कानून और न्याय
एक प्रोफेसर अपनी कक्षा शुरू करने से पहले एक छात्रा से उसका नाम पूछते हैं। जैसे ही छात्रा अपना नाम बताती है, प्रोफेसर तुरंत उसे कक्षा से बाहर निकल जाने का आदेश दे देते हैं।
छात्रा आश्चर्यचकित होकर विरोध करती है, “सर, मैंने तो कुछ गलत किया ही नहीं!” प्रोफेसर कठोर स्वर में कहते हैं, “यदि तुम बाहर नहीं जाओगी, तो मैं कक्षा नहीं पढ़ाऊँगा।” मजबूरन छात्रा अपनी बैग उठाती है और आँखों में आँसू लिए कक्षा से बाहर चली जाती है। पूरी कक्षा यह सब चुपचाप देखती रहती है। कोई भी छात्र उसका साथ देने या विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।
प्रोफेसर अब कक्षा शुरू करते हैं और सभी छात्रों से एक गंभीर प्रश्न पूछते हैं: “कानून का उद्देश्य क्या है? कानून क्यों आवश्यक है?”
छात्र विभिन्न उत्तर देते हैं:
“राजनीतिक शासन व्यवस्था बनाए रखने के लिए।”
“सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए।”
“अपराध को कम करने के लिए।”
“समाज के विकास के लिए।”
इन उत्तरों को सुनकर प्रोफेसर चुप रहते हैं। तभी कक्षा के एक छात्र उठता है और स्पष्ट स्वर में कहता है, “न्याय के लिए, सर!”
प्रोफेसर मुस्कुराते हैं और उस छात्र की ओर देखकर कहते हैं, “धन्यवाद! बिलकुल सही। कानून का असली उद्देश्य न्याय स्थापित करना है।”
फिर प्रोफेसर गंभीर होकर पूरी कक्षा की ओर मुखातिब होते हैं: “मैंने अभी-अभी तुम्हारी एक सहपाठी को बिना किसी गलती के कक्षा से बाहर निकाल दिया। तुम सभी जानते थे कि उसने कुछ गलत नहीं किया। यह स्पष्ट अन्याय था। फिर भी तुममें से किसी ने भी उसकी रक्षा में आवाज़ क्यों नहीं उठाई? किसी ने मुझे रोकने का प्रयास क्यों नहीं किया? तुम सब चुप क्यों रहे?”
कक्षा में सन्नाटा छा जाता है। प्रोफेसर आगे कहते हैं, “कारण यह है कि तुममें से अधिकांश केवल अपने बारे में सोचते हैं। तुम्हारा दृष्टिकोण ‘मुझे क्या?’ और ‘मेरा क्या?’ तक सीमित है। यह स्वार्थी मानसिकता तुम्हारे अंदर गहराई तक समाई हुई है।”
“यदि आज तुम किसी के साथ हो रहे अन्याय को देखकर भी चुप रहोगे, तो कल जब तुम्हारे साथ अन्याय होगा, तब कोई तुम्हारी मदद के लिए आगे नहीं आएगा। अन्याय का प्रतिकार न करना खुद एक बड़ा अन्याय है। न्याय की रक्षा करना हर व्यक्ति का कर्तव्य है।”
प्रोफेसर अपनी बात समाप्त करते हुए एक प्राचीन संस्कृत श्लोक उद्धृत करते हैं:
धर्म एव हतो हन्ति धर्मो रक्षति रक्षितः ।
तस्माद्धर्मो न हन्तव्यो मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥
धर्म (न्याय और धर्म) की रक्षा करने वाला स्वयं धर्म द्वारा रक्षित होता है। जो धर्म का नाश करता है, धर्म उसे नष्ट कर देता है। इसलिए धर्म का हनन कभी नहीं करना चाहिए, अन्यथा नष्ट हुआ धर्म हमें भी नष्ट कर देगा।
प्रोफेसर व्याख्या करते हैं, “यह मनुस्मृति का श्लोक हमें सिखाता है कि यदि हम न्याय की रक्षा करेंगे, तो न्याय हमारी रक्षा करेगा। लेकिन यदि हम अन्याय के सामने मौन रहेंगे, तो एक दिन वह अन्याय हमें भी घेर लेगा। आज की यह घटना केवल एक सबक थी – यह समझाने के लिए कि कानून और न्याय केवल किताबों में नहीं, बल्कि हमारे दैनिक व्यवहार और साहस में जीवित रहते हैं।”
कक्षा में गहरा मौन छा जाता है। सभी छात्र अपने अंदर झांकने लगते हैं। प्रोफेसर बाहर गई छात्रा को वापस बुलाते हैं और माफी मांगते हुए कहते हैं, “मैंने यह सब केवल तुम सभी को एक महत्वपूर्ण जीवन-पाठ सिखाने के लिए किया था।”
यह घटना छात्रों के मन में हमेशा के लिए अंकित हो जाती है कि अन्याय के विरुद्ध चुप रहना सबसे बड़ा अपराध है। न्याय की रक्षा करना ही सच्चा धर्म है, और यही समाज को मजबूत बनाता है।