एकतरफा प्यार
बरसात के बाद गुनगुनी धुप निकल चुकी थी। मौसम खुशनूमा हो गया था। हवा भी चल रही थी और नमी भी बरकरार थी। बरगद के पेड़ के पत्तों से अभी भी जल की बुदें तपक रही थी, जो पेड़ के नीचे खड़े होने वाले व्यक्ति को भींगा देने के लिए काफी था। धरती पर हल्के गड्डे वाली जमीन पर काफी पानी जहाँ-तहाँ जमा हो गया था, करीब घुटने भर, जिसमें कुछ बच्चे उछल-कुद कर रहे थे और छपाक छपाक की आवाज बच्चों का मनोरंजन कर रही थी। कोई बच्चा कागज की नाव से खेल रहा था तो कोई बच्चा फिसलन भरी दलदल जैसी हो चुकी जमीन पर फीसलने का आनंद उठा रहा था।
अपने कमरे में सोयी जया को तेज बारिश का कुछ भी पता नहीं चला, नींद खुलने पर उसने मन ही मन कहा ’’ पता नहीं कितने घोड़े बेचकर सोयी थी मैं। ’’ कुछ याद आते ही जया छत पर आयी तो देखा और माथा पीट कर कहा ’’ सुखे कपड़े तो फिर से भींग गए। ’’
कपड़े उठाते-उठाते हुए बबलू को आवाज लगायी ’’ बबलू बबलू। ’’
अपनी धुन में खेल रहे बबलू ने तो कोई आवाज नहीं दी मगर सामने की छत से आवाज आयी ’’ मै तो पहले से ही हाजिर हूं। ’’
आवाज सुन कर सामने देखकर जया शरमा गई और भागते-भागते कहा ’’ मैं तो अपने भाई बबलू को आवाज लगा रही थी।
जवान सुन्दर सा दिखने वाला लड़का अपना सीना भी सहलाते रहा। दुसरे-तीसरे दिन भी जया ने महसूस किया कि मेरे पहूंचने से पहले ही वो लड़का छत पर खड़ा रहता है और उसकी नज़र मेरी ही छत पर टीकी रहती है। जया ने उसकी नज़रों की तीर को अपने दिल में गड़ता हुआ महसूस किया। यह सब कैसे हुआ जया को इसका ज्ञान भी नहीं,, मगर अब जया की भी नज़र सामने वाली छत की तरफ गड़ी रहती है। नज़र का स्पर्श तो दोनों तरफ से चलता ही रहा मगर अब दोनों को नजदीक आने की पुरजोर इच्छा सताने लगी। खुद को तड़पना तो अबतक ठीक था मगर हद तो तब हुई जब बात एक कान से होकर दुसरे कान, फिर मोहल्ले में फैल गयी।
जया के भाई बबलू ने ताना मारते हुए कहा ’’ वाह दीदी, मेरा नाम उसको देकर चुपचाप प्यार का खेल खेल रही थी। ’’ बबलू तो बहूत छोटा तो ज्यादा कुछ नहीं बोला, मगर जया के पिता कामता प्रसाद ने कहा ’’ बाहर से तु सुन चुका हूं, अब तूम्हारे मूंह से सुनना चाहता हूं, स्पष्ट और सच-सच। ’’
जया बुत की तरह मौन खड़ी रही तो उसकी माँ ने चोटी खिंचकर कहा ’’ ये ऐसे नहीं बताएगी। ’’ जया को तीन-चार थप्पड़ लगाकर उसकी माँ खुद ही रो पड़ी। जया के पिता बुझे-बुझे चुपचाप से रहने लगे। घर पर उनका अधिकांश समय सोच-विचार में ही बीतता। नींद में कामता प्रसाद जी का बड़बड़ाना पुरे घर के लिए चिन्ता का विषय बन गया। अपने पिता को चिन्तीत देखकर जय खुद को कोसने लगी और बेटी ही पिता का दर्द समझती है। जया दिन भर तो खुद को खुश दिखाने की सफल कोशिश करती मगर रात को बिना आँसू बहाए नहीं रह पाती।
अपने पिता की चिन्ता के दलदल से निकालते हुए जया ने कहा ’’ बाबू जी, मेरा विश्वास किजीए, मैं उस बारे में सोचती भी नहीं और अब आप जो चाहेंगे वही होगा। ’’
एक अच्छा बाप और भला क्या चाहता है। एक होनहार लड़का देखकर जया की शादी करवा दी।
शादी करने से दो दिन पहले जया बबलू से मिली थी आखिरी बार।
समाप्त।