Book Review: A collection of spoken poetry - Abhivyakti Alfaazon Ki in Hindi Book Reviews by Sudhir Srivastava books and stories PDF | पुस्तक समीक्षाबोलती रचनाओं का काव्य संग्रह - अभिव्यक्ति अल्फाजों की

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पुस्तक समीक्षाबोलती रचनाओं का काव्य संग्रह - अभिव्यक्ति अल्फाजों की

पुस्तक समीक्षाबोलती रचनाओं का काव्य संग्रह - अभिव्यक्ति अल्फाजों की                          समीक्षक- सुधीर श्रीवास्तव     वैसे तो कोरोना ने समूची दुनिया को हिला कर रख दिया था। किंतु ईमानदारी से कहें तो इसी कोरोना ने हमें, आपको ही नहीं समूची दुनिया को कुछ ऐसा ही दिया, जिसके बारे में कोरोना से पूर्व हम कल्पना तक नहीं कर सकते थे। हर क्षेत्र में अनेकानेक नवाचार हुए, जो दुनिया,समाज और व्यक्तियों, प्राणियों के लिए लाभदायक और सुगम जीवन की धुरी बनते जा रहे हैं। विभिन्न क्षेत्रों की सुषुप्तावस्था में पड़ी तमाम प्रतिभाओं को प्रकाश में आने का आपदा में अवसर मिला।      ऐसे ही एक कलमकार के रूप में पाठकों के बीच उभर कर आये कलमकार हैं अशोक दोशी। आश्चर्य के साथ सुखद अनुभूति भी होती है कि लंबे समय से व्यवसाय में रचा -बसा व्यक्ति अपनी संवेदनाओं, भावनाओं, मन-मस्तिष्क में आने वाली अभिव्यक्ति को सृजनात्मक आधार पर बिना किसी किंतु परंतु और ईमानदारी से साहित्य साधना के लिए हौसला कर सका। साहित्य जगत के लिए कोरोना काल की इसे उपलब्धि कहना अतिश्योक्ति तो नहीं कह सकते हैं।     'अभिव्यक्ति अल्फाजों की' अशोक जी का प्रथम काव्य संग्रह है। इस संग्रह के प्रकाशन और उनकी रचनाओं को दरकिनार कर सबसे पहले तो उनके आत्मविश्वास को देखना चाहिए। जो उनमें कूट-कूट कर भरा दिखता है। इसका प्रमाण वे खुद नहीं उनका काव्य संग्रह दे रहा है।    कवि की लेखनी में स्वतंत्र भावों, विचारिक चिंतन, और विविध अनुभूतियों का समन्वय देखने को मिल रहा है।रचनाकार ने अल्फ़ाज़ों के माध्यम से जीवन के अनुभवों, रिश्तों की कोमलता, समाज की सच्चाइयों और आत्मचिंतन के क्षणों को प्रभावशाली ढंग से उकेरा है। कहीं शब्द मौन, तो कहीं भाव स्वयं ही शब्द बनते प्रतीत होते हैं।संग्रह की शुरुआत सरस्वती वंदना से हुई है। जिसमें कवि भोलेपन से मां शारदे सीधे मुखातिब होते हुए अपने मन की बात पहुंचाने का खूबसूरत प्रयास सराहनीय है -हम करें तुमसे एक याचना,सुनो छोटी सी मेरी प्रार्थना।आत्मोन्नति में रचनाकार खुद सच्चाई को शिरोधार्य करते हुए कहता है -नहीं देते उस पर ठीक से ध्यान,भवभवांतर से घूमती यह आत्मा।मुस्कान के विविध रुपों का शब्द चित्र यथार्थ के आइने का बोध कराता है।हाथों की लकीरें की ये पंक्तियां जीवन संदेश का बोध कराती लगती हैं -प्रयास करें तो हीप्रारब्ध भी बदलते हैं,वर्ना जिंदगी ऐसे ही चलती है।बाल दिवस पर कवि अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए लिखता है -बेसहारा बाल अपराधी कूड़े के ढेर पर लगा लेते हैं मादक कश।विजयी विश्व तिरंगा प्यारा में तिरंगे की गरिमा, महिमा के एक आत्मविश्वास भी झलकता है। तभी तो कवि लिखता है-अखंड भारत का सपना है हमारा,निकट भविष्य में हो जायेगा पूरा।अनहोनी में कवि की सकारात्मकता संदेश प्रद है-सांत्वना और संबल सेशक्ति संचित कर,करो कर्म ऐसा कि सब हो जाए मंगल।संग्रह में शामिल विविध विषयक रचनाएं पाठकों को अपनी ओर आकर्षित करने में सक्षम लगती हैं, उम्र के इस पड़ाव पर आते आते जीवन के अनुभवों को संग्रह की रचनाओं में महसूस किया जा सकता है। अनुभव चिंतन-दृष्टिकोण का त्रिकोण संग्रह को बहुआयामी स्वरूप दे रहा है। लेकिन रचनाओं को यदि आज के अशोक दोशी बतौर पाठक देखें, तो उन्हें संग्रह की कमियां स्वत: दिखाई भी देंगी और उन्हें सुधार के लिए प्रेरित भी करेंगी। शब्दों के संयोजन के लिहाज से पंक्तियों का तालमेल और बेहतर किए जाने की जरूरत है। जहाँ तक मैं महसूस करता हूं, तो किसी भी रचनाकार की प्रथम पुस्तक में कुछ ऐसी कमी रह ही जाती है, जिसे रचनाकार अपनी पुस्तक के स्व अवलोकन के समय महसूस कर ही लेता है और अपनी आगे की सृजन यात्रा में उस पर ध्यान देता भी है। मुझे लगता है कि दोशी जी भी इस पर ध्यान दें ही चुके होंगे। मेरा विश्वास है अशोक जी अपनी साहित्य साधना निरंतर जारी रखते हुए समय के साथ और... और..... और बेहतर होने का प्रयास करते हुए अपनी पहचान को विशिष्ट स्तर पर ले जाने में सक्षम होंगे। जिसके लिए वे समर्थ भी हैं। बस आलोचनाओं के चक्रव्यूह में फंसे के बजाय उसे आत्मसात करने के जज्बे को जीवंत रख सकें। क्योंकि आपकी रचनाएं स्वयं ही संवाद करने को उत्सुक दिखती हैं।जो अपने आप में किसी उपलब्धि से कम नहीं है।    अंत में हमरुह पब्लिशिंग हाउस द्वारा प्रकाशित काव्य संग्रह 'अभिव्यक्ति अल्फाजों की' की सफलता और अशोक दोशी के उज्जवल साहित्यिक भविष्य की कामना के साथ.....।गोण्डा उत्तर प्रदेश