Anchahi Shadi - Kismat ka Sodha - 1 in Hindi Love Stories by Annu Kumari books and stories PDF | अनचाही शादी - किस्मत का सौदा - भाग 1

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अनचाही शादी - किस्मत का सौदा - भाग 1


“मैं ये शादी नहीं कर सकती, माँ… प्लीज़ समझने की कोशिश करो!”
आराध्या की आवाज़ काँप रही थी। आँखों में आँसू थे, लेकिन उनमें डर से ज़्यादा बेबसी झलक रही थी। सामने खड़ी उसकी माँ, शकुंतला देवी, चुप थीं। शायद उनके पास भी अब कहने को कुछ नहीं बचा था।
कमरे के बाहर रिश्तेदारों की फुसफुसाहट, हलवाई के बर्तनों की आवाज़ और बैंड की धुनें—सब कुछ मिलकर आराध्या के दिल को और भारी बना रहे थे। ये उसकी शादी का दिन था, लेकिन उसके चेहरे पर दुल्हन वाली चमक नहीं, बल्कि एक टूटी हुई लड़की की खामोशी थी।
आराध्या कभी भी इस शादी के लिए तैयार नहीं थी।
सब कुछ इतना अचानक हुआ कि उसे समझने का मौका तक नहीं मिला।
सिर्फ तीन दिन पहले तक उसकी ज़िंदगी बिल्कुल अलग थी।



तीन दिन पहले…
आराध्या एक सरकारी स्कूल में शिक्षिका थी। सादा जीवन, सादा सोच। पिता के गुजरने के बाद वही घर की ज़िम्मेदारी संभाल रही थी। उसकी माँ अक्सर कहती थीं,
“बेटी, बस अब तुझे सेटल देखना है, फिर चैन से मरूँगी।”
लेकिन आराध्या शादी के नाम से डरती थी। वजह कोई और नहीं, बल्कि वो ज़ख्म था जो उसने बचपन में देखा था—पिता की शराब, माँ की खामोश तकलीफ़ और हर रात का डर,उसे प्यार चाहिए था, सौदा नहीं।
लेकिन किस्मत को शायद उसकी ख्वाहिशों से कोई मतलब नहीं था।
उस दिन स्कूल से लौटते वक्त रास्ते में एक्सीडेंट हो गया। सामने से आती कार ने अचानक ब्रेक लिया और आराध्या स्कूटी से गिर पड़ी। चोट ज़्यादा नहीं आई, लेकिन मामला थाने तक पहुँच गया।और वहीं पहली बार उसका सामना हुआ—वीर प्रताप सिंह।
लंबा कद, सख्त चेहरा, आँखों में अजीब सी ठंडक। वो उस कार का मालिक था। शहर का नामी बिज़नेसमैन, जिसके बारे में कहा जाता था कि वो जो चाहता है, हासिल करके रहता है।“देखिए मैडम, गलती आपकी भी है,” वीर की आवाज़ में कोई हमदर्दी नहीं थी।
आराध्या ने सिर झुका लिया। उसे बहस करने की आदत नहीं थी।लेकिन कहानी वहाँ खत्म नहीं हुई।
अगले ही दिन, आराध्या की माँ को हार्ट अटैक आ गया। हालत नाज़ुक थी। अस्पताल के बिल बढ़ते जा रहे थे, और आराध्या के पास पैसे नहीं थे।
तभी वीर प्रताप सिंह दोबारा उसकी ज़िंदगी में आया।
“मैं इलाज का पूरा खर्च उठाऊँगा,” उसने सीधे शब्दों में कहा, “लेकिन बदले में मुझे आपसे शादी करनी होगी।”
आराध्या को लगा उसने गलत सुना।
“क्या बकवास है ये?” आराध्या की आवाज़ काँप गई।
वीर के चेहरे पर कोई भाव नहीं था।“ये बकवास नहीं, एक डील है। आपकी माँ की जान… और आपकी ज़िंदगी।”
आराध्या के पैरों तले ज़मीन खिसक गई।
उसने बहुत मना किया। गिड़गिड़ाई। रोई। लेकिन हालात उसके खिलाफ थे। माँ की साँसें हर पल टूट रही थीं और अस्पताल की मशीनें बेरहमी से समय गिन रही थीं।
आख़िरकार उसने वो किया, जो वो कभी नहीं करना चाहती थी।
उसने हाँ कह दी।


वर्तमान…


दुल्हन के जोड़े में बैठी आराध्या शीशे में खुद को देख रही थी। लाल जोड़ा, भारी गहने—सब कुछ था, सिवाय खुशी के।
“ये शादी नहीं… एक समझौता है,” उसने खुद से कहा।
दरवाज़ा खुला।
वीर प्रताप सिंह कमरे में दाखिल हुआ। क्रीम रंग की शेरवानी में वो और भी सख्त लग रहा था।“तैयार हो?” उसने बस इतना ही पूछा।
आराध्या ने उसकी ओर देखा।“आप खुश हैं?” उसने सवाल किया।
वीर कुछ पल चुप रहा, फिर बोला,“खुशी जैसी कोई चीज़ मेरे लिए मायने नहीं रखती। मुझे सिर्फ अपना वादा निभाना था।”ये सुनकर आराध्या का दिल और टूट गया।
मंडप में बैठते वक्त हर रस्म उसे किसी सज़ा जैसी लग रही थी। फेरे लेते हुए उसके कदम काँप रहे थे।
सातवाँ फेरा पूरा होते ही पंडित जी बोले,“अब आप पति-पत्नी हैं।”
आराध्या की आँखों से एक आँसू गिर पड़ा।वीर ने वो आँसू देख लिया।लेकिन उसने कुछ नहीं कहा।
शादी के बाद, जब सब लोग चले गए, कमरा खामोशी से भर गया।
वीर ने कोट उतारते हुए कहा,“हम एक ही कमरे में रहेंगे, लेकिन याद रखना—ये शादी सिर्फ कागज़ों में है।”
आराध्या ने हैरानी से उसकी ओर देखा।“आप मुझसे कोई रिश्ता नहीं चाहतीं, और मैं ज़िंदगी में रिश्तों पर भरोसा नहीं करता,” वीर ने आगे कहा।“हम दोनों अपनी-अपनी ज़िंदगी जीएँगे।”
ये सुनकर आराध्या को थोड़ी राहत तो मिली… लेकिन सवाल भी।
अगर ये शादी अनचाही थी, तो वीर ने ये सौदा किया ही क्यों?
और क्या वाकई ये रिश्ता सिर्फ कागज़ों तक सीमित रहेगा?