14 जनवरी की सुबह जयपुर में कुछ अलग ही रंग लेकर आती है। ठंडी हवा में हल्की धूप, छतों पर चढ़ते लोगों की चहल-पहल, और आसमान में पहले से तनी हुई डोरें—मानो शहर ने खुद को त्योहार के लिए तैयार कर लिया हो। मकर संक्रांति का दिन था। हर छत से “वो काटा… वो काटा!” की आवाज़ें गूंज रही थीं। नीली, लाल, पीली पतंगें आसमान में ऐसे तैर रही थीं जैसे जयपुर का दिल खुलकर मुस्कुरा रहा हो।
अमन अपनी छत पर खड़ा था। हाथ में चरखी, आँखें आसमान पर टिकी हुईं। पास ही उसकी माँ तिल के लड्डू बना रही थीं और घी की खुशबू हवा में घुल रही थी। नीचे गली से बच्चों की हँसी और पतंग बेचने वाले की आवाज़ आ रही थी। अमन ने एक तेज़ झटका दिया—और सामने वाली पतंग कट गई। उसके चेहरे पर जीत की चमक आ गई, लेकिन अगले ही पल उसने देखा कि उसकी पतंग भी धीरे-धीरे ढीली पड़ रही है। जीवन भी कुछ ऐसा ही है, उसने सोचा—कभी जीत, कभी हार।
शाम ढलते-ढलते आसमान का रंग बदलने लगा। पतंगें कम हो गईं और ठंड थोड़ी और बढ़ गई। घरों में दीये जले, और लोग रात के इंतज़ार में थे। जैसे ही अंधेरा गहराया, जयपुर की छतों पर फिर से हलचल शुरू हो गई—इस बार हाथों में मोमबत्तियों वाले लालटेन बैलून, जिन्हें लोग प्यार से “आकाश लालटेन” कहते हैं।
अमन ने भी एक लालटेन जलाई। भीतर रखी मोमबत्ती की लौ काँप रही थी, जैसे किसी सपने की नन्ही-सी शुरुआत। उसने उसे धीरे से छोड़ा। लालटेन ऊपर उठी, हवा से बातें करती हुई, और फिर आसमान का हिस्सा बन गई। देखते-ही-देखते सैकड़ों रोशनियाँ अंधेरे में चमकने लगीं। पूरा जयपुर तारों से पहले ही जगमगा उठा।
उस पल अमन को लगा—सुबह पतंगों के साथ उसने संघर्ष सीखा था, और रात की इन रोशनियों ने उसे उम्मीद दी। मकर संक्रांति सिर्फ मौसम का बदलाव नहीं थी, बल्कि भीतर के अंधेरे से उजाले की ओर जाने का एक वादा थी। और जयपुर, उस रात, उस वादे का सबसे खूबसूरत गवाह बन गया।
अमन देर तक आसमान की ओर देखता रहा। उड़ती हुई लालटेनें अब धीरे-धीरे छोटी रोशन बिंदुओं में बदल रही थीं, जैसे किसी ने अंधेरे कैनवास पर उम्मीद की स्याही से बिंदियाँ बना दी हों। ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी, पर मन के भीतर एक अजीब-सी गर्माहट थी। उसे लगा, जैसे हर लालटेन अपने साथ किसी न किसी की दबी हुई इच्छा, अधूरा सपना या अनकहा विश्वास लेकर ऊपर जा रही हो।
नीचे आंगन में माँ ने आवाज़ दी, “अमन, नीचे आ जा… ठंड बढ़ रही है।”
अमन मुस्कुराया। उसने आख़िरी बार आसमान को देखा और सीढ़ियों की ओर बढ़ गया। भीतर आते ही घर की गर्माहट, तिल के लड्डुओं की मिठास और चूल्हे पर चढ़ी चाय की खुशबू ने उसे घेर लिया। पिता जी सामने रखे Saregama Carvaan पर पुराने गीत सुन रहे थे, और पास बैठी दादी संक्रांति से जुड़ी पुरानी बातें सुना रही थीं—कैसे उनके बचपन में पतंगें कागज़ की नहीं, भावनाओं की होती थीं।
रात गहराती गई। बाहर शोर कम हो गया, पर मन के भीतर एक शांत हलचल बनी रही। अमन छत पर दोबारा नहीं गया, लेकिन उसकी आँखों में अब भी आसमान की चमक तैर रही थी। उसे महसूस हुआ कि त्योहार सिर्फ बाहर मनाए जाने के लिए नहीं होते, वे भीतर कुछ बदलने आते हैं।
उसने सोचा—आज की सुबह ने उसे सिखाया था कि पकड़ कैसे बनाए रखनी है, कब डोर कसनी है और कब ढील देनी है। और रात ने सिखाया कि हर चीज़ को थामे रखना ज़रूरी नहीं, कुछ सपनों को छोड़ देना भी सीखना पड़ता है, ताकि वे अपने रास्ते खुद तलाश सकें।
मोबाइल पर किसी दोस्त का संदेश आया—“आज का दिन कुछ अलग-सा था, है ना?”
अमन ने जवाब लिखा, “हाँ… जैसे खुद से थोड़ी और पहचान हो गई।”
खिड़की से बाहर देखते हुए उसने महसूस किया कि जयपुर अब शांत हो चुका था। सड़क की लाइटें स्थिर थीं, आसमान साफ़ था, और कहीं दूर कोई आख़िरी लालटेन शायद अब भी ऊपर जा रही थी। उसे लगा कि मकर संक्रांति सच में संक्रमण का पर्व है—सिर्फ सूर्य के उत्तरायण होने का नहीं, बल्कि इंसान के भीतर ठहराव से आगे बढ़ने का।
उस रात अमन देर से सोया, पर मन हल्का था। अगले दिन ज़िंदगी फिर अपने सामान्य ढर्रे पर लौट आएगी—काम, जिम्मेदारियाँ, उलझनें। मगर अब उसके पास यादों का एक उजला कोना था, जहाँ पतंगें थीं, लालटेनें थीं और यह विश्वास था कि हर अंधेरे के बाद आसमान फिर से रोशन हो सकता है।
और शायद, यही मकर संक्रांति का असली उपहार था।
लेखक,
अँकुर सक्सेना “मैडी”
[ANKUR SAXENA “MADDY”]
सेक्टर 71, सांगानेर, प्रताप नगर
जयपुर, राजस्थान
भारत
सोमवार, 12 जनवरी, 2026 को लिखी गयी लघु कथा