Gray shades in Hindi Short Stories by Dr Sandip Awasthi books and stories PDF | ग्रे शेड्स

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ग्रे शेड्स

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लगता है सब कुछ व्यर्थ है।क्योंकि सभी तरफ झूठ जीत रहा और सच हार रहा। सोशल साइट्स पर आप नहीं हैं तो मानो आपका अस्तित्व ही दुनिया में नहीं है। नहीं हूं मैं टेक्नोसेवी तो क्या मेरे सुख दुख,यार दोस्त, परिचित नहीं होंगे? लेकिन कुछ नहीं हुआ।अकेले घूमना,अकेले ही आना जाना होता रहा और कुछ महीने में ही मैं एकांतप्रिय बना दिया गया तकदीर के हाथों।

क्या इंसान कुछ बदल सकता है या फिर सब कुछ पूर्व निर्धारित है?उस ऊपर वाले के हाथों? 

     कुछ धन राशि इक्कठी हो गई थी तो यात्रा का प्लान बना और साथ ही अपनी नियति को बदलने की कोशिश। तब यह पता नहीं था कि इसका अंत कल्पना से परे होगा। दोनों तरफ चलने अथवा दोनों पहलू अक्सर हम आजमाते नहीं तो अफसोस रह जाता है कि "वैसा कर लेते तो शायद ऐसा नहीं होता।"। या उस राह चलते तो कुछ अच्छा होता। यह कोई नहीं सोचता कि जो हो रहा, घट रहा वही सबसे अच्छा है।

यात्रा हो या जरूरी कार्य सुधीर अकेला ही होता अक्सर। तो सामान बांधा और चल पड़े।घर से निकलते ही आप मुसाफिर हो जाते हो फिर न जाने कहां कहां से मुश्किलें आपको घेर लेती हैं। अनुभव से ट्रेन समय से एक घंटा पूर्व तैयार होकर रैपिडो से कैब बुलवाए। कैब वाले ने दस मिनट इसी में बिता दिए कि कैप्टेन ऑन द वे। भाड़ का कैप्टन ,वह भड़के जब देखा उसी ऐप पर की कैप्टन तो अभी भी वहीं का वहीं है। फिर फोन आया,कहां जाना है?स्टेशन । भाड़े से डबल लूंगा। "क्यों?तुम रेपिडो के नियम नहीं मानते?"  

"अरे यहां छोटे शहर में कौन रैपिड वेपिड आयेगा हमका देखने? दाम डबल लगेगा स्टेशन का।चलना हो तो बोलो सीएसएम मॉल पर ही खड़ा हूं।एक मिनिट में आ जाऊंगा।"

स्टेशन जाने का मार्जिनल समय कम हुआ था पर इतना भी नहीं कि यह एक साइड बैकफायर करने के बाद हम इसी को सिर चढ़ाएं। तुरंत सामने सड़क पर e रिक्शे पर निगाह गई ," ए रिक्शा ,रुको तो जरा।" कैब से आधी कीमत में स्टेशन पहुंच गए।

दोनों पहलू साथ रखने का एक सुखद परिणाम मिला। स्टेशन पहुंच प्लेटफॉर्म पर बैठ गए।क्योंकि यहां कई पहलू होने वाले थे। ट्रेन ही दो घंटे बाद लगनी थी।क्योंकि आगे जबलपुर से ही लेट आई थी।तो अब सफाई, धुलाई में दो घंटे तो लगेगे l इकलौती ही गाड़ी है ,तो इकलौते होने के सारे लाभ तो लेगी ही भले ही देर हो जाए। तो अपन ने कुछ देर किताब पढ़ी,जो अपने साथ हमेशा रहती हैं। कुछ देर बाक सोचा ग्यारह बजे जाएगी ट्रेन तो रात का खाना भी खा ही लेता हूं।

जब तक खाना खत्म हुआ ट्रेन लग गई। 

साइड लोअर थी थर्ड एसी में।यहां भी दोनों निर्णय काम आए,जिसे अनुभव भी कहते हैं। सेकंड एसी में पिछली बार यात्रा की तो भी साइड लोअर मिली।कोई अंतर नहीं। हां,अंदर मिली होती तो सेकंड एसी में तीन की जगह दो बर्थ होने से आराम होता।पर अकेले यात्री को रेलवे वेबसाइट साइड में ही खपाती है। जबकि किराया थर्ड से 700रुपए अधिक। तय जो किया उसी की परिणीति में थर्ड एसी और साइड लोअर। 

   ट्रेन में साफ बिस्तर लगाए और आराम से सो गए। अपन मोबाइल चिपकू किस्म के नहीं तो फोन डाला साइलेंट मोड पर और सो गए।

पर सोना आसान कहां?थर्ड एसी हो गया है जनरल बोगी जैसा।लगातार चे चै चे ...। बच्चे ऐसे कूद रहे मानो पहली बार ट्रेन में बैठे हो। उनके माता पिता निहाल जा रहे की हमारा बिट्टू,बबलू, सोनू खेलकूद रहा,भले ही सभी यात्रियों की नींद खराब हो रही हो। पर बोलेगा एक भी नहीं, पता नहीं क्यों हम अपनी ऐसी तैसी कराकर भले क्यों बनते हैं? 

