Life's happiness in Hindi Short Stories by manshi books and stories PDF | जिंदगी की खुशी

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जिंदगी की खुशी

क्या आप ने कभी सोचा है, कि कोई ऐसा भी होगा, जिसमें गुण तो बहुत हैं, पर वह किसी को बताता नहीं है। अपने गुण वह किसी को दिखलाता नहीं है। उसके साथ अन्याय होता है, पर वह उसे चुप करके सहता है, जिस वजह से उसे कभी कोई समझ नहीं पाता। वह जिंदगी के सारे दुखों को छोड़कर बस यही कहता है कि, "यह मानव जीवन हमें दूसरों की सहायता के लिए मिला है, ना कि व्यर्थ के क्रिया क्लापों के लिए"। कुछ ऐसी ही कहानी है, नलिनी की। नलिनी एक बहुत ही समझ दार लड़की थी। हालाँकि दिमाग तो सब में एक जैसा होता है, पर नलिनी हर बात की गहराई को अच्छी तरह समझती थी। उसके पास जो भी होता था, उसका भरपूर प्रयोग करना ही वह अपना कर्तव्य समझती थी। विभिन्न विद्यालयों में पढ़ने अथवा विभिन्न लोगों से मिलने के बाद उसे यह समझ आ गया था, कि पाँचों उंगलियाँ बराबर नहीं होती हैं। उसके अंदर बहुत से गुण थे, जैसे चित्र बनाना, गाना गाना, भाषण देना, आदि। वह बहुत ही कम बोलती थी। वह अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम स्थान पर रहती थी। वह मानती थी, कि उसके सपने सबसे अलग हैं, और सबसे विचित्र भी। वह एक बहुत बड़ी देश भक्त थी। वह विभिन्न प्रकार के कार्य करके अपने देश की सेवा करना चाहती थी। एक दिन उसके विद्यालय में चित्र बनाने की प्रतियोगिता थी। वह बहुत उत्सुक थी। उसने भी उस प्रतियोगिता में हिस्सा लिया। उसने एक बड़ी ही खूबसूरत चित्र बनाई। उसके चित्र के आगे बाकी चित्र फीके पड़ रहे थे। निरीक्षण के समय  निरीक्षण करने वाली अध्यापिका ने द्वेष के मारे जानबूझकर उसे डांटते हुए बोला, "जैसे तुम्हारी लिखाई कभी अच्छी नहीं होती उसी तरह तुम्हारा चित्र भी अच्छा नहीं है"। उस दिन के बाद से नलिनी ने चित्र बनाना छोड़ दिया। वह बहुत निराश हो गई। उसकी एक टीम थी, जिसमें सात लड़कियां थी। वे सभी मिलकर अपने देश के स्वच्छ कल के लिए पेड़ उगाती थी। नलिनी ने पेड़ उगाने भी बंद कर दिये। उसे बहुत अकेलापन महसूस होने लगा था। उसके मन में विभिन्न प्रकार के ख्याल आने लगे। वह अपने आप को कमज़ोर समझने लगी थी। उसकी एक सहेली थी, जिसका नाम प्रिया था। वे दोनों पक्की दोस्त थी। प्रिया ने नलिनी को होंसला दिया। उसने नलिनी को उसका विश्वास वापिस दिलाया। नलिनी ने एक नई शुरुआत की। उसने दोबारा वृक्ष उगाने शुरू किये। उसने पहले से भी अच्छे चित्र बनाने का फैसला लिया। नलिनी की एक आदत थी, वह हमेशा शांत रहती थी, वह कभी किसी को पलटकर जवाब नहीं देती थी। जिस बात का फ़ायदा सभी लोग उठाते थे। वे हमेशा नलिनी से अपने कार्य करवाते थे, और औरों की चीज लेकर उसका नाम लगा देते थे। नलिनी इन सब चीजों से बहुत तंग आ गई थी। उसे लगता था, की वह कभी इन चीजों से आज़ाद नहीं हो पाएगी, तथा कभी भी खुश नहीं हो पाएगी। उसे लगता था, की उसके सिवा हर व्यक्ति खुश है। उसे कब खुशी मिलेगी? उसने अपने आप से कहा, "अब मुझे सिर्फ जिंदगी की खुशी चाहिए। मैं भी खुश होना चाहती हूँ। अगले दिन अध्यापिका ने उसे फिर से लिखाई के लिये डाँट लगाई। उसे लगा की, उसे जिंदगी की खुशी लिखाई सुधारने से ही मिलेगी। वह लिखाई सुधारने के लिए कई प्रयास करने लगी। उसे लगा कया पता लिखाई सुधारने से ही उसे जिंदगी की खुशी मिल जाए। कई प्रयास करने के बाद भी वह असफल रही। उसे लगा उसकी लिखाई कभी नहीं सुधर सकती और वह कभी जिंदगी में खुश नहीं हो सकती। उसने लिखाई और पढाई पर ध्यान देना छोड़ दिया। वह पढाई में कमजोर हो गई। उसकी मासिक परीक्षाएं हुई।  नलिनी के अंक बहुत कम आए। सभी यह देखकर बहुत हैरान हुए, कि नलिनी इतनी कमज़ोर कैसे हो गई । नलिनी निराश हो गई। प्रिया ने उसे हिम्मत दी। नलिनी ने दोबारा पढ़ना शुरू किया। उसने एक बार फिर यह साबित किया की निराशा कभी किसी को तोड़ नहीं सकती। दोबारा अपने आप को सफल होता देखकर वह बहुत खुश हुई। उसे लगा कि उसे जिंदगी की खुशी मिल गई है।