I am alive in Hindi Fiction Stories by Kishanlal Sharma books and stories PDF | मैं जिंदा हूं

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मैं जिंदा हूं

"कितनी बार कहा है, मनहूस,कलमुंही, घर से कोई शुभ काम को बाहर जाए तो सामने मत पड़ा कर 

आज फिर हेमंत नौकरी के लिए इंटरव्यू देने जा रहा था। वह जब भी जाता, मा के पैर छूकर आशीर्वाद लेकर जाता। पर अभी तक सफलता नहीं मिली थी। और आज उसने सोचा था। क्या फ़ायदा बार बार इंटरव्यू का जब सफलता ही नहीं मिलती।

और आज वह जाना नहीं चाहता था। पर न जाने क्या सोचकर चल दिया। और वह घर से निकलता की उसके सामने नीतू आ गई।

और उसे देखते ही  सरला ने पिटारा खोल दिया। उसे कोसने का वह कोई भी मौका नहीं छोड़ती। या दिन भर कोसती।

सरला के दो बेटे थे, रविन्द्र और हेमंत। रविंद ड्राइवर था। वह एक कंपनी के ट्रक चलता था। हर मां जब बेटा जवानी की दहलीज पर कदम रखता है तो चाहती है, वह दुल्हा बने। सरला ने भी बेटे के लिए दुल्हन्  की तलाश शुरू कर दी।

और कई लड़की देखने के बाद सरला को नीतू पसंद आ गई। नीतू के मां बाप बूढ़े थे। और रिश्ता पक्का होते ही घर में खुशी का माहौल बन गया। शादी की तैयारी होने लगी।

नीतू वैसे तो गांव की थी लेकिन इंटर पास व सुशील और समझदार थी। और फिर एक दिन वह बयाह कर घर में आ गई। और घर खुशी से भर उठा। सरला तो कुछ ही दिन में बहु की ऐसी कायल हुई कि उसकी बढ़ाई करते हुए न थकती । लेकिन ईश्वर को यह खुशी मंजूर नहीं थी।

शादी को अभी दो महीने ही हुए थे कि रविन्द्र को कंपनी का ट्रक लेकर मुंबई जाना था। रविन्द्र यह काम कई साल से कर रहा था। हर बार की तरह वह घर से गया था। पत्नी से मिलकर और हमेशा की तरह मां का आशीर्वाद लेकर। लेकिन मुंबई पहुंचता उससे पहले उसके ट्रक का एक्सीडेंट हो गया। इस भयंकर दुर्घटना में रविन्द्र बुरी तरह घायल हुआ था।

और अस्पताल में कई दिन इलाज के बावजूद उसको बचाया नहीं जा सका। और रविन्द्र की मौत क्या हुई नीतू पर इसकी गाज आ गिरी। सरला रात दिन उसे कोसने लगी। और आज भी ऐसा ही हुआ था।

और बड़े भाई की मौत के बाद परिवार का जिम्मा हेमंत के कंधों पर आ गया। परिवार के दायित्व को पूरा करने के लिए नौकरी की जरूरत थी। पर वह जहां भी जाता उसे निराशा ही हाथ लगती।

आज जब वह लौटा आते ही बोला,"मां, भाभी कहा है?

"कलमुंही कहा जाएगी, अपने कमरे में होगी।"

हेमंत, नीतू को हाथ पकड़कर ले आया,"भाभी मनहूस नहीं है। आज भाभी का मुंह देखकर गया और मेरी नौकरी लग गई।"

सरला का कोसना कम नहीं हुआ। हेमंत समझता पर मा थी कि मानती ही नहीं। एक दिन मां बहू को कोसते हुए बोली,"निपुती मरती भी नहीं।"

"आज इसे मार ही आता हूं। रोज रोज का क्लेश दूर तेरा

हेमंत गुस्से में मां से बोला और हाथ पकड़कर नीतू को ले गया।

"मैं कहा जाऊंगी?"रास्ते में नीतू बोली,"अब तो मां बाप भी नहीं रहे।"

"कहा जाओगी। कही नहीं। इसी घर में रहोगी।"

"तो फिर कहा ले जा रहे हो?"

"अब तुम मेरी भाभी नहीं पत्नी बनकर रहोगी।"

नीतू तैयार नहीं थी पर हेमंत्त ने उसे समझा कर कोर्ट मैरिज कर ली। जब वह घर पहुंचा तो सरला बोली,"तू इस मनहूस को फिर ले आया। आते ही पति को खा गई।"

", मां अब यह मनहूस नहीं। इसका पति जिंदा है,"हेमंत बोलर,"मैने इससे शादी कर ली है।"

सरला हतप्रद सी उसे देखने लगी।

"मां, पूजा की थाली ला। बहू का स्वागत नहीं करेगी।"

सरला ने आरती उतरीर। नीतू उसी घर में दूसरी बार दुल्हन बनकर कदम रख रही थी