कशिश
बालों को समेटती हुई l पल्लू से पसीना पहुंचती हुईl मंद मंद मुस्कुराहट के साथ खिड़की खोले हवा को महसूस कर रही थीl सुडोल लहराई वह बदन एक निराली अदाl दिल में कशिश लिए हुए मग्न सुद ख़ो ऐ l निहार लूं मैं उसे बस यूं ही बिना आहट के देखता रहूंl नंदिता आवाज देकर पुकारा इधर आओ बेटा चौक ती हुई आई मां जैसे बरसों गई मां ने आवाज दी होl आंखों में आंसू ले आईl दरवाजे पर तुम नजर तुम यहां कब से खड़े थे
जी मैं प्रेस के कपड़े लाया हूं बाबू जी ने भेजे हैंl नंदिता बिटिया को दिखाओ आपकी तारीफ मैं चंदू धोबी का बेटा छुट्टियों में अपने गांव आया थाl दरवाजा नो क तो करना था मन में सोचा यह बता देता तो तुम्हें कैसे सादगी से निहारता अच्छा ठीक है आगे से ध्यान रखना चलो कल की तैयारी कर लेती हूं तो है संगीत का स्वर मिला लेती हूं
गीत, जिंदगी कटती नहीं यूं ही यादों के सहारे
अपनी ओर खींच लिए जाए बाहों के सहारे
अकेलापन दूर करें मेरी जिंदगी में अब इंतजार नहीं होता को ख्वाबों को निहारेलिए
आजा रे सांवरी सजन बावरिया
मन मोह लिया तन्हा तन्हा छोड़ दिया यू किनारे अब तो प्यार का सागर भर जा कब से प्यासी नैन यह प्यारे आजा आजा तुझको निहारे
नंदिता नंदिता कर सारा हॉल गूंज उठाl जहां लोगों की भीड़ में संगीत की ही त रंगे फैल गई
हर किसी के मुख से नंदिता की ही लिखी गजल स्वर गजल गाना तारीफ थी l घर लौटी नंदिता रास्ते में काका अपने पैसे ले जाना घर आकर जी बिटिया खट खट,
दरवाजा खुला है अंदर आ जाओलिए
गीत बादल घुमड़ घुमड़ कर आए काली काली बदरिया छाये चारों ओर घटाएं घेरे
बरसाए प्रेम बौछारी या ठंडी ठंडी पवन लहराए
चारों ओर बहारें लाए खेत हरियाली लहरा लहरा कर गाये l जब जब सावन बरसे रे प्रीतम की याद सताएl
अरे, तुम फिर से यहांl मैडम इस बार तो नोक़ कि या दरवाजा शायद आपने ही ध्यान नहीं दियाl कुछ ज्यादा ही व्यस्त थी अपनी स्वरों अच्छा ठीक हैl
अपने बाबू जी को इस महीने के पैसे दे देनाl मन ही मन नंदिता जब भी आता हैl चाहत की कशिश पैदा करता है क्या नाम है क्या करता है कुछ भी मालूम नहीं पहले कभी ना ऐसा हुआ जो यह महसूस करा गया खैर छोड़ो पर मन में कहीं ना कहीं जानने की जिज्ञासा बढ़ जाती है
एक कशिश जो उस और खींच लाए चंदू धोबी बेटा अपने कपड़े दे देना कल नदी पर धोकर प्रेस कर दे जाऊंगाl क्यों काका तुम्हारा बेटा कहां है वह दे जाएगाl राज़ चला गया सुबह की पहली बस पकड़कर पढ़ाई पूरी करने जिस े मिलता है दिल पर राज कर लेता हैl
उभरा उभरा यह बदन
कसा हुआ यह तन
तेज तेज सांसों का चलना
गर्माहट के संग
कशिश कशिश में रह गया
मन को ही रह पाया ना संग
काश काश शब्द में तन्हा रह गए हम
काश मैंने राज को आगे बोलने का मौका दिया होता स्वर ताल बन मिल गए होते हम अधूरी दिल की नहीं रहती यह कशिश
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(Continued)
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