मैं भी सोचता रहा कि कहूं या न कहूं? जब भी ऐसी उधेड़बुन होती है तो मैं हमेशा वह चुनता हूं जो करना नहीं चाहता। "अरे सोने का समय है बच्चों का शोर बंद करें।" कहते ही माता पिता बंधु सखा,उनके, मुझे ऐसे देखें मानो मैंने कोई गलत बात कह दी। " भैया, यह मेरे सिर पर जल रही लाइट भी ऑफ कर दें।"सामने फोन से चिपके युवा से मैंने कहा। थोड़ा शांत हुआ माहौल। फिर कोई नहीं बोला।

अब आराम से सोएंगे। 

अकेले जाने में मुझे हमेशा दिक्कत होती है।कोई अपना साथ हो तो मन लगता है नहीं तो तकलीफ होती है।

   तभी चाय वाला और बिरयानी वाला एक साथ ही प्रकट हुए। रात के पौने बारह बजे दोनों एसी के माहौल को अपनी हांक से खराब करते गए।

सुबह ट्रेन में आंख तो दो घंटे पहले ही खुल गई थी जब मैं साफ टायलेट में पांच बजे ही हो आया। फिर सो गया।अबकी से उज्जैन आया तो करीब साढ़े आठ बजे उठा।

"चाय,कॉफी,कटलेट,ब्रेड पकोड़ा" की आवाज सर्वत्र व्याप्त थी। मैं चुपचाप बाहर देखता रहा। कुछ देर बाद आराम से फ्रेश होकर मैंने अपने बैग में से स्टील की पांच सौ रुपए की मिल्टन की एक लीटर,आठ सौ मि.लीटर ही मानो,फ्लास्क निकाली। पैसे ज्यादा दिए पर चीज अच्छी थी।उसमें पानी अभी भी तेज गर्म था। टीबैग और सुगर पाउच उसी डब्बे में साइड में थे। अब चाय तैयार होनी थी सेकेंडों में। कप की चिंता नहीं क्योंकि फ्लास्क में एयरटाइट ढक्कन और उसके ऊपर कप जितना गहरा ढक्कन था,खूबसूरत ग्रे रंग का।उसी में गरम पानी,टीबैग,शुगर डाला और गरमा गरम ब्लेक टी,मुझे यही पसंद है,की चुस्की भरी।

आहा, क्या स्वाद क्या महक, मन तृप्त होने लगा...होले होले हर चुस्की के साथ मूड बनता गया। मैं बाहर देखता हुआ अगला लिखने का विषय तय करता चाय और बैग में रखे नमकीन बिस्किट का आनंद लेता रहा। अच्छी चाय आपका मूड,दिल और दिमाग खुशगवार बना देती है तो वहीं खराब चाय आपके दिन भर के मूड का सत्यानाश कर देती है,यह भी दो रास्तों,to be or not to be पर चलकर आया है।साफ कहूं तो अनेक बार मूड खराब करके और खुद ही ठीक करके ही यह फ्लास्क का आइडिया चला है। पांच यात्राओं में ही इसकी चार चार चाय पीकर पांच सौ रुपए वसूल वह अलग से।

   ट्रेन की चाय , कॉफी या अन्य चीजें कभी मत खाना। क्योंकि इतनी घटिया बनाते हैं कि पूछो मत। रेलवे अधिकारीगण एक बार हर ट्रेन की केटरिंग सुधार लें तो यह देश पर और आम नागरिक पर बहुत बड़ा अहसान होगा। कोई हो तो आईआरसीटीसी की वेबसाइट पर इस बारे में शिकायत जरूर करे।चाय चीनी का घोल,पत्ती कम से कम,नकली दूध भरी चाय।देखते ही मन उबका जाए।

