Shrapit ek Prem Kahaani - 41 in Hindi Spiritual Stories by CHIRANJIT TEWARY books and stories PDF | श्रापित एक प्रेम कहानी - 41

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श्रापित एक प्रेम कहानी - 41

वर्शाली अपनी आंखें पोंछती हूई कहती है---


 अब मैं क्या करू एकांश जी मुझे अपनी बहन को भी बचाना है और आपको भी पाना है। क्योंकी अब मैं आपकी हो चुकी हूं एकांश जी । आपकी हो चुकी हूं। 



इतना बोलकर वर्शाली एकांश के शरीर मे लगे घांव को छूती है जिससे एकांश को दर्द महसूस होती है और एकांश निंद से उठ जाता है। एकांश देखता है के वर्शाली उसके पास खड़ी है जिसे दैख कर एकांश का चेहरा खुशी से लाल हो जाता है। एकांश खुश होकर वर्शाली के दोनो हाथ पकड़ लेता है और अपनी और खींच कर वर्शाली को अपने बाहों में भरकर कहता है----


एकांश :- तुम थिक हो वर्शाली । 


एकांश की पकड़ इतनी मजबुत थी के दोनो का बदन एक दुसरे पर चिपक जाता है दोनो के बिच जरा सी भी दूरी नहीं थी। वर्शाली भी अपने आपको एकांश के बाहों मैं झोंकती है और एकांश को पकड़ लेती है। 


दोनो काफी दैर तक एक दुसरे के बाहों में रहता है। फिर धीरे धीरे दोनो एक दुसरे से अलग होता है। वर्शाली कहती है---


वर्शाली :- एकांश जी अब मैं आपके पास हूँ अब मैं 
आपको छोड़ कर कहीं नहीं जाऊंगी। 



वर्शाली की बात सुन कर एकांश वर्शाली को अपने बाहों से अलग कर देता है और सरमाने लगता है। क्योंकी उसने वर्शाली को बहुत दैर तक अपने बाहों में रखा था। वर्शाली कहती है----


वर्शाली : - अब आप ऐसे नजर क्यों चुराने लगे हैं मैने आपसे कुछ गलत कहा क्या?


 एकांश :- वर्शाली वो मैं तुम्हें इस तरह अपने बाहों मे बहुत दैर तक ... 


इतना बोलकर एकांश चुप हो जाता है। वर्शाली कहती है--


वर्शाली :- आप क्यों इतना घबरा रहे हो ? मुझे बिल्कुल भी बुरा नहीं लगा के आपने मुझे अपने बाहों में रखा। बल्की मुझे अच्छा लगा के आप मेरा इतना ध्यान रखते हो। आपके बाहों मैं खुशी मिलती है एकांश जी। क्योंकी आप मेरे लिए इतना सोचते हो। आप एक अकेली ख़ूबसूरत परी का कभी गलत फ़ायदा नहीं उठया। बल्की हमेंसा मेरी रक्षा की है।



 वर्शाली एकांश का हाथ देखती है जहां से खून निकल रहा था। वर्शाली एकांश से पुछी है---


वर्शाली :- ये कब हुआ ? 


एकांश कहता है---


एकांश :- पता नहीं वर्शाली शायद झड़ियों में लगा था। 


वर्शाली चौट को देख कर फूंक मारने लगती है। एकांश कहता है---


एकांश :- तुम चिंता मत करो छोटी सी घांव है ठीक हो जाएगा। 


वर्शाली अपने कपड़े को देखती है जिसमे एकांश का खून लगा था जिसे देख कर वर्शाली गुस्सा होकर कहती है--


वर्शाली :- ये देखिये एकांश जी कितना सारा रक्त बहा आपका और आपको पता ही नहीं। 



वर्शाली एकांश के हाथ को पकड़ती है और कहती है ---

वर्शाली :- उफ्फ कितना दर्द होता होगी आपको। 


इतना बोलकर वर्शाली हाथ को सहलाने लगती है। एकांश कहता है---


एकांश :- तुम क्यों इतना चिंता कर रही हो। 


वर्शाली एकांश का हाथ पकड़ती है और कहती है---

वर्शाली :- आप अईए मेरे साथ।


 इतना बोलकर वर्शाली एकांश को महल के बाहर झरने के पास लेकर जाती है। वहाँ एकांश को बैठने के लिए कहती हैं--

वर्शाली :- आप यहां पर बैठिए एकांश जी ।

 एकांश वहाँ पर बैठ जाता है और वर्शाली को देखने लगता है। वर्शाली एकांश के हाथ में लगे घावों को देख कर परेसान थी। वर्शाली झरने के पास जाती है और वहाँ से थोड़ी जल एक पात्र मे लेकर एकांश के पास आती है। 



वर्शाली वहाँ से कुछ पत्ते तोड़ती है और उसका रस पानी में निछोड़ देती है। एकांश ये सब हैरानी से दैख रहा था। तभी वर्शाली अपना हाथ आगे करती है और मन ही मन कुछ फुसफुसाती है--

वर्शाली: - “ॐ औषधि-शक्ति संन्यसे, रोग-ध्वंस करुणामय।
जीव-प्रवर्तक, तेजो दा — आरोग्यं करोतु जय!”

इतना बोलकर वर्शाली फूंक मारती है जिनसे वर्शाली के हाथ में से एक तेज रोशनी निकलती है जिससे एकांश की आंखे चोंधीया जाती है। 


कुछ दैर बाद वो रोशनी धीरे धीरे कम हो जाती है। रोशनी कम होने से एकांश देखता है की वर्शाली के हाथ में एक नीले रंग का पत्थर था जो चमक रहा था।


एकांश ने ऐसा चमत्कार आज तक नही देखा था। वर्शाली उस पत्थर को पानी में डुबाकर उठाती है। जिससे पानी का रंग भी नीला हो जाता है। फिर वर्शाली उस पत्थर को लेकर अपना हाथ आगे करती है और फिर से कुछ फुसफुसाती है---


वर्शाली : - “ॐ प्रदीप्त-जलाभिषेकाय नमः।
अभिषिक्तो हि औषधि तेजसा ज्योतिर्लिङ्ग-सम्पन्ना भवेत्।”

इतना बोलने के बाद वो पत्थर उसके हाथ से गायब हो जाता है। एकांश ये सब देखकर हैरान था। एकांश को ये सब एक जादू लग रहा था जो उसके आंखों के सामने हो रहा था।

 पर एकांश ये बात जनता था की वर्शाली एक परी है और परी के पास अलौकिक शक्तियाँ होती है। वर्शाली उस जल को पहले एकांश के घांव में डालती है और बाकी बचे पानी को एकांश के ऊपर छिड़क देती है और कहती है --

“ॐ सुप्त-शक्ति जागर्ति — रोगः क्षीणो भवतु।
वरोऽस्मिन् द्रवणे आरोग्यम् पुनरुत्थापय।”


 एकांश ये सब बस चुप चाप देख रहा था। एकांश बस मन ही मन सोचता है। ये वर्शाली अखिर कर क्या रही है। पर तभी एकांश जो देखता है वो देख कर उसे अपनी आंखें पर भरोसा नहीं हो रहा था। एकांश के बदन में लगी घांवो अब भरने लगा था और अब वो बिलकुल पहले जैसा हो गया है।


 एकांश देखता है उसके बदन पर अब एक भी घांव नहीं था। एकांश ऐसा चमत्कार पहली बार देख रहा था। एकांश वर्शाली से पुछता है--

एकांश :- ये कैसा चमत्कार है वर्शाली और वो चमकने वाला पत्थर क्या था ?


 एकांश की बात को सुनकर वर्शाली कहती है---

वर्शाली : - ये चमत्कार नहीं एकांश जी ये संजीवनी जल है। जो बड़े से बड़े पिड़ा दायक घांव को एक क्षन में ठिक कर देता है।


 एकांश वर्शाली से पुछता है---

एकांश :- संजीवनी जल...? मतलब जो मरे को जिवन देता है इसका मतलब ये जल मृत आदमी के ऊपर डालने से वो बच जाएगा ? 


वर्शाली एकांश की बात का जबाव देकर कहती है--


वर्शाली :- नहीं एकांश जी ये संजीवनी जल किसी मृत 
शरिर को जीवित तो नहीं कर सकता परंतु ये जल जीवन धारी के लिए अमृत के समान है जो सब रोगो से भी मुक्त कर सकता है। 


वर्शाली की बात को एकांश बहुत ध्यान से सुन रहा था और फिर कहता है---


एकांश :- काश ऐसा संजीवनी जल हम मनुष्य के पास होता । तो हम सभी जिव धारी प्राणी, जानवर पर जल का प्रयोग करता तो कितना अच्छा होगा। है ना वर्शाली। ताकि बिना किसी दवा और कष्ट सहे वो सब बिल्कुल स्वस्थ हो जाता । 


एकांश की बात सुनकर वर्शाली कहती है---

वर्शाली :- हां एकांश जी ये बिलकुल संभव है। पर सब 
मनुष्य आपके जैसा नहीं सोचता है एकांश जी। ये जल जितना जीवन दायी है उतना ही मारक क्षमता भी है। अगर ये जल किसी ऐसे मनुष्य के हाथ लग गया जिसकी सोच गलत है तो उसे कुछ भी कर सकता है। 



एकांश हैरानी से पुछता है--

एकांश :- क्या...? कुछ भी कर सकता है। पर कैसे। 

वर्शाली :- तांत्रिक विद्या एकांश जी। तांत्रिक विद्या। अगर किसी तांत्रिक के हाथ ये जल लग गया तो वो कुछ भी कर सकता है। किसी को भी वश में करके वो मन चाहा काम कर सकता है। वर्षो से तंत्रीक इस जल को और सांतक मणि को पाने के लिए तंत्र साधना और परी साधना करते आ रहे हैं। ताकि परी अपना मणि उस तांत्रीक को दे दे जिससे वो संजीवनी जल का उपयोग अपने मन चाहा काम के लिए करे।। जिनसे वो इस संसार की सबसे शक्तिमान मनुष्य बन जाए। पर कोई भी परी अपनी मणि नहीं दे सकती क्योंकि इसी मणि के कारण परी के पास अपार शक्तियां होती है अगर ये मणि परी के पास ना हो तो वो शक्ति हीन हो जाएगी और फिर इसका जिवन मरण सामन हो जाएगा । 


एकांश से पुछता है ----


एकांश :- तो क्या अभी जो तुम्हारे हाथ में था वो सांतक मणि था ?


 वर्शाली :- हां एकांश जी वही सांतक मणि था। 


वर्शाली अपना हाथ आगे करके फिर वही मंत्र कहती है---

“ॐ सुप्त-शक्ति जागर्ति — रोगः क्षीणो भवतु।
वरोऽस्मिन् द्रवणे आरोग्यम् पुनरुत्थापय।”

देखते ही देखते वो मणि वर्शाली के हाथ में आ जाती है। वर्शाली एकांश से कहती है---


वर्शाली : - एकांश जी यही है सांतक मणि जिनसे पाने के लिए बहुत सारे मनुष्य परी साधना करता है। पर फिर भी उन्हे इस मणि के दर्शन नहीं होती। 

एकांश मणि को हैरानी से देख रहा था और फिर कहता है---

एकांश :- क्या ये मणि सच में सबकी मनोकामना पूरी करता है ?



To be continue.....624