्हें खुद पता नहीं चला।
साथ के पल
साथ लंच…
कॉफी के कप…
राउंड के दौरान
हल्की-फुल्की बातें।
रुशाली का
उन्हें “अकड़ू” नाम देना।
“एक बार रुशाली को मयूर सर ने थोड़ा कड़क आवाज में कुछ बोल दिया तबसे रुशाली ने मयूर सर को अकडू नाम दे दिया…”
और उस मयूर सर का जवाब —
“हा शायद तुम सही कह रही हो…” और फिर हंस पड़े!
Doctor’s Day और वो सफ़ेद गुलाब
रुशाली को याद आया
Doctor’s Day।
वो उनके केबिन में आई थी हाथ में सफ़ेद गुलाब।
“Happy Doctor’s Day, sir…”
मयूर सर ने गुलाब लिया था और हल्के से कहा था—
“Thank you.”
पर वो नहीं जानते थे कि उस गुलाब के साथ रुशाली ने
अपना दिल भी दे दिया था।
वो Birthday Card
मयूर सर की आँखें भर आईं।
वो कार्ड— जिसमें रुशाली ने अपने दिल की बात
लिख दी थी।
कि वो उन्हें पहली नज़र से चाहती है।
कि ये एहसास नया नहीं है।
मयूर सर ने उस कार्ड को आज भी संभालकर रखा था।
और फिर वो जन्मदिन…
रुशाली को याद आया अपना जन्मदिन।
मयूर सर उसे लंच पर ले गए थे।
वो दिन
वो पल
उसके लिए
सबसे खास था।
और फिर… उसी दिन
मयूर सर ने कहा था—
"रुशाली अगले हफ्ते मेरी सगाई है !"
वो एक वाक्य उसकी पूरी दुनिया तोड़ गया था।
आँखों की खामोश बातें — अब
इन सारी यादों के बीच
रुशाली और मयूर सर
एक-दूसरे की आँखों में देख रहे थे।
रुशाली की आँखें कह रही थीं—
"आपने कभी नहीं कहा मुझसे की आप मुझे चाहते है...!"
"पर मुझे पता था कि आप मुझे चाहते थे!"
उसकी आँखों में सवाल थे, शिकायत नहीं।
"फिर आपने उस वक्त मुझसे कुछ क्यों नहीं कहा?"
"क्यूं आपने उस अनजान लड़की से शादी के लिए हा कर दी ?"
"आपने एक बार भी मेरे बारे में क्यूं नहीं सोचा?"
मयूर सर की आँखों का जवाब—
उनकी आँखें भीग गईं।
"कैसे बताता, रुशाली...."
"उस वक्त मेरी चाहत से ज्यादा मेरा परिवार जरूरी था..."
"मुझे लगा था अगर में बोल पड़ा तो सब खो दूंगा ...."
“तुम्हे भी और मेरे परिवार को भी...!" इस लिए में चुप रहा!
रुशाली की खामोश सच्चाई
रुशाली की आँखें अब नरम थीं।
"में समझ गई थी...
इस लिए में बिना बताए चली गई थी ...."
"क्योंकि में जानती हु कि आपके लिए आपका परिवार सबसे पहले है... आप बहुत प्यार करते हो अपने परिवार से...
और इन्हीं आंखों की बात में दोनों की आँखें भर आई थी, मयूर सर चाहते थे कि रुशाली की आंखों के आंसू पोछे लेकिन...
वक़्त की दस्तक
तभी— बेटा रुशाली हल्दी का थाल!....
प्रिशा की माँ की आवाज़ आई।
रुशाली, ख्यालों से बाहर आई।
जल्दी से आँसू पोंछे।
हल्दी का थाल उठाया और वहाँ से चली गई।
मयूर सर भी कुर्ता साफ़ करके हल्दी के फंक्शन में पहुँचे।
स्टेज पर रुशाली प्रिशा के बगल में खड़ी थी।
कुनाल ने कहा— "मयूर, में जिस स्पेशल person की बात कर रहा था... वो वहीं है - रुशाली....
“तू मिला उससे?” कुनाल ने पूछा।
मयूर सर ने धीरे से कहा— “Haan…”
“बात हुई?”
“नहीं…”
रुशाली प्रिशा को हल्दी लगाकर स्टेज से उतरी।
पीछे मुड़ी— तो मयूर सर सामने खड़े थे।
दिल ने कहा—
“कुछ तो बोलो, इतने समय बाद मयूर सर से मिली हो…”
पर दिमाग़ ने पाँच साल का दर्द याद दिला दिया।
रुशाली ने मयूर सर को अनदेखा किया
“कल मिलते है प्रिशा…”
और वो चली गई।
और सवाल…
क्या रूशाली नाराज़ थी? या डर गई थी?
क्या वो अब भी उसी दर्द में थी, जो पाँच साल पहले मिला था?
या फिर… उसे डर था कि अगर वो बोल पड़ी, तो खुद को संभाल नहीं पाएगी?
"कभी कभी हम किसी से इसलिए दूर हो जाते है
क्यूंकि पास आने का दर्द बर्दाश्त से बाहर होता है..."
"रिश्तों की कुछ कहानियां ऐसे ही मुकम्मल नहीं होती....
बस थोड़ी सी और हिम्मत मांगती है मुकम्मल होने के लिए....
मयूर सर वहीं खड़े थे…
और रूशाली दूर जा चुकी थी…
पर दिलों के बीच की दूरी
अब भी वैसी ही थी
जैसी पाँच साल पहले थी—
बस फर्क इतना था
कि अब दोनों जानते थे
कि वो आज भी
एक-दूसरे से अलग नहीं हो पाए हैं।
क्या रूशाली मयूर सर से नाराज़ है?
या वो खुद से लड़ रही है?
क्या मयूर सर इस बार चुप रहेंगे…
या पाँच साल की खामोशी तोड़ेंगे?
ये सब जानने के लिए पढ़िए —
Dil Ne Jise Chaha — Part 29