       तभी कोने में सात नंबर सीट पर बैठे दंपत्ति पर निगाह गई।दोनो बैठे हुए चाय की चुस्कियां ले रहे थे और चार साल का बेटा खिड़की से बाहर देख रहा था। एसी की क्लोज कांच की विंडो यह रेलवे वाले साफ चमकाना हमेशा भूल जाते हैं। पूरा कोच क्लीन करेंगे पर बाहर अंदर से ग्लास विंडो नहीं। शायद सोचते हैं कि ट्रेन में आदमी सोने ही तो जा रहा उसे बाहर की खूबसूरत हरियाली,नदी,खेत,सूर्य का उदय और अस्त होने की लालिमा, गुजरने वाले दूसरे शहरों के लोग,सड़कों से क्या वास्ता? कौन देखेगा इन पैक्ड विंडो से बाहर? जबकि यही विदेशों में आपको इतनी चमकती,उजली मिलेंगी मानो आप खुद खिड़की के बाहर दिखती हरियाली और गुजरने वाली झील का हिस्सा हो। काश ,रेलवे वाले कुछ समझदार होते!! वह दंपत्ति रात को मेरे बाद ही उस खाली बर्थ सात नंबर पर आया था। उसके कुछ ही देर बाद टीटी भी आया और उसी बर्थ पर बैठ गया। बड़ी बड़ी मूंछें,चढ़ी हुई आंखों में लाल लाल डोरे। पुरुष खड़ा हो गया और उसकी सुंदर पत्नी और बच्चा बैठा रहा। उनके पास यकीनन आरक्षण नहीं था,कोई इमरजेंसी रही थी जो तुरंत यात्रा करनी पड़ी। " सर,इंदौर तक जाना है कोई गमी हो गई है। टिकिट है परंतु आरक्षण नहीं।आपकी आज्ञा रहे तो सफर कर लें?" वह मूंछों वाला टीटी मुस्कराया,बोला," वह तो मैं पहले ही बोला कि ट्रेन फुल है।पर हर दो एसी कोच में एक सीट हम टीसी की होती हैं यह सात नंबर होती है अक्सर या फिर लास्ट वाली साइड की। तो इसी पर बैठकर जाना होगा।" 

"आपकी बहुत मेहरबानी " वह युवक हाथ जोड़कर बोला।

"पर मैं भी आराम करने यहीं आऊंगा।कोई दिक्कत तो नहीं? कहकर बड़ी अजीब निगाह उसकी पत्नी पर डाली।

"नहीं जी कोई एतराज नहीं जी?" युवती पढ़ी लिखी और संभवतः नौकरीपेशा थी।मजबूरी थी जो ऐसे जाना पड़ रहा था। सामान के नाम पर जरा सा हैंडबैग था।वाकई जल्दी में थे।

मेरी सीट अगली वाली 14 नंबर थी। तो मुझे वहां से वह तीनों साफ दिख रहे थे।मुझे नहीं पता था असली तमाशा रात को शुरू होने वाला था। 

टीटी अपने काम पर गया और बीस मिनट में हाजिर सांस से बदबूदार भभका छोड़ते हुए।अपना कोट उतारकर वहीं टांगा और बैठ गया। पति बेचारा उठ गया।पत्नी दूसरे कोने में सिमट गई। कुछ देर बाद टीटी ने अपने पैर सामने फैला लिए।और फोन देखने लगा। स्त्री ने अपने को समेटना चाहा पर जगह ही नहीं थी।बच्चा उसके गोद में सिर रखे सो गया था। 

"आप बी टू में उनतीस नंबर पर चले जाओ।एक बैठने की जगह है।बोल देना मैंने भेजा है।" कहकर उसने पति को चलता किया। पत्नी कुछ कहना चाहती थी पर पति बोला ," मैं पास में ही हूं।तुम बच्चे के साथ आराम से यहां रहो।" पत्नी आंखों से ही परेशानी व्यक्त कर रही थी। पर कोई और रास्ता नहीं था। एक डेढ़ घंटे खड़े रहने के बाद यह जगह मिली थी।मना करते तो फिर रात भर खड़े खड़े जाते,मजबूरी थी।यही एकमात्र गाड़ी थी और पूरी रफ्तार से चल रही थी। उधर पति गया और टीटी ने अनजान बन दोनों पांव सीधे किए जो सीधे युवती की कमर और अन्य अंगों से जा लगे। वह कसमसाई पर पीछे हटने की जगह नहीं थी।उसने बच्ची को संभाला और अंजान बन थोड़ी खिसक गई। टीटी नशे में फोन देखता रहा ,अधलेटा बर्थ के सहारे। युवती अचानक निर्वात में देखने लगी मानो किसी लिजलिजे अहसास को दूर करना चाह रही हो।डिब्बे में डिम लाइट थी,अंधेरा जैसा था। वह दूसरे पांव को उसकी गोद में ले गया था। बच्ची गहरी नींद में थी,उसके चेहरे पर मां के अपनत्व और गर्माहट की मीठी मुस्कान थी। पांव शायद उसके वक्ष को छू रहा,दबा रहा था। वह अब पहलू बदलती तो पीछे वाला पांव उसे पुश करता। कसमसाती हुई उसने देखा टीटी सिर पर हाथ ढके सोने का ढोंग कर रहा था।उसका बस चलता तो वह यहीं सारी हदें पार कर देता। वह अब इस पशोपेश में थी कि क्या करे? उसके पास कोई विकल्प नहीं था। सहसा उसने मुझे देखा। मैं उस ओर ही देख रहा था। उसकी निगाहें मिलीं ,उन निगाहों में याचना,बेबसी,मजबूरी और अपमान की पीड़ा थी। 

वह टीटी अंजान बनता पैरों से हरकत कर रहा था। मैं पास वाले कूपे में साइड लोअर पर था। टीटी की बदतमीजी बढ़ती देखकर भी मुंह पलट सोने की कोशिश कर रहा था।पर बेचैनी से नींद नहीं आई और मैं उठा। देखा अब टीटी लगभग लेट गया था। "आप कब तक बैठी रहेंगी? आप भी लेट जाइए।बहुत जगह है।" उसने थोड़ा खिसकते हुए कहा। 

"नहीं ,नहीं, ठीक है ऐसे ही। आप सोइए।" 

"अरे आप इतनी देर से बैठी हैं।थक गई होंगी। निसंकोच आराम करें।बहुत जगह है।" कहते उसके चेहरे पर गहन वासना और आंखों में लाल डोरे थे। वह अधलेटा फिर हो गया। 

"नहीं, मुझे बैठे रहने की आदत है।आप सोएं।" आवाज की दृढ़ता से टीटी थोड़ा विचलित हुआ फिर वह धीरे धीरे वापस लेटता गया। दोनों पांवों से उस युवती को घेरे में लेता। वह थोड़ा आगे खिसकती तो बच्ची के गिरने का डर था। पीछे उसका पांव था। तो बस वह अधर में बैठी हुई थी।

वह स्त्री,घुटी हुई सी, मजबूरी की मारी और हालात की शिकार बच्ची को गोद में सुलाती हुई क्या सोच रही होगी?

 थोड़ा आगे जाकर हाथ धोए और कुछ सोचता रहा। फिर मैं लौटा और सीधे सीट के सामने खड़ा हो गया। ",अरे ममता,तुम यहां? कहां जा रही हो? विनय कहां हैं?"

स्त्री चूंकि मुझे पीछे वाले कूपे में देख चुकी थी,उसने राहत की सांस ली।समझदार थी,तुरंत बोली, " अरे भाईसाहब आप? नमस्कार। हम जबलपुर जा रहे हैं। अम्मा जी की तबियत बहुत खराब है। कल ही फोन आया।तो बस टिकिट निकाला और चल दिए।" 

तो मुझे तो बताते , मैं भी वहीं जा रहा हूं। तुम भी ऐसे कैसे सफर करोगी? 

  "ऐसा करो मेरी बर्थ पीछे ही है।वहां आकर लेट जाओ।बच्ची छोटी है। मैं यहां बैठ जाऊंगा। कुछ ही घंटे की बात और है।"

अब नशे की गिरफ्त से धीरे धीरे बाहर आ रहे टीटी ने संदिग्ध भाव से मुझे देखा।फिर स्त्री को उठते देख वह पांव सिकोडकर बैठ गया।

"क्यों भाईसाहब ! दिक्कत तो नहीं यदि कुछ देर मैं बैठ जाऊं आपके पास?" 

वह क्या कहता? चुपचाप बच्ची समेत युवती को मेरी सीट पर बैठ ,निगाह से ओझल होते देखता रहा। फिर बोला,"नहीं दिक्कत नहीं। पर कुछ देर बाद मैं सोऊंगा ?" 

कोई बात नहीं।आप कह देना मैं उठ जाऊंगा।" कहकर मैं बैठ गया। वह अपनी बेटी के साथ सामने से साइड पर दिख रही बर्थ पर आराम,सुकून, इत्मीनान से थी।मैंने टीटी की तरफ मुस्कराकर देखा और सिर पीछे टिकाकर आंखे बंद कर लीं।

 

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(संदीप अवस्थी, चार कथा संग्रह ,देश विदेश से पुरस्कृत

804,विजय सरिता एनक्लेव, बी ब्लॉक पंचशील,अजमेर ,राजस्थान।305004,

मो 7737407